पत्थर की कहानी

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कहानी पत्थर की
सुनता हूँ तुमको।
बना कैसे ये पत्थर
जरा तुम सुन लो।
नरम नरम मिट्टी और
रेत से बना हूँ में।
जो खेतो में और नदी के
किनारे फैली रहती थी।
और सभी के काम में
बहुत आती थी सदा।।

परन्तु खुदगरजो ने
मुझ पत्थर बना दिया।
न जो सोचता है और न
पिघलता है किसी पर।
बस अपनी कठोरता के
कारण खड़ा रहता है।
और टूटकर भी अकड़
इसकी कम नहीं होती।।

बहुत सहा है दर्द को
और पीया है गमों को।
तभी जाकर ये
बन गया एक पत्थर।
न जो हंसता है और
न ही रोता है कभी।
और हिमालय की तरह
अकड़कर खड़ा रहता है।।

बड़ी अजब कहानी है
इस पत्थर की।
कोई इसको तराश कर
बना देते है भगवान।
और कोई इस पत्थर को
लगा देता है कब्रो पर।
और पूजे जाते है दोनों
अपने अपने अंदाज से।।

जय जिनेन्द्र देव
संजय जैन (मुम्बई)

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।