मैं यहाँ तू वहाँ

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kapil shastri

अपनी सुख,सुविधा और आराम के प्रति हर व्यक्ति सचेत होता है,परंतु बात जब ट्रेन से सफ़र की होती है तो ये माध्यम `हाई अलर्ट` पर आ जाता है। सबसे पहली चिंता होती है कि,हम समय पर स्टेशन पहुँच जाए,यातायात में फँस जाने पर एक खीझ आती है,फिर हमारा डिब्बा किस जगह पर आएगा? संकेतक पटल देखते ही हम निर्धारित डब्बे के सामने अपना सामान ले जाते हैं,उससे पहले ही हम एक दो कुलियों से पूछ चुके होते हैं।
सबसे पहले हम ही अपने सामान के साथ चढ़ जाएं,तो समझते हैं कि हमने एक जंग जीत लीl फिर सबसे पहले ही हम अपना लगेज सुव्यवस्थित  ढंग से जमा दें तो सोने पर सुहागा हो जाता है। मोबाइल चार्जिंग प्लग्स पर भी हम फ़ौरन ही अधिकार जमा लेते हैं।पेट-पूजा करने के बाद ही सोने के इंतज़ाम में भी फ़ौरन ही सक्रिय हो जाते हैं। घर में हम भले ही ग्यारह-बारह बजे तक टीवी देखने के बाद सोते हों लेकिन ट्रेन में हमें नौ बजे ही सोने को चाहिए। अपनी सुख-सुविधा में कोई खलल नहीं पड़े,इसके लिए अपने सहयात्रियों के साथ वाकपटुता में भी बहुत इज़ाफ़ा हो जाता है,यानि अपने जीवन के ढर्रे में एक आमूलचूल परिवर्तन आ जाता है।
ऐसी ही एक ट्रेन यात्रा में हम पति-पत्नी पुणे से भोपाल लौट रहे थे। बी-१ कोच में बर्थ नम्बर एक और दो हमें तत्काल टिकट में  दिया गया था। कुछ देर बाद एक मराठी युवक आया और बोला-एक नम्बर मेरा है। हमने आश्चर्य व्यक्त किया-`ऐसा कैसे हो सकता है,एक और दो नम्बर  तो हमारा है और हमने अपनी प्रिंट उसके सामने हाज़िर कर दियाl उसने गौर से देखने के बाद बताया कि,एक नम्बर आपको कोच बी-२  में दिया गया है और दो नंबर बर्थ कोच बी-१  में दिया गया है। हमने अपना टिकट फिर से जांचा,युवक सही था।अर्थात हम मियाँ-बीबी को अलग-अलग कोच में सोना पड़ेगा। हम फ़ौरन ही याचक की मुद्रा में आ गए-`क्या आप हमारी बर्थ पर चले जाएंगे?` श्रीमतीजी ने उससे अनुरोध किया जिसे उसने ये कहते हुए नकार दिया कि-`मैं अपनी परिवार के साथ हूँ।` मैंने कहा -`कोई बात नहीं,रात में मैं दूसरे कोच में सोने चला जाऊँगा।` उस लड़के के साथ एक बीमार खांसती हुई माँ थी और बहन भी बीमार ही लग रही थी।
मैं अपने मोबाइल में लगा हुआ था,जिओ सिम वाला राऊटर साथ ले गया था,इसलिए नेटवर्क बराबर मिल रहा था। इसी बीच श्रीमतीजी ने दूसरे डब्बे की उस बर्थ का मुआयना कर लिया और बताया कि -`उस लोअर बर्थ पर एक सज्जन लेटे हुए हैं,मैंने उनसे बात कर ली है,जब तुम जाओगे तो वो ऊपर वाली बर्थ पर चले जाएंगे।`
