बोली विकास मंच :-  एक सिंहावलोकन 

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manoj samariya
साहित्य में क्षेत्रीय बोलियों का बोलबाला न हो तो वह नीरस सा हो जाता है | जी हाँ मैं आँचलिक भाषा के महत्व व विकास की ओर आप सभी का ध्यानाकर्षण चाहूँगा | मेरे पुरोधा आ० शिवपूजन सहाय जी ने पहली बार देहाती दुनिया लिख कर आँचलिक उपन्यासकारों की कतार में पहला नाम दर्ज करवाया |
 मैला आँचल जैसे उपन्यास ,पहलवान की ढ़ोलक और  संवदिया जैसी मानवीय संवेदनाओं के परिपूर्ण आँचलिक कहानियों के जन्मदाता फणीश्वरनाथ ‘रेणु’ को इस परम्परा को आगे बढ़ाने का श्रेय जाता है | उसके बाद तो आँचलिकता की बाढ़ सी आ गई थी | बलचनमा , रति नाथ की चाची आदि |  यह विकसित परिपाटी  जो कि आज पुन: लुप्त होने के कगार पर है | उसे बचाने की पहल के  क्रम में साहित्य संगम संस्थान ने क्षेत्रीय बोलियों को प्रोत्साहन देने के उद्देश्य से बोली संवर्धन कार्यक्रम चलाया | न केवल चलाया वरन इसे बखूबी संचालित करते हुए इतिहास रच दिया | क्षेत्रीय बोलियों का संवर्धन करते हुए , रचनाकारों को ‘क्षेत्रीय बोली गौरव सम्मान ,  , ‘आँचलिक साहित्यकार गौरव  सम्मान ’ ‘फणीश्वरनाथ रेणु सम्मान’ एवं क्षेत्रीय रत्न सम्मान  दिया और उन्हें उनकी मायड़ भाषा के करीब ला खड़ा किया | किसी प्रसिद्ध कवि ने कहा था कि जब मैं मातृभाषा बोलता हूँ तो स्वयं को माँ की गोद में पाता हूँ |
सच्चे अर्थों में रचनाकारों को माँ के आँचल का अहसास करवाया | यह एक दुसाध्य कार्य था जो कि तपस्या माँगता है | इसमें सर्वप्रथम आहुति देने वाले विद्वान मेरे आदर्श संगम संस्थान अध्यक्ष आ० राजवीर जी ‘मंत्र’ हैं | उन्होनें इसकी रूपरेखा आ० तरूण सक्षम जी , आ० अरूण श्रीवात्सव अर्णव दादा , आ० मीना भट्ट जी ,   बहन अनिता मिश्रा जी के साथ सुनिश्चित की थी जिसमें अलंकरण के जादूगर के कार्य को नकारा नहीं जा सकता | हम सब जानते हैं कि पहला कदम बढ़ाना ही हौंसले का कार्य है यदि यह कदम बढ़ जाता है तो फिर कारवाँ बनता चला जाता है | यही हुआ कदम से कदम मिलते गए और मंजिल की ओर बढ़ने लगा यह क्षेत्रीय बोली विकास कार्यक्रम | बीच में उतार चढ़ाव का दौर आया मुख्य समस्या यह थी कि अकेले मंत्र दादा यह सब नहीं कर पाते थे किसी संयोजक की महति आवश्यकता होती | जैसा की संगम का ध्येय वाक्य है :-“ सबका साथ , सबका विकास ” को परिभाषित करते हुए इस पहल में शामिल हुआ जयपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार व समाजसेवी आ० रिखब चन्द राँका ‘कल्पेश’ जी | इनके सहयोग से  एक बार पुनः बोली विकास मंच जीवन्त हो उठा | विभिन्न प्रांतों के साहित्यकार प्रत्येक  माह के प्रथम रविवार को इस मंच को सुशोभित करते , इसके गौरव को बढ़ाते जिससे  क्षेत्रीय