नियम तो एक सजा है

1 0
Read Time4 Minute, 41 Second

हम भारत के लोग हमेशा से नियम तोड़ने में विश्वास रखते है। नियम में रहे तो क्या जीवन। जीवन तो अलमस्त हो तभी मजा है। नियम तो वैसे भी गले में रस्सी जैसा होता है। साला एक सीमा में रहो इससे ज्यादा कुछ मत करो पर हम तो कुछ अलग करने में विश्वास रखते है और नियम-कानून इन सब को तोड़ कर ही सब कुछ करते है।

सरकार ने जब से सिंगल यूज प्लास्टिक पर प्रतिबंध लगाया है। बाजार में, पार्टीयों में तांबे के लोटे और स्टील के गिलास फिर से अपना अस्तित्व जमाने के लिए प्रयास रत है । लेकिन कई सुधिजन है जो लोटे और स्टील के गिलास को हेय दृष्टि से देखते हुए बाजार से दबे छुपे जुगाड़ लगाकर डिस्पोजल गिलास, कटोरी और चम्मच से ही पार्टीयों में मजे उड़ा रहे है । कोई सरकारी नियम का हवाला दे तो कहते है नियम में मजा लिया तो क्या मजा है । नियम तो एक सजा है।

स्वच्छ भारत अभियान चलाया जा रहा है। हमसे ही टेक्स की अतिरिक्त राशि ले कर नगर पालिक निगम हमारे शहर को साफ सुथरा बनाने में लगी है ताकि भविष्य में नम्बर वन का अवार्ड मिल जाए और नेता व अधिकारी तरह-तरह से अनुरोध कर रहे है कि शहर साफ रखे गंदगी न फैलाए वरना जुर्माना लगेगा लेकिन मजाल है कि हम नियम का पालन करे । अभी नवरात्र में खीर और खीचड़ी का प्रसाद मंदिर के बाहर सड़क पर लोगो को पकड़-पकड़ कर बांटा । लोगों ने भी खाया और दोना सड़क पर फैका और चल दिए । नियम तोड़ा सार्वजनिक रूप से पर किसी अधिकारी के बाप की ताकत नहीं की प्रसाद बांटने या खाने वाले पर जुर्माना लगा सके ।सड़क पर बारात और जुलूसों में तो ये नियम डंके की चोट पर हम तोड़ते है ।

चौराहे पर सिग्नल तोड़ कर निकलना तो जैसे गर्व की बात हो इस तरह से लोग लाल बत्ती में तेज गति से निकलते है जैसे नियम इनके बाप की जागीर हो । और जो नहीं निकल पाते या वर्दी वाले के डर के मारे हिम्मत नहीं कर पाते उनका काम नियम की दुहाई देना और मन मसोसकर हरी बत्ती का इंतजार होता है।

मंदिर हो या सिनेमा घर लाईन तोड़कर नियम विरुद्ध जुगाड़ लगा कर आगे लाईन में लगकर होशियार बनने का अवसर कोई भारतवासी नहीं चूकता। ये बात अलग है कि लाख कोशिश के बावजूद कोई पहचान वाला नहीं दिखे और कोई दूसरा जुगाड़ लगा कर निकल जाए तो ईमानदारी की दुहाई देने लगते है।

रेल की टिकट खिड़की पर ‘भय्या रेल निकल जाएगी प्लिज़ हमें टिकट ले लेने दिजिए’ की स्थिती से लगभग हर कोई वाकिफ है । बाकी लाईन में खड़े 50-60 लोग बेवकूफ की तरह उस भय्या वाले या वाली को देखते रहते है और वो घर से देरी से आकर सबको धत्ता दे कर नियम विरुद्ध टिकट ले कर खुशी-खुशी प्लेटफार्म की ओर बढ़ जाते है । बाकी सब मन ही मन कुढ़ते रहते है।

देश की सरकार से लेकर किसी भी छोटे बड़े आयोजन के मंच का माईक जिनके पास होता है। वो सारे नियम तोड़ने का अधिकार रखता है। दो मिनट का समय दो घंटे में भी पूरा नहीं होता। लगता है ब्रह्मा के दो मिनट को मृत्यूलोक में लागु करने का प्रयास कर रहे है। जब तक संचालक हाथ में पर्ची न थमा दे तब तक भरे सदन नियम तोड़ने का मजा लेते रहते है।आखिर नियम से जिए तो क्या जिए मजा तो नियम तोड़ने में है।

#संदीप सृजन

matruadmin

Average Rating

5 Star
0%
4 Star
0%
3 Star
0%
2 Star
0%
1 Star
0%

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Next Post

कितने अलग चेहरे थे

Wed Oct 16 , 2019
सच में रिश्ते तुम्हारे- मेरे कुछ गहरे थे या बुलबुलों की तरह पानी पर ठहरे थे शोर तो बहुत किया था मेरी हसरतों ने लेकिन शायद तुम्हारे अहसास बहरे थे कितनी कोशिश की मैं छाँव बन जाऊँ ख्वाहिशें तुम्हारे चिलचिलाते दोपहरें थे कब देखी तुमने हमारे प्यार का सूरज निगाहों […]

संस्थापक एवं सम्पादक

डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’

29 अप्रैल, 1989 को मध्य प्रदेश के सेंधवा में पिता श्री सुरेश जैन व माता श्रीमती शोभा जैन के घर अर्पण का जन्म हुआ। उनकी एक छोटी बहन नेहल हैं। अर्पण जैन मध्यप्रदेश के धार जिले की तहसील कुक्षी में पले-बढ़े। आरंभिक शिक्षा कुक्षी के वर्धमान जैन हाईस्कूल और शा. बा. उ. मा. विद्यालय कुक्षी में हासिल की, तथा इंदौर में जाकर राजीव गाँधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के अंतर्गत एसएटीएम महाविद्यालय से संगणक विज्ञान (कम्प्यूटर साइंस) में बेचलर ऑफ़ इंजीनियरिंग (बीई-कंप्यूटर साइंस) में स्नातक की पढ़ाई के साथ ही 11 जनवरी, 2010 को ‘सेन्स टेक्नोलॉजीस की शुरुआत की। अर्पण ने फ़ॉरेन ट्रेड में एमबीए किया तथा एम.जे. की पढ़ाई भी की। उसके बाद ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियाँ’ विषय पर अपना शोध कार्य करके पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। उन्होंने सॉफ़्टवेयर के व्यापार के साथ ही ख़बर हलचल वेब मीडिया की स्थापना की। वर्ष 2015 में शिखा जैन जी से उनका विवाह हुआ। वे मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं और हिन्दी ग्राम के संस्थापक भी हैं। डॉ. अर्पण जैन ने 11 लाख से अधिक लोगों के हस्ताक्षर हिन्दी में परिवर्तित करवाए, जिसके कारण वर्ल्ड बुक ऑफ़ रिकॉर्डस, लन्दन द्वारा विश्व कीर्तिमान प्रदान किया गया।