विपरीत परिस्थिति में भी वाकपटुता से राह निकाल लेने वाली श्रीमतीजी रात में मुझे उस कोच तक छोड़ने भी आई। वो सज्जन उठ खड़े हुए,जिसके लिए उन्हें पहले से ही तैयार किया जा चुका था। ऐसी थ्री-टायर में सभी काले कम्बल और सफ़ेद चादर में सोते हुए भूत जैसे ही लगते हैं। श्रीमतीजी मुझे आश्वस्त करके चली गई कि`-कोई परेशानी हो तो फ़ोन कर देना।` फिर एक फ़ोन आया भी कि-`ठीक से सो गए।` मैंने कहाँ-`हाँ,सब ठीक है`,मगर सब ठीक नहीं थाl पत्नीजी ने मेरा तकिया बार-बार खुलने और बंद होने वाले गेट की तरफ लगा दिया था जो मुझे बहुत परेशान कर रहा था। मैंने दिशा बदली और फिर वाई-फाई चालू  कर लिया। एक बाल आँखों के पास आकर परेशान करने लगा,मैंने उसे हाथ से झटक दिया,शायद कहीं से उड़कर आ गया होगा,लेकिन नहीं..फिर बाल आ गयाl फिर झटका,फिर आ गया। मोबाइल में पढ़ने की तारतम्यता भंग हो रही थी। मैं खीझकर उठा और अपने पीछे देखा तो सारा माजरा समझ में आया। मिडिल बर्थ पर घोड़े बेचकर सो रही महिला जो खर्राटे भी भर रही थी,उसकी जुल्फें नीचे लटक रही थी और मुझे परेशान कर रही थी। `सुनिए-सुनिए` का उस पर कोई असर नहीं थाl स्पर्श कर कर या उसे झंझोड़ कर उठा भी नहीं सकता था,हाँ उसके बाल नीचे से ज़रूर खीच सकता था,जैसे ट्रेन की ज़ंजीर खीचते हैं ,लेकिन इस विचार पर अमल करने से चप्पलें भी पड़ सकती थी। सो,इस विचार को त्याग कर मैं नीचे से खट-खट करने लगाl महिला की थोड़ी-सी नींद खुली तो मैं नीचे से ही बोला `मैडम,आपके बाल नीचे लटक रहे हैं,इन्हें ऊपर कर लीजिए।` उसने फ़ौरन ही ऊपर खींच लिए।
जयललिता जी अभी-अभी ही इस फ़ानी दुनिया से विदा हुई हैं और उनकी एक हिन्दी  फ़िल्म `इज्जत` का गीत याद आया,जो परदे पर धर्मेन्द्र और तनूजा पर फिल्माया गया था कि `दिलों को बोझ लगते हैं,कभी ज़ुल्फ़ों के साये भी।` ये पंक्तियां इस स्थिति में मुझपे बिलकुल सटीक बैठ रही थी ,क्योंकि जब महिला खर्राटे भर रही हो और शकल भी नहीं दिख रही हो और उस पर नम्र अनुरोध का भी कोई असर नहीं हो तो दिल का बोझ और बढ़ जाता है। बीबी भी सो गई होगी,नहीं तो उसे भी मोबाइल पर सुनाता `मैं यहाँ, तुम वहाँ,ज़िन्दगी है कहाँ।`

                                                                            #कपिल शास्त्री

परिचय : 2004 से वर्तमान तक मेडिकल के व्यापारी कपिल शास्त्री भोपाल में बसे हुए हैं। आपका जन्म 1965 में  भोपाल में ही हुआ है। बीएससी और एमएससी(एप्लाइड जियोलॉजी) की शिक्षा हासिल कर चुके श्री शास्त्री लेखन विधा में लघुकथा का शौक रखते हैं। प्रकाशित कृतियों में लघुकथा संकलन ‘बूँद -बूँद सागर’ सहित ४ लघुकथाएँ-इन्द्रधनुष,ठेला, बंद,रक्षा,कवर हैं। द्वितीय लघुकथा भी प्रकाशित हो गया है। लघुकथा के रुप में आपकी अनेक रचनाएँ प्रकाशित होती हैं।

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।