कुशीनगर एक्सप्रेस

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rajnish dikshit

शादी के शुरुआती साल और अभी घूमने-घुमाने का दौर जारी था। वह जनवरी का सर्द महीना था, वह भी उत्तर भारत की सर्दी का मौसम। कार्यक्रम बना मुंबई घूमने का। कानपुर से मुंबई और वापसी के टिकट रेल में आरक्षित हो चुके थे। निर्धारित तारीख और समय पर हम लोग कानपुर सेन्ट्रल स्टेशन पहुंच गए थे। हमारे टिकट कुशीनगर एक्सप्रेस में आरक्षित थे। कुशीनगर एक्सप्रेस का कानपुर में समय रात के डेढ़ बजे के लगभग था। स्टेशन पहुंचने पर पता चला कि, गाड़ी एक घंटे देरी से है। पूछताछ खिड़की से पता करके हम लोग निर्धारित प्लेटफार्म पर आ गए थे।

रात का समय और ठंड अपने चरम पर थी। हम लोग एक बैंच पर अपना सामान जमा कर गाड़ी का इंतजार करने लगे।
…अचानक मैं देखता हूँ कि हमारे सामने से एक गाड़ी का आखिरी डिब्बा गुजर रहा था और उस पर लिखा था ‘कुशीनगर एक्सप्रेस’। समझते देर न लगी कि शायद मेरी आँख लग गइ थी और वह गाड़ी जिसका हम इंतजार कर रहे थे, स्टेशन से छूट चुकी थी। मैंने बगल में देखा। सोफिया भी अपना चेहरा आंशिक रूप से शॉल में छिपाए हुए नींद में थी। एक पल के लिए मुझे ऐसे लगा-जैसे चाँद बादलों में से झाँक रहा हो। अगले पल मामले की गंभीरता को देखते हुए मैंने उसे तुरंत जगाया। दोनों ने सामान उठाया और गाड़ी पकड़ने के लिए दौड़ पड़े। अब तक गाड़ी का आखिरी डिब्बा प्लेटफार्म के लगभग आखिरी छोर पर पहुंच चुका था। हम लोगों ने पूरी ताकत से गाड़ी पकड़ने की कोशिश की, मगर नाकाम रहे।

….हम अब बड़ी निराशा से गाड़ी के पीछे जलने वाले लाल रंग के बल्ब की टिमटिमाहट को अंधेरे में धीरे-धीरे विलुप्त होते देख रहे थे। फिर धीरे से हम दोनों ने सामान उठाया और उसी बैंच पर आकर धम्म से बैठ गए। इतनी भयकर ठंड में भी हमें पसीने आ रहे थे। मुंबई घूमने का रोमांच ठंडा पड़ चुका था। घड़ी देखी, ढाई बजे थे। निश्चय किया कि, सुबह होने तक स्टेशन पर ही रुकेंगे और फिर चहल-पहल होने पर घर की ओर प्रस्थान करेंगे।

थोड़ी देर बाद पीछे वाले प्लेटफार्म पर एक मालगाड़ी आकर रुकी। खाकी कपड़ों में एक जनाब आए और अपने हाथ की  नोटबुक में मालगाड़ी के डिब्बों का कुछ ब्योरा लिखने लगे। मुझे पता नहीं क्या सूझा, मैं उन साहिबान के पास जाकर खड़ा हो गया। जब मुझे लगा कि उनका काम

#रजनीश दीक्षित

परिचय : रजनीश दीक्षित का जन्म 1975 में मई में कानपुर(उत्तर प्रदेश) में हुआ है l शिक्षा-एम.टेक.(मैके निकल इंजीनियरिंग) होकर पेशे से निजी कंपनी में महाप्रबंधक हैं l निवास गुजरात के वडोदरा(बड़ौदा) में है l आप लेखन कार्य निबंध,लघुकथा, कहानी,कविता, संस्मरण आदि विधाओं में करते हैं। आपको दयालबाग़ विश्वविद्यालय से निबंध लेखन में स्वर्ण पदक मिला है,जबकि आपकी रचनाएं विविध समाचार पत्रों में प्रकाशित होती रहती हैं l

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।