
सत्ता का सुख वे लोग भोगते हैं जो बेशर्म झूठे और मक्कार होते हैं। शालीनता और कायरता में फर्क होता है। सही को सही कहने की हिम्मत जिसमें नहीं है उसको दूसरों के अधीन ही रहना पड़ता है। जो गलत होते देखकर भी आवाज नहीं उठाते उनका भगवान ही मालिक है । किसी भी धर्म जाति या भाषा भाषी परिवार हो ,समाज हो, सामाजिक संस्था हो या कोई कला, संस्कृति , साहित्य या समाज सेवा प्रकोष्ठ या समूह हो, हर जगह संचालक मंडल बनाए जाते हैं। संरक्षक ,अध्यक्ष सचिव और संचालक मण्डल में दबंग सदस्यों को पद देकर जिम्मेदारियां सौंपी जाती हैं।
किसी सदस्य से कुछ पूछा नहीं जाता वे सब एक दूसरे का मुंह देखते हैं और थोपे गए पदों पर सहमति जताते हुए खुद को उदार,बेचारे और शरीफ जताने में लगे रहते हैं । तालियां बजाना, शीश हिलाना जैसे कर्तव्य ये लोग अच्छे से निभाते हैं। इसके अलावा ये कुछ और भी कर सकते हैं ,इस बात पर इन्हे खुद भी भरोसा नहीं होता।ये उस प्रजाति के लोग होते हैं जो जरूरी बैठकों में उबासियां लेते हुए बार -बार घड़ी देखते हैं। उकता कर कभी नींद की झपकियां भी ले लेते हैं । तालियों के शोर से जब इनका सपना टूटता है तब हकबका कर इनके हाथ भी तालियां बजाने वालों में शामिल हो जाते हैं। देश ,समाज ,संस्था, समूह, समितियां और विविध विषयों के मण्डल यानि कि पूरा देश इसी फार्मूले पर चलता है।कहते हैं, देश सुरक्षित है। जिम्मेदार अपना काम बखूबी कर ही रहे हैं।अब आम आदमी की बेफिक्री के लिए इतना सब काफी है।
” जागते रहो “की आवाज अनसुनी करते हुए समय भीअपनी गति से भाग रहा है।
भले ही सारे वातावरण में जहर घुलता जा रहा है। सारी व्यवस्थाएं अनैतिकता और स्वार्थ से बजबजाने लग गई हैं।मगर
” कोऊ नृप होहुं हमें का हानि ” का मंत्र जपने वाले लोग इतने दब्बू हैं कि सही को सही और गलत को गलत भी नहीं कह पाते ।ऐसे लोग ही हमेशा दूसरों की छड़ी से संचालित होते हैं। न्याय अन्याय की बात मत करिए क्योंकि अन्याय उन्हीं पर होता है जो चुपचाप सहन करते हैं।जो विरोध करने की हिम्मत तक नहीं जुटा पाते ऐसे लोगों पर ही अत्याचारी का जोर चलता है। विकास यात्रा अलग-अलग मोर्चे पर जारी रहती है और तालियां बजाने वाले गोल गोल घूमते हुए विकास का जश्न मनाकर समझदार नागरिक होने का प्रमाण पत्र सहेजते रहते हैं।
डॉ. पद्मा सिंह
इन्दौर, मध्यप्रदेश