माँ-बाप बुढ़ापे में बोझ क्यों ?

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pramod

बेटा अपने वृद्ध पिता को रात्रि भोज के लिए अच्छे रेस्टॉरेंट में लेकर गया। खाने के दौरान वृद्ध पिता ने कई बार भोजन अपने कपड़ों पर गिराया। रेस्टॉरेंट में बैठे खाना खा रहे दूसरे लोग वृद्ध को घृणा की नजरों से देख रहे थे,लेकिन वृद्ध का बेटा शांत था।
खाने के बाद बिना किसी शर्म के बेटा, वृद्ध को वॉशरुम ले गया। उनके कपड़े साफ़ किए,उनका चेहरा साफ़ किया, उनके बालों में कंघी की,चश्मा पहनाया और फिर बाहर लाया।
सभी लोग खामोशी से उन्हें ही देख रहे थे। बेटे ने बिल दिया और वृद्ध के साथ बाहर जाने लगा।
तभी डिनर कर रहे एक अन्य वृद्ध ने बेटे को आवाज दी और उससे पूछा ‘क्या तुम्हें नहीं लगता कि,यहाँ अपने पीछे तुम कुछ छोड़ कर जा रहे हो?’ बेटे ने जवाब दिया -‘नहीं सर, मैं कुछ भी छोड़कर नहीं जा रहा।’
वृद्ध ने कहा -‘बेटे, तुम यहाँ छोड़कर जा रहे हो, प्रत्येक पुत्र के लिए एक शिक्षा(सबक)और प्रत्येक पिता के लिए उम्मीद(आशा)।’
दोस्तों, आमतौर पर हम लोग अपने बुजुर्ग माता–पिता को अपने साथ बाहर ले जाना पसंद नहीं करते,और कहते हैं- क्या करोगे,आपसे चला तो जाता नहीं। ठीक से खाया भी नहीं जाता, आप तो घर पर ही रहो,वही अच्छा होगा।’
क्या आप भूल गए, जब आप छोटे थे और आप के माता–पिता आपको अपनी गोद मे उठाकर ले जाया करते थे। आप जब ठीक से खा नहीं पाते थे तो माँ आपको अपने हाथ से खाना खिलाती थी। खाना गिर जाने पर डाँट नहीं, प्यार जताती थी। फिर वही माँ- बाप बुढ़ापे में बोझ क्यों लगने लगते हैं?
माँ-बाप भगवान का रुप होते हैं, उनकी सेवा कीजिए और प्यार दीजिए …..क्योंकि,एक दिन आप भी वृद्ध होंगे, फिर अपने बच्चों से सेवा की उम्मीद मत करना।

                                                                     #प्रमोद बाफना

परिचय :प्रमोद कुमार बाफना दुधालिया(झालावाड़ ,राजस्थान) में रहते हैं।आपकी रुचि कविता लेखन में है। वर्तमान में श्री महावीर जैन उच्चतर माध्यमिक विद्यालय(बड़ौद) में हिन्दी अध्यापन का कार्य करते हैं। हाल ही में आपने कविता लेखन प्रारंभ किया है।

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matruadmin

2 thoughts on “माँ-बाप बुढ़ापे में बोझ क्यों ?

  1. बहुत मार्मिक लघु कथा
    औए यथार्थ से परिचय कराती है

    सो सो नमन है ऐसे बेटे को आप जैसे लेखक को।

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।