कुछ तार दिलों के बहके हैं

1
0 0
Read Time2 Minute, 11 Second

mitra-300x186

कुछ तार सुरों के बहके हैं,
मतवारे पंछी चहके हैं।
दिनमान में भी अब दीप जले,
रात में अब दिनकर चमके।

मन सुन्दर वन-सा घना-घना,
लिपटा भावों से हर तरु तना।
वन जीवों-सी चंचल अभिलाषा,
नहीं निर्धारित कोई इनका बासा।
सब अपनी ही धुन में लहके हैं,
कुछ तार सुरों के बहके हैं।
मतवारे पंछी चहके हैं॥

मन चाहे बस सब लिखती जाऊँ,
कभी कवँल कुमुदिनी बन जाऊँ।
फिर रुप अनोखा लिए खिलूँ,
मंडराते भ्रमर दलों के हृदय हरुं।
नव पल्लव झनझन खनके हैं,
कुछ तार सुरों के बहके हैं।
मतवारे पंछी चहके हैं॥

उन्माद उमड़ उर धड़क रहा,
दमित दावानल अब भड़क रहा।

घनघोर घटा भी झमझम बरसी,
भरती नदियां भी प्यासी  तरसी।
काव्यकोष भर छलके हैं,
कुछ तार सुरों के बहके हैं।
मतवारे पंछी चहके हैं॥

मन क्या कहने को व्याकुल है,
बंधे पाश खुलने को आतुर हैं।
गगन भी अब उड़ता दिखता,
चन्द्र नहीं अब सीधा टिकता।
सब बीच अधर में लटके हैं,
कुछ तार सुरों के बहके हैं।
मतवारे पंछी चहके हैं॥

(शब्दार्थ :बासा-रहने से सम्बंधित)

                                                                      #लिली मित्रा

परिचय : इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर करने वाली श्रीमती लिली मित्रा हिन्दी भाषा के प्रति स्वाभाविक आकर्षण रखती हैं। इसी वजह से इन्हें ब्लॉगिंग करने की प्रेरणा मिली है। इनके अनुसार भावनाओं की अभिव्यक्ति साहित्य एवं नृत्य के माध्यम से करने का यह आरंभिक सिलसिला है। इनकी रुचि नृत्य,लेखन बेकिंग और साहित्य पाठन विधा में भी है। कुछ माह पहले ही लेखन शुरू करने वाली श्रीमती मित्रा गृहिणि होकर बस शौक से लिखती हैं ,न कि पेशेवर लेखक हैं। 

matruadmin

Average Rating

5 Star
0%
4 Star
0%
3 Star
0%
2 Star
0%
1 Star
0%

One thought on “कुछ तार दिलों के बहके हैं

  1. बहुत सुंदर
    मन का विहग उमुक्त उड़ानों पर है
    पर ये परवाज बंदूक निशानों पर है
    कल कानन में अनल शिखाये उठी थी
    तरु तने लताये पातप जलाए बैठी थी
    जलाशय क्यों सूखे सन्देह इंसानो पर है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Next Post

सुनहरे सपनों को गढ़ता हूँ

Mon Nov 13 , 2017
शिक्षक हूँ,कई मुसीबतों से लड़ता हूँ, बच्चों के सुनहरे सपनों को गढ़ता हूँ। लेकर आए हैं बच्चे,मेरे पास कुछ आशा, जानते नहीं अपने,भावी जीवन की भाषा उनकी मूक भाषा को,समझता हूँ,पढ़ता हूँ, बच्चों के सुनहरे,सपनों को गढ़ता हूँ। शिक्षक हूँ….॥ मूल कर्म करने से,कई बार रोका जाता है, गैर शैक्षणिक […]

संस्थापक एवं सम्पादक

डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’

29 अप्रैल, 1989 को मध्य प्रदेश के सेंधवा में पिता श्री सुरेश जैन व माता श्रीमती शोभा जैन के घर अर्पण का जन्म हुआ। उनकी एक छोटी बहन नेहल हैं। अर्पण जैन मध्यप्रदेश के धार जिले की तहसील कुक्षी में पले-बढ़े। आरंभिक शिक्षा कुक्षी के वर्धमान जैन हाईस्कूल और शा. बा. उ. मा. विद्यालय कुक्षी में हासिल की, तथा इंदौर में जाकर राजीव गाँधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के अंतर्गत एसएटीएम महाविद्यालय से संगणक विज्ञान (कम्प्यूटर साइंस) में बेचलर ऑफ़ इंजीनियरिंग (बीई-कंप्यूटर साइंस) में स्नातक की पढ़ाई के साथ ही 11 जनवरी, 2010 को ‘सेन्स टेक्नोलॉजीस की शुरुआत की। अर्पण ने फ़ॉरेन ट्रेड में एमबीए किया तथा एम.जे. की पढ़ाई भी की। उसके बाद ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियाँ’ विषय पर अपना शोध कार्य करके पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। उन्होंने सॉफ़्टवेयर के व्यापार के साथ ही ख़बर हलचल वेब मीडिया की स्थापना की। वर्ष 2015 में शिखा जैन जी से उनका विवाह हुआ। वे मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं और हिन्दी ग्राम के संस्थापक भी हैं। डॉ. अर्पण जैन ने 11 लाख से अधिक लोगों के हस्ताक्षर हिन्दी में परिवर्तित करवाए, जिसके कारण वर्ल्ड बुक ऑफ़ रिकॉर्डस, लन्दन द्वारा विश्व कीर्तिमान प्रदान किया गया।