होश में लाना है तो संवैधानिक डंडा चढ़ाओ।

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  चूंकि मुझे भारत सरकार, समाज एवं बिरादरी सहित अपने परिवार ने भी पागल घोषित कर रखा है। जबकि भारत के सर्वोच्च बुद्धिमान माने जाने वाले अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) नई-दिल्ली के पांच विशेषज्ञों के मेडिकल बोर्ड ने मुझे सम्पूर्ण मानसिक स्वस्थ का प्रमाणपत्र दे रखा है।
  पागल कहने के पीछे का रहस्य यह है कि मैं हमेशा लिखित संवैधानिक डंडा चढ़ाने का पक्षधर हूं और खुलेआम कहता हूं कि किसी को भी होश में लाना है तो उसे संवैधानिक डंडा चढ़ाओ। चूंकि प्रार्थना करने से या गिड़गिड़ाने से कोई नहीं सुनता। जिस पर कहते भी हैं कि लातों के भूत बातों से नहीं मानते।
  उदाहरण स्वरूप गोवंश के एक बछड़े को कोई छः माह पहले एक चालक कुचल कर भाग गया था। जिसे सेवानिवृत्त मुख्याध्यापक गणेश दास जी ने आसरा दिया और दिन-रात सेवा करनी आरम्भ कर दी।
  ज्ञात रहे कि आरंभिक काल में बहुत लोग सेवाभाव में उपस्थित हुए और धीरे-धीरे पीछे हट गए। भाग्यवश एक दिन उन्होंने उक्त बछड़े की चर्चा मुझसे भी की। जिसे मैंने सिरे से नकारते हुए कहा कि मैंने उक्त समाजसेवा अर्थात पागलपन त्याग दिया है। जिस पर उन्होंने दृढ़ स्वर में कहा कि यह पागलपन नहीं बल्कि मानवीय कर्म है और मानवता ही जीवन का आधार है। मैंने बहस नहीं की और चिंतन करते हुए अपने बिखर चुके घर में वापिस आ गया।
  मैंने सनातन धर्म और गोवंश पर बड़े-बड़े दावे करने वालोंं से भी चर्चाएं की थीं। जिन्होंने आश्वासनों के अलावा कुछ नहीं किया। जिससे मुझे असहनीय पीड़ा हुई।
  हालांकि मास्टर जी की विनम्र प्रार्थनाओं पर ज्यौड़ियां पशु-चिकित्सालय के कनिष्ठ चिकित्सा सहायक कभी-कभी बछड़े की सेवा करने आते थे।
  एक दिन मैंने एक गोरक्षक सेवानिवृत्त पशु-चिकित्सक से आग्रह कर उन्हें बछड़े को देखने और यथा उचित उपचार करने के लिए भेजा। जिन्होंने वापिस आकर बताया कि वह बचेगा नहीं। मैंने तुरंत उत्तर दिया कि बचना तो मैंने भी नहीं, तो क्या मुझे अर्थात बिछड़े को तड़पा-तड़पा कर मारोगे? जिस पर कई वर्ष पहले मेरे द्वारा ली गई 'गोरक्षक की उपाधि' वाले उक्त सेवानिवृत्त चिकित्सक झेंपते हुए कहने लगे कि नहीं मैं पशु-चिकित्सक सहायकों को बोल दूंगा, वह दर्दनाशक दवाओं का टीका लगाते रहेंगे।
  समय गतिमान रहा और बछड़े को गहरे घाव हो गये। जिनसे पीप रसने लगी और बदबु आने लगी थी। कदाचित कीड़े पड़ चुके थे कि एक दिन मेरे फोन की घंटी बजी। जिसे सुनने के बाद मुझे मानसिक सुकून मिला। क्योंकि मुझे बताया गया कि बछ़डा मृत्यु या उपचार मांग रहा है।जिसकी याचिका वह अपने संरक्षक सेवानिवृत्त मुख्याध्यापक गणेश दास जी के द्वारा तहसील ज्यौड़ियां के तहसीलदार को देनी है।जिसकी प्रतियां प्रदेश के उप-राज्यपाल तक पहुंचानी हैं। कदाचित उक्त याचिका पशु इतिहास में प्रथम याचिका है।
  अब चढ़ेगा संवैधानिक डंडा। मेरे मुंह से अनायास ही उपरोक्त शब्द निकल पड़े। क्योंकि लिखित प्रतिक्रियात्मक क्रिया आरम्भ होगी। जिससे मानव कर्त्तव्यपालन से लेकर अधिकारिक कर्त्तव्यपालन का पूरा-पूरा निर्वाह होगा। जिससे प्रत्येक सम्बंधित अधिकारी की कर्त्तव्यनिष्ठा की पारदर्शिता भी सार्वजनिक होगी।
  उल्लेखनीय है कि 12 मई 2020 को बछड़े की 'मृत्यु या उपचार' की उचित कार्रवाई हेतु प्रार्थनापत्र तहसीलदार ज्यौड़ियां को दी गई थी।जिन पर पब्लिक ज्वांयट एक्शन कमेटी ज्यौड़िया के अध्यक्ष एवं शनिदेव सेवा समिति छम्ब-ज्यौड़ियां के अध्यक्ष के हस्ताक्षर भी हैं। जिसकी प्रतियां एसडीएम अखनूर, उपजिलाधिकारी जम्मू और उपराज्यपाल जम्मू-कश्मीर को भेज दी गई थीं।
  तहसीलदार ज्यौड़ियां ने प्राप्त याचिका पर त्वरित कार्रवाई करते हुए पशु-चिकित्सालय ज्यौड़ियां के चिकित्सक को उचित कार्रवाई करने हेतु तुरंत आदेश दिया।जिस पर चिकित्सक ने भी देरी न करते हुए तुरंत उपचार आरंभ कर दिया था।
  सम्भवतः उपचार मृत्यु से कहीं आसान था। इसलिए बछड़े को मृत्यु के स्थान पर उपचार वाला संवैधानिक अधिकार प्राप्त हुआ। जो निस्संदेह गंभीर चुनौतीपूर्ण कार्य था। 
  उल्लेखनीय है कि उपचार आरंभ करते ही पशु-चिकित्सक ने लगभग आधा किलोग्राम पीप निकाली व कई प्रकार की औषधियां का प्रयोग किया था। जिसके फलस्वरूप बछड़ा क्षण प्रतिक्षण स्वस्थ हो रहा है और अब तक लगभग 25 प्रतिशत ठीक भी हो चुका है। चूंकि 'भारत रत्न सम्मान' से सम्मानित डॉ.भीमराव अम्बेडकर द्वारा लिखित संविधान का प्रयोग उचित माध्यम से किया गया था। जिससे प्रशासन को दिन में तारे नज़र आना स्वाभाविक था।
  दूसरी ओर उप-राज्यपाल की 'समस्यायों के निदान' से उपरोक्त याचिका उपजिला अधिकारी जम्मू को शीघ्र उचित कार्रवाई हेतु आ चुकी है। जो शेष इतिहास रचेगी।
  अचंभित इस बात पर भी हूं कि गोधन पर राजनीति करने वाले अभी तक उक्त रचे जा रहे इतिहासिक गोवंश यज्ञ में गोरक्षा के नाम पर धन एकत्रित करने वाले कृष्ण भक्त, सनातनी हिन्दू और जम्मू-पुंछ संसदीय क्षेत्र के सांसद, जम्मू-कश्मीर भाजपा उपाध्यक्ष एवं अध्यक्ष अभी तक आहूति डालने से वंचित क्यों हैं?

