-प्रभु जोशी

अंग्रेजों के शताब्दियों तक जर-खरीद गुलाम रहे भारत जैसे मुल्कों के बीच, वहां के मीडिया द्वारा बहुत कारगर युक्ति से यह मिथ्या-प्रचार लगातार किया जाता रहा है कि अंग्रेजी ही ‘विश्वभाषा‘ है और उसका कोई ‘विकल्प‘ नहीं है। लेकिन अब सबसे बड़ी विडम्बना यही होने जा रही है कि अभी तक जिस भाषा को ‘निर्विकल्प‘ बताया और घोषित किया जाता रहा था, आज दुनिया की तीन भाषाओं के बढ़ते वर्चस्व से वही बहुत घबरायी हुई है। और क्रमशः वे तीन भाषाएं हैं, स्पेनिश, मंदारिन और हिन्दी।

जहां तक स्पेनिश का सवाल है तो वह तो ‘अंग्रेजी की संरचना‘ में शब्दावलि के स्तर पर सेंध लगा कर उसे ‘स्पेंग्लिश‘ बनाये दे रही है। दूसरे क्रम पर चीन की ‘मन्दारिन‘ है, जो कि बहुत जल्दी, संभवतः चार-पांच वर्षों के भीतर ही वह ’इण्टरनेट’ पर छा जाने वाली है और अंग्रेजी के इस गर्व को चकनाचूर कर देगी कि वही कम्प्यूटर जगत की नियन्ता है। वहां का वैज्ञानिक, इन्टरनेट की तकनालाजी पर जो कुछ नया आता है, उसे लगे हाथ अपनी मंदारिन में विकसित कर लेता है। हाल ही में उन्होंने अश्लील सामग्री के मसले पर गूगल से झगड़ कर उसकी हेकड़ी निकाल कर पूरे विश्व को यह बता दिया कि किसी दिन ‘माइक्रोसाफ्ट‘ ने यदि नजरें टेढ़ी की तो, वह उसके साथ भी यही सलूक करेगा।

हिन्दी से उन्हें इतना भर ही डर है कि यह अपनी आबादी के बल पर ‘दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी बोली जाने वाली‘ भाषा बन रही है और इस आधार पर वह राष्ट्रसंघ की स्वीकृति प्राप्त भाषाओं की सूची में शामिल हो गयी तो धीरे-धीरे यह अपने देश में अंग्रेजी की बढ़त और बिक्री पर रोक लगा सकती है, क्योंकि भारत में अंग्रेजी सिखाने का व्यापार ही अरबों डॉलर का बैठता है। वह तो ठप्प हो ही जाएगा, लेकिन आगे हजारों वर्ष के लिए यही भाषा चलती रही तो क्या होगा ?

हिन्दुस्तान की सबसे बड़ी खूबी यही है कि यहां जिन चीजों से ‘प्राण‘ बचते हों, उनको ही बहुत आसानी से ‘प्राणलेवा‘ बनाया जा सकता है। मसलन जनता के ‘हितों की रक्षा‘ के लिए योजना बनायी जाये, वह ‘जनता के हितों को छीनने‘ का आधार बन जाती है। हिन्दी के संदर्भ में इस सचाई को देखा जा सकता है। दरअस्ल, मैं हिन्दी को भाषा नहीं, एक ‘सामासिक भाषिक परम्परा की शक्तिशाली संज्ञा‘ मानता हूं। मसलन, गौर से देखें तो हम पायेंगे कि हिन्दी की सारी शक्ति उसकी बोलियों में है। क्योंकि, हिन्दी ने उन्हीं अपनी बोलियों से ही समूचा सामर्थ्य और शौर्य अर्जित किया। मुझे तो वह ‘दुर्गा‘ के उस मिथक का पर्याय लगती है, जिसे महिषासुर के मर्दन के लिए देव समाज ने रचा था, जिसमें किसी देवता ने अपना तेज दिया, किसी ने अपना बल, किसी ने अस्त्र तो किसी ने शस्त्र। ‘ततः समस्त देवानाम् तेजोराशिसमुद्भवाम्‘। अर्थात् सभी से तेज-बल ग्रहण कर अवतरित हुई।

इसी तरह हिन्दी ने भी अपनी तमाम विभिन्न बोलियों से तेवर और तेज अर्जित करके आजादी की लड़ाई में ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरूद्ध विजय पायी। और आज वह अपनी चतुर्दिक व्याप्ति से लगभग अट्ठावन करोड़ लोगों की जबान पर है। और इसकी यही संख्या ही तो अंग्रेजी को डरा रही है। नतीजतन, इसके विरूद्ध अघोषित युद्ध शुरू कर दिया गया है कि कैसे इसका आकार छोटा किया जाये। कैसे उसकी उड़ान रोकने के लिए इसे पंख कतर दिये जायें। निस्संदेह यह काम हिन्दी भाषी लोगों ने ही अपने हाथ में ले लिया है। वे उस हिन्दी को जो कि एक बहुत समर्थ भाषा बन चुकी है, ‘बोली‘ बनाने में लगे हैं।

