सीमांचल में महात्मा गांधी

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swayambhu
गांधी जयंती विशेष
हिमालय की उपत्यका में गंडक नदी की यह तटवर्ती भूमि वैदिक युग में अनेक ऋषि मुनियों एवं संत महात्माओं की साधना स्थली रही। प्राचीनकाल में यह भू-भाग लिच्छिवी गणराज्य के अंतर्गत था,जहां प्राचीन भारत की सभ्यता और संस्कृति का अभ्युदय हुआ। कालांतर में यह भू-भाग मगध साम्राज्य के अधीन भी रहा। मौर्य वंश के संस्थापक चंद्रगुप्त मौर्य का गहरा संबंध इस भू-भाग से था। महात्मा बुद्ध की इस तपोभूमि में सम्राट अशोक के स्तम्भ आज भी कई स्थलों पर मौजूद हैं। गुप्त वंश के राजाओं तथा हर्षवर्धन का भी इस क्षेत्र से संबंध था। फिर कर्नाटवंशी राजाओं ने भी यहां शासन स्थापित किया। अगले
कालखंड में यह क्षेत्र दिल्ली के अफगान शासन के अधीन आया। इस सल्तनत के पतन के बाद इस क्षेत्र पर मुगलों का आधिपत्य हुआ। इसी शासन काल में बेतिया राज की स्थापना हुई,जिससे इस इलाके का भू-भाग लीज पर लेकर अंग्रेजों ने यहां अपना वर्चस्व स्थापित किया।
चम्पारण का यह भूखंड अंग्रेजों के शासन काल में भी चर्चित रहा। नील की पैदावार के कारण उनकी खास दिलचस्पी इस क्षेत्र में रही। यहां उन्होंने अपनी कई कोठियां स्थापित की। इस जिले का अधिकांश हिस्सा बेतिया राज के अधीन था। अंग्रेजों से लिए गए कर्ज के एवज में जब से बेतिया राज ने इस इलाके की जमीन उन्हें बंदोबस्त कर दी, तभी से अंग्रेजों का प्रभुत्व इस क्षेत्र में बढ़ना शुरू हुआ और धीरे-धीरे चम्पारण का अधिकांश हिस्सा उनके अधीन हो गया।
अंग्रेजी राज में खेतिहर किसान अपनी जमीन के ३/२० हिस्से में नील की खेती करने के लिए कानूनन बाध्य थे। सौ वर्षों से अधिक समय तक वे निलहे साहबों के शोषण और दमन का शिकार होते रहे।
भितिहरवा निवासी पं. राजकुमार शुक्ल के आग्रह पर आज से ठीक १०० साल पहले १९१७ में महात्मा गांधी यहां के किसानों की दुर्दशा देखने चम्पारण आए। यहां के लोगों के दुःख-दर्द को समझा, आत्मसात किया और यही भूमि सम्पूर्ण भारत की स्वतंत्रता के निमित्त उनकी कर्मभूमि बनी।
यहीं से सत्याग्रह के रूप में सत्य और अहिंसा का जो प्रयोग उन्होंने आरम्भ किया,उसकी प्रतिध्वनि भारत के कोने- कोने में सुनाई दी और अंततः उसी प्रयोग ने न सिर्फ चम्पारण के किसानों को तीन कठिया कानून से मुक्ति दिलाई, बल्कि वही प्रयोग भारत के स्वाधीनता संग्राम के लिए मील का पत्थर साबित हुआ।
महात्मा गांधी के आह्वान पर १९२१ में रक्सौल के पुराने एक्सचेंज रोड में राष्ट्रीय विद्यालय की स्थापना हुई,जो स्वतंत्रता संग्राम के दिनों में क्रांतिकारियों की शरणस्थली भी बनी। स्व. महादेव देसाई की डायरी के पन्ने इस घटना क्रम की पुष्टि करते हैं। ‘रिकलेक्टेड वर्क्स ऑफ  महात्मा गांधी वोल. १५’ में भी इसका जिक्र मिलता है।
९ दिसम्बर १९२० को महात्मा गांधी रक्सौल आए थे। डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, मजरूल हक और शौकत अली भी उनके साथ थे। यहां के पुराने एक्सचेंज रोड स्थित हरि प्रसाद जालान की पथारी में उन्होंने भाषण दिया था। उस सभा में रक्सौल के साथ सीमावर्ती क्षेत्र के लोग भी शामिल हुए। उन लोगों ने आगे चलकर स्वतंत्रता आंदोलन में भी बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया।
गांधी के चम्पारण सत्याग्रह को व्यापकता में देखें तो,यह सत्याग्रह केवल यहां के किसानों को अंग्रेजों के शोषण से मुक्त कराने के लिए नहीं था,बल्कि इसी सत्याग्रह ने स्वाधीनता का शंखनाद किया और यहीं से अंग्रेजी राज के खिलाफ आंदोलन पूरे देश में फैला। इसी चम्पारण की भूमि ने गांधी को ‘महात्मा’ बनाया।
चम्पारण सत्याग्रह भारत के स्वतंत्रता संग्राम की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी है और इसके १०० साल पूरे होने पर यहां के लोगों को यह आत्मचिंतन करने की आवश्यकता है कि,इतने गौरवशाली इतिहास के बावजूद भी यह सीमांचल विकास की मुख्यधारा में शामिल क्यों नहीं हो पाया? आखिर क्यों ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व होने के बावजूद यह क्षेत्र उपेक्षित पड़ा रहा। आखिर क्यों यहां राजनीतिक और सामाजिक संकल्प शक्ति का अभाव बना रहा। महात्मा गांधी ने जो लौ यहां के लोगों के दिलों में जलाई, वह समय के साथ मद्धिम कैसे पड़ गई,यहां के लोग उस सत्याग्रह को कैसे भूल गए।
कैसे यह क्षेत्र विकास की मुख्यधारा में जुड़ेगा, कैसे हमारी सरकार और हमारे जनप्रतिनिधि इसके सर्वांगीण विकास के लिए प्रतिबद्ध होंगे, कैसे इस क्षेत्र के विकास की लंबित योजनाएं पूरी होंगी, कैसे यहां की ज्वलंत समस्याओं का समाधान होगा,आज इसी विषय पर विमर्श किए जाने की आवश्यकता है।
इस नगर के गौरव को पुनर्स्थापित करने, इसे स्वच्छ, सुंदर और समृद्ध बनाने का संकल्प लेते हुए आज के दिन हर कोई अपनी अपनी क्षमता के अनुरूप जवाबदेही तय करे,तभी सामाजिक परिवर्तन की शुरुआत होगी और यही उस महामानव के प्रति सबसे बड़ी श्रद्धांजलि होगी…