#इंदु भूषण बाली

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’

29 अप्रैल, 1989 को मध्य प्रदेश के सेंधवा में पिता श्री सुरेश जैन व माता श्रीमती शोभा जैन के घर अर्पण का जन्म हुआ। उनकी एक छोटी बहन नेहल हैं। अर्पण जैन मध्यप्रदेश के धार जिले की तहसील कुक्षी में पले-बढ़े। आरंभिक शिक्षा कुक्षी के वर्धमान जैन हाईस्कूल और शा. बा. उ. मा. विद्यालय कुक्षी में हासिल की, तथा इंदौर में जाकर राजीव गाँधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के अंतर्गत एसएटीएम महाविद्यालय से संगणक विज्ञान (कम्प्यूटर साइंस) में बेचलर ऑफ़ इंजीनियरिंग (बीई-कंप्यूटर साइंस) में स्नातक की पढ़ाई के साथ ही 11 जनवरी, 2010 को ‘सेन्स टेक्नोलॉजीस की शुरुआत की। अर्पण ने फ़ॉरेन ट्रेड में एमबीए किया तथा एम.जे. की पढ़ाई भी की। उसके बाद ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियाँ’ विषय पर अपना शोध कार्य करके पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। उन्होंने सॉफ़्टवेयर के व्यापार के साथ ही ख़बर हलचल वेब मीडिया की स्थापना की। वर्ष 2015 में शिखा जैन जी से उनका विवाह हुआ। वे मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं और हिन्दी ग्राम के संस्थापक भी हैं। डॉ. अर्पण जैन ने 11 लाख से अधिक लोगों के हस्ताक्षर हिन्दी में परिवर्तित करवाए, जिसके कारण वर्ल्ड बुक ऑफ़ रिकॉर्डस, लन्दन द्वारा विश्व कीर्तिमान प्रदान किया गया।