भूमण्डलीकरण और ‘विश्व-पूँजीवाद‘ के लिए भाषा सर्वोपरि है। यदि चीन महाशक्ति होने के निकट है तो सिर्फ ‘मंदारिन‘ के जरिये, क्योंकि उसने बीसवीं शताब्दी का सारा ज्ञान-विज्ञान सिर्फ अपनी उसी ‘चित्रात्मक-लिपि‘ में अर्जित किया, जिसमें लगभग ढाई हजार चिन्ह अक्षरों के रूप में हैं। लेकिन, ‘अ आ‘ से सिर्फ ‘क्ष त्र ज्ञ‘ तक वाली दुनिया की ‘सर्वाधिक लिपि वाली वैज्ञानिक भाषा‘ को ‘ज्ञान की भाषा‘ नहीं बनने दिया गया, परिणामतः वह न तो शिक्षा की भाषा बन सकी, ना ही रोजगार की। निश्चय ही यह अंग्रेजी की कूटनीतिक सफलता रही और अब तो वह भारत में सफलता के सारे गढ़ जीत लेगी क्योंकि हिन्दी-भाषियों ने ही संगठित हो कर हिन्दी के उस ‘दुर्गा रूप‘ का विखण्डन तेजी से शुरू कर दिया गया है। अवधि कहेगी, हमारा तुलसीदास लौटाओ, ब्रज कहेगी, सूरदास लौटाओ, भोजपुरी कहेगी हमारा कबीर लौटाओ, राजस्थानी कहेगी हमारी मीरा लौटाओ, मैथिल कहेगी हमारा विद्यापति लौटाओ, – कुल मिलाकर, नामवर सिंह, केदारनाथ सिंह, नागार्जुन, त्रिलोचन, पर अंग्रेजी में एक पुस्तक आयेगी, ‘हिन्दी राइटिंग ऑफ नॉन-हिन्दी स्पीकर्स‘। क्योंकि, आज के सारे हिन्दी लेखकों के पास कोई न कोई बोली उनके जन्म और बचपन से ही है। वे जनगणना में मातृभाषा की जगह हिन्दी नहीं, इन्हीं बोलियों का नाम लिखेंगे।

इन दिनों विश्व पूंजीवाद का कार्य और व्यवहार के स्तर पर चमकीला और चुस्त जुमला यह है ‘थिंक ग्लोबली, एण्ड एक्ट लोकली। अर्थात् सोचना ‘ग्लोबल‘ करो, लेकिन कार्यान्वयन के स्तर पर ‘लोकल‘ रहो। यानी मैदान की स्थानीयता आपको क्षेत्रीयता से जोड़ रखेगी और जहां तक ‘ग्लोबल थिंकिंग‘ का काम है तो निश्चय ही वह तुम्हें नहीं हमें ही करना है। इसके चलते, ‘स्थानीय अस्मिताओं‘ के आंदोलन खड़े कर दिये गये। सारे हिन्दी राज्यों को इन्हीं तर्कों से तोड़ा और टुकड़ों-टुकड़ों में बांट दिया गया, लेकिन तअज्जुब कि कहीं कोई उसका विरोध नहीं हुआ। ‘थिंक ग्लोबली‘ वालों ने बताया कि ‘छोटे-छोटे राज्य आर्थिक विकास के लिए सर्वाधिक श्रेष्ठ हैं‘, और बस क्या था, ‘एक्ट लोकली‘ वालों ने राज्यों को तोड़ दिया। लेंकिन, जैसे ही मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ में टूटा उसकी राजभाषा ‘छत्तीसगढ़ी‘ घोषित कर दी गयी। झारखण्ड टूटा, झारखण्डी का आंदोलन खड़ा हो गया, हरियाणा ‘हरियाणवी‘ की मांग कर रहा है। ये सब संविधान की आठवीं सूची में शामिल किये जाने के लिए आंदोलन की राह पर जाने को तैयार है। राजस्थान, राजस्थानी की ओर ऐसे ही मालवी और निमाड़ी की मांगें शुरू होंगी। बाद में बुन्देली और बघेली की भी मांगें उठने लगेंगी।