                                                              #डॉ. स्वयंभू शलभ

परिचय : डॉ. स्वयंभू शलभ का निवास बिहार राज्य के रक्सौल शहर में हैl आपकी जन्मतिथि-२ नवम्बर १९६३ तथा जन्म स्थान-रक्सौल (बिहार)है l शिक्षा एमएससी(फिजिक्स) तथा पीएच-डी. है l कार्यक्षेत्र-सहायक प्राध्यापक(नेपाल) हैं l शहर-रक्सौल राज्य-बिहार है l सामाजिक क्षेत्र में भारत नेपाल के इस सीमा क्षेत्र के सर्वांगीण विकास के लिए कई मुद्दे सरकार के सामने रखे,जिन पर प्रधानमंत्री एवं मुख्यमंत्री कार्यालय सहित विभिन्न मंत्रालयों ने संज्ञान लिया,संबंधित विभागों ने आवश्यक कदम उठाए हैं। आपकी विधा-कविता,गीत,ग़ज़ल,कहानी,लेख और संस्मरण है। ब्लॉग पर भी सक्रिय हैं l ‘प्राणों के साज पर’, ‘अंतर्बोध’, ‘श्रृंखला के खंड’ (कविता संग्रह) एवं ‘अनुभूति दंश’ (गजल संग्रह) प्रकाशित तथा ‘डॉ.हरिवंशराय बच्चन के 38 पत्र डॉ. शलभ के नाम’ (पत्र संग्रह) एवं ‘कोई एक आशियां’ (कहानी संग्रह) प्रकाशनाधीन हैं l कुछ पत्रिकाओं का संपादन भी किया है l भूटान में अखिल भारतीय ब्याहुत महासभा के अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में विज्ञान और साहित्य की उपलब्धियों के लिए सम्मानित किए गए हैं। वार्षिक पत्रिका के प्रधान संपादक के रूप में उत्कृष्ट सेवा कार्य के लिए दिसम्बर में जगतगुरु वामाचार्य‘पीठाधीश पुरस्कार’ और सामाजिक क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए अखिल भारतीय वियाहुत कलवार महासभा द्वारा भी सम्मानित किए गए हैं तो नेपाल में दीर्घ सेवा पदक से भी सम्मानित हुए हैं l साहित्य के प्रभाव से सामाजिक परिवर्तन की दिशा में कई उल्लेखनीय कार्य किए हैं। आपके लेखन का उद्देश्य-जीवन का अध्ययन है। यह जिंदगी के दर्द,कड़वाहट और विषमताओं को समझने के साथ प्रेम,सौंदर्य और संवेदना है वहां तक पहुंचने का एक जरिया है।

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।