कुएँ में भांग 

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vaikunth
राधा रद्दी बीनती,सोच भाग्य लड़ जाय।
कहीं हाथ में बीनते,कंचन न पड़ जाय॥
पढ़कर करना क्या हमें,सोच रहा मजदूर।
सरस्वती नहीं भाग्य में,लक्ष्मी हैं मजबूर॥
सरस्वती माँ सोचकर,पीट रही हैं माथ।
क्या होगा अधिकार दें ? बुद्धि नहीं गर साथ॥
शिक्षा,पुस्तक,तुष्टि हित,भोजन भी भरपूर।
अभिभावक धन लोभ में,बना रहे मजदूर॥
यह तो भारत वर्ष है,पड़ी कुएँ में भाँग।
सब पैसा ही खोजते,बना रहे बस स्वांग॥
सत्ता-शासन क्या करे,घुट्टी कौन पिलाय ?
यहाँ सुरसती खेत में,घास निरावन जाँय ॥
कोई ग्राम सभा नहीं,जहाँ न हो स्कूल।
शिक्षक बालक खोजते,मति किसकी प्रतिकूल ?
बालक द्रव्य कमा रहा,नाम लिखा स्कूल।
‘मिड-डे’ खाने जायगा,कभी न सकता भूल॥
जान बूझकर बेचते,लेकर केतली चाय।
मोदी गर पीएम हुए,सीएम ही हो जाँय॥

                                       #वैकुन्ठ नाथ गुप्त ‘अरविन्द’

परिचय : वैकुन्ठ नाथ गुप्त ‘अरविन्द’ टेलियागढ़ (जिला-फैजाबाद(उप्र) में रहते हैं।आप काफी समय से काव्य रचना में लीन हैं।

matruadmin

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’

29 अप्रैल, 1989 को मध्य प्रदेश के सेंधवा में पिता श्री सुरेश जैन व माता श्रीमती शोभा जैन के घर अर्पण का जन्म हुआ। उनकी एक छोटी बहन नेहल हैं। अर्पण जैन मध्यप्रदेश के धार जिले की तहसील कुक्षी में पले-बढ़े। आरंभिक शिक्षा कुक्षी के वर्धमान जैन हाईस्कूल और शा. बा. उ. मा. विद्यालय कुक्षी में हासिल की, तथा इंदौर में जाकर राजीव गाँधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के अंतर्गत एसएटीएम महाविद्यालय से संगणक विज्ञान (कम्प्यूटर साइंस) में बेचलर ऑफ़ इंजीनियरिंग (बीई-कंप्यूटर साइंस) में स्नातक की पढ़ाई के साथ ही 11 जनवरी, 2010 को ‘सेन्स टेक्नोलॉजीस की शुरुआत की। अर्पण ने फ़ॉरेन ट्रेड में एमबीए किया तथा एम.जे. की पढ़ाई भी की। उसके बाद ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियाँ’ विषय पर अपना शोध कार्य करके पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। उन्होंने सॉफ़्टवेयर के व्यापार के साथ ही ख़बर हलचल वेब मीडिया की स्थापना की। वर्ष 2015 में शिखा जैन जी से उनका विवाह हुआ। वे मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं और हिन्दी ग्राम के संस्थापक भी हैं। डॉ. अर्पण जैन ने 11 लाख से अधिक लोगों के हस्ताक्षर हिन्दी में परिवर्तित करवाए, जिसके कारण वर्ल्ड बुक ऑफ़ रिकॉर्डस, लन्दन द्वारा विश्व कीर्तिमान प्रदान किया गया।