कहा जा रहा है कि जनगणना के समय अपनी मातृभाषा के स्थान पर आप अपनी वो भाषा लिखाओ, जो आपकी ‘बायोलॉंजिकल-मदर‘ बोलती है। निश्चय ही जब जनगणना के आंकड़े सामने आयेंगे तो ‘हिन्दी भाषा-भाषियों‘ की संख्या इतनी दयनीय होगी कि उसके ‘राष्ट्रसंघ‘ तो छोड़िये, किसी ‘जिले की भाषा‘ बनाने का दावा भी समाप्त हो जायेगा। यही तो अंग्रेजी के भाषाई साम्राज्यवाद की मंशा और जरूरत है, जिसे पूरी करने के लिए हिन्दी क्षेत्र का बच्चा-बच्चा तैयार है। उसे बताया जा रहा है कि वह ‘हिन्दी भाषी नहीं है। वह तो निमाड़ी, मालवी, राजस्थानी, छत्तीसगढ़ी, भोजपुरी आदि बोलने वाला है।

चर्चिल ने ठीक की कहा था, ‘ये कभी स्वतंत्र नहीं रह सकते। हमारे गुलाम रहना इनकी आदत का हिस्सा बन चुका है। यदि चाहें तो कुछ समय के लिए आजाद होने का भ्रम पाल लें, लेकिन भीतर से ये पूरी तरह हमारे गुलाम हैं। और एक दिन फिर से हमसे गुलामी मांगने आयेंगे।‘

कुल मिलाकर ‘स्थानीय-अस्मिताओं‘ को ‘राजनीतिक‘ आकांक्षा में बदले जाने का एक खतरनाक रास्ता खोला जा रहा है, वह निश्चय हमें चर्चिल की ‘भविष्योक्ति‘ के निकट ले जाकर छोड़ने वाला है। धर्म के नाम पर हिन्दी का एक बंटवारा पहले ही हो चुका है। अब गहरे राजनीति विवेक के अभाव में लोग अपनी-अपनी ‘बोलियों‘ को ‘भाषा‘ घोषित करवा कर उसे संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने के आंदोलन होंगे और हिन्दी को सैकड़ों टुकड़ों में तोड़ दिया जायेगा। हम बोलियों के बहाने प्रकारान्तर से ‘भाषा‘ और ‘भूगोल‘ के एक महाविनाशकारी द्वन्द्व की तैयारी कर रहे हैं। आप इसके पक्ष में हैं कि इसके विरोध में, यह निर्णय आपकी ‘सार्वभौमिक समझ‘ की शक्ति तभी तय कर पायेगी, जब सौभाग्य से आपकी आंखें ‘राजनीति की रतौंध‘ से संक्रमित न हो पायी हों।

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लेखक परिचय: प्रभु जोशी, कुमार गंधर्व के नगर देवास की धरा पर जन्में, जीवविज्ञान में स्नातक तथा रसायन विज्ञान में स्नातकोत्तर के उपरांत अंग्रेज़ी साहित्य में भी प्रथम श्रेणी में एम.ए.उत्तीर्ण हिन्दी साहित्य के नक्षत्र , कहानीकार, लेखक और चित्रकार जिन्होने माँ अहिल्या के आँचल इंदौर (मध्यप्रदेश) को अपना कर्म क्षेत्र चुना |
आपने बतौर पत्रकार इंदौर से प्रकाशित दैनिक अख़बारों के साथ-साथ आकाशवाणी इंदौर में भी अपनी सेवाएँ दी |राष्ट्रीय और कई अंतराष्ट्रीय पुरूस्कर जैसे बर्लिन में संपन्न जनसंचार के अंतरराष्ट्रीय स्पर्धा में आफ्टर आल हाऊ लांग रेडियो कार्यक्रम को जूरी का विशेष पुरस्कार धूमिल, मुक्तिबोध, सल्वाडोर डाली, पिकासो, कुमार गंधर्व तथा उस्ताद अमीर खाँ पर केंद्रित रेडियो कार्यक्रमों को आकाशवाणी के राष्ट्रीय पुरस्कार। ‘इम्पैक्ट ऑफ इलेक्ट्रानिक मीडिया ऑन ट्रायबल सोसायटी’ विषय पर किए गए अध्ययन को ‘आडियंस रिसर्च विंग’ का राष्ट्रीय पुरस्कार आदि से नवाज़े जा चुके प्रभु जोशी वह व्यक्तित्व है जो ‘हिंदी की हत्या के विरुद्ध‘ सदैव खड़ा रहा | प्रभु जोशी जी जैसी प्रतिभा को जन्म और पोषण देकर मालवा की मिट्टी ने एक बार फिर अपने गहन, गंभीर और रत्नगर्भा होने का प्रमाण दे दिया है |

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