दिमाग में सिर्फ अंग्रेजी और रासायनिक ही

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baldva
तथ्यों के अनुसार १८५८ में इंडियन एजुकेशन एक्ट बना,जिसको लॉर्ड मैकाले ने बनाया। इसे बनाने के पूर्व १८२३ में थॉमस मुन्द्रो और लिटेनर ने  एक सर्वेक्षण किया। सर्वे के अनुसार मुन्द्रो जिसने दक्षिण भारत का सर्वे किया १०० फीसदी साक्षरता थी (और पूरे भारत में सिर्फ जैविक पदार्थ खाते और देशी गाय के दूध-घी का इस्तेमाल करते थे,क्योंकि उस समय रासायनिक याने अंग्रेजी खाद नहीं थी, न ही अंग्रेजी याने जर्सी गाय।) और लिटेनर जिसने उत्तर भारत का सर्वे किया था,९७ प्रतिशत साक्षरता थी। मतलब भारतीय उस समय भी करीब-करीब सत्प्रतिशत साक्षर थे। तब भारतीयों का अध्ययन गुरुकुल के माध्यम से होता था। गुरुकुल में १८ विषयों को पढ़ाया जाता था और वहां रहना पड़ता था। सुबह जल्दी उठने के नियम के कारण व्यायाम होता था और सूर्योदय-सूर्यास्त के समय गोबर के कंडे में घी(घी गाय का होता था हर घर और गुरुकुल में सिर्फ गाय पालन होता था।) के साथ अक्षत की आहूति दी जाती थी। ये कार्य वायुमंडल की शुद्वि के लिएकिया जाता था। मतलब पर्यावरण का ध्यान भी रखा जाता था,साथ ही खेती का कार्य भी करना पड़ता था। तब खेती सिर्फ गोबर खाद से होती थी,यानि सिर्फ जैविक स्वाद के साथ उपचार भी खाने से होता था। बीमारी कम और बीमारी में भी सिर्फ जड़ी-बूटी,जो भी एक प्रकार की जेविक खेती थी,जिस कारण आदमी सर्वगुण सम्पन्न होता था।
उस समय भारत में करीब ७.३२ लाख गुरुकुल और करीब ७.५० लाख गांव थे।  यानि करीब हर जगह पढ़ने की व्यवस्था थी,और गुरुकुलों को चलाने की ज़िमेदारी समाज उठाता था (और अध्ययन सबका निशुल्क तथा समान होता था),सिर्फ  पूर्ण रूप से सरकार पर निर्भर नहीं होता था।  समाज के लोग,जिसमें सभी जाति के लोग शामिल हैं, इसका खर्च उठाते थे।
एक सर्वे के अनुसार मैकाले जिसने भारतीय शिक्षा अधिनियम बनाया,उसने  अपने पिता और शासन को लिखा-अगर भारतीय गुरुकुलों को खत्म नहीं किया तो इन पर शासन करने में दिक्कत होगी। अगर हम यहाँ से चले भी जाएं,और अंग्रेजियत कायम रखना या भारतीय को शरीर से भारतीय और दिमाग से अँग्रेज बनाना है तो गुरुकुल ध्वस्त करने के लिए यह अधिनियम लागू करना चाहिए,और भारतीयों की शिक्षा ऐसी है,जिसमें साधारण बुद्धि की शिक्षा भी अपने-आप आती है,जो आगे बढ़ने के लिए अति आवश्यक है। इसको खत्म करने के लिए यहाँ के शिक्षा तंत्र को पूर्ण रूप से खत्म करना होगा। गाय को खत्म करके गोबर खाद के स्थान पर अंग्रेजी खाद यानि  रासायनिक खाद धीरे-धीरे प्रयोग करवाना शुरू करें,जिससे भारतीय साधारण बुद्धिरहित,बीमार और दिमाग से क्षीण होंगे। इससे जड़ी-बूटी के स्थान पर अपनी अंग्रेजी दवाइयों  का चलन होगा,और आदमी सिर्फ शारीरिक रूप से ठीक होगा। वह दिमागी तौर पर बीमार  होगा और आपस में लड़ते रहेगे। शिक्षा और खानपान पर इस बात और सर्वे को मानते हुऐ यह अधिनियम लागू हुआ। इसी के तहत गुरुकुलों को जलाया,ध्वस्त किया गया। फिर धीरे-धीरे खेती  में रासायनिक और कीटनाशक का प्रयोग करवाया गया। उसने लिखा कि,जिस प्रकार खेत में नई फसल उगाने के पहले हांकना पड़ता है,उसी प्रकार यहाँ के शक्तिशाली शिक्षा के तंत्र को हांकना होगा। मतलब पूर्ण रूप से शिक्षा और खेती को बदलना होगा,जिसके प्रमाण इतिहास में मिलेंगे।
इस गुरुकुल नियम को बदलने की शुरुवात कलकत्ता में पहले कॉन्वेंट स्कूल (जो मुफ्त कहलाता था ) में और फिर विश्वविद्यालय के रूप में हुई। फिर भारतीय अंग्रेजी के गुलाम होते गए और अपनी मातृभाषा को भूलते गए।दरअसल,अंग्रेजी एक सम्पन्न नहीं,दरिद्र भाषा है,किन्तु उन्होंने ऐसा शिक्षा और खानपान तंत्र बदला कि,हम अपनी मातृभाषा को भूल गए। हमने अपनी जो संस्कृति भूली है,उसके भयंकर बुरे या दुष्परिणाम आए हैं,जिनकी भरपाई बहुत मुश्किल है। आज इस देश में मेहनतकश किसान चुंगी नाका देता है और गुंडा यानि नेता(जो कामचोर और बलात्कार और व्यभिचार को संचालित करता है।)दिनभर किसानों के नाम का रोना रोकर देश का पैसा खा जाता है,को नाका मुफ्त है।
सीधी-सी बात है कि,आज अगर भारतीयों को आगे बढ़ना और ख़ुशहाल होना है तो शिक्षा के पुराने यानि बिना आरक्षण के निःशुल्क शिक्षा और खानपान के जैविक तरीके क़ो फिर से अपनाना पड़ेगा,वर्ना हम लार्ड मैकाले के अनुसार शारीरिक रूप से भारतीय और दिमागी तौर पर अंग्रेज यानि गुलाम रहेंगे। अपनी भाषा,शिक्षा और खानपान के क्रम में किसी की नक़ल नहीं करें,  सिर्फ वक्त के साथ आवश्यक सुधार
कीजिए। अपने से बड़े का आदर करें, गैरों की गुलामी न करें। तभी भारत दुनिया का सबसे अच्छा देश बनकर पुनः अपनी पुराने स्वरूप में आ सकेगा।

                                                           #शिवरतन बल्दवा

परिचय : जैविक खेती कॊ अपनाकर सत्संग कॊ जीवन का आधार मानने वाले शिवरतन बल्दवा जैविक किसान हैं, तो पत्रकारिता भी इनका शौक है। मध्यप्रदेश की औधोगिक राजधानी इंदौर में ही रिंग रोड के करीब तीन इमली में आपका निवास है। आप कॉलेज टाइम से लेखन में अग्रणी हैं और कॉलेज में वाद-विवाद स्पर्धाओं में शामिल होकर नाट्य अभिनय में भी हाथ आजमाया है। सामाजिक स्तर पर भी नाट्य इत्यादि में सर्टिफिकेट व इनाम प्राप्त किए हैं। लेखन कार्य के साथ ही जैविक खेती में इनकी विशेष रूचि है। घूमने के विशेष शौकीन श्री बल्दवा अब तक पूरा भारत भ्रमण कर चुके हैं तो सारे धाम ज्योतिर्लिंगों के दर्शन भी कई बार कर चुके हैं।

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।