बोलियाँ मुखरित होने लगी , प्रमाण पत्र व सम्मान पत्रों की झड़ी लग गई | इन सबके बीच मैं जिक्र करना चाहूँगा विलक्षण प्रतिभा के धनी भवानी मण्ड़ी के सुप्रसिद्ध कवि व पत्रकार आ० राजेश पुरोहित जी का जिन्होनें न केवल साहित्य साधना की वरन इस मंच को जन जन तक पहुँचाया | जो कि उतना ही महत्वपूर्ण था जितना कि संचालन व संयोजन |  जी हाँ इनके सहयोग के दम पर समाचार पत्रों में इसकी खबरें सुर्खियों में छा गई | यह मेरा सौभाग्य कि इसके प्रारंभिक कार्यक्रमों से लेकर वर्तमान तक की यात्रा का मैं साक्षी रहा | हालाँकि मैं निजी जिम्मेदारियों का बहाना देकर किसी दायित्व का निर्वाह नहीं कर सका | यह मेरी विफलता है | परन्तु यदा कदा लेखन में सहयोगी रहा | इस बार के बोली संवर्धन के बारे में दो लाइने लिख सकते है।
 मंच ने अतिथि देवो भव की परम्परा को निभाते हुए राजस्थानी पगड़ी पहनाकर अतिथियों का स्वागत किया , साथ ही सर्वधर्म सम्भाव का संदेश दिया | विभिन्न भाषाओं बोलियों के कलाकारों की प्रस्तुतियाँ ,  लगभग  42 साहित्यकारों ने आँचलिक प्रस्तुतियाँ देकर आ० शिव पूजन सहाय जी व फणीश्वरनाथ रेणु जी   के उद्देश्य को जीवन्त करने का प्रयास किया जो निश्चित ही साहित्य जगत के लिए शुभ संकेत है।
कालान्तर में अन्य साहित्यकारों ने भी अपनी महति भूमिका अदा की जिनमें आ० राजेश तिवारी रामू जी का नाम लेना चाहूँगा | आपने उस समय यह जिम्मेदारी अपने कंधों पर ली जब विद्यालय परीक्षा के कार्य में बंधे राँका साहब एक माह के अवकाश पर चले गए | आपने संयोजन की बागड़ोर अपने हाथ में लेकर आगे बढ़े सौभाग्य बोली विकास मंच का | पुन: राँका साहब का आगमन हुआ और दो महारथी एक साथ इस रथ के सारथी बने आ० राँका साहब और कविवर रामू जी | अपने स्नेहिल व्यवहार और साहित्य साधना के क्षेत्र में कर्मठता के बल पर वर्तमान में भी इस बोली विकास मंच के कुशल सारथी बनकर अपना दायित्व निर्वाह कर रहे हैं |  इन दो महारथियों ने राँका और रामू जी ने इसमें नव प्राण देकर पुनीत कार्य किया है | उनका यह समर्पण अविस्मरणीय रहेगा | उनके साथ उनके सहयोगियों के कार्य को नजर अंदाज नहीं किया जा सकता | आ० बहन दीपाली जी , वरिष्ठ हास्य व्यंग्य कवि आ० सांवर  रासिवासिया जी जिन्होंने पूरे मंच को हास्य से सराबोर रखा , आ० चन्द्र पाल दादा , विशिष्ट अतिथि एन एल गोहिल जी नीतू विनय विजयन्त जी  व अन्य |
इस बोली विकास मंच का जो उद्देश्य निर्धारित किया होगा या कहना चाहूँगा आ० मंत्र दादा के मन में जो होगा वह शायद फलीभूत हो रहा है | दादा को यह देखकर निस्संदेह प्रसन्नता होती होगी | जब माली पौधों को अपने पसीने से  सिंचता है और वो फल देते हैं या छाया देते हैं  तो बड़ा सुकून मिलता होगा |
परन्तु यह अभी मंजिल नहीं पड़ाव हैं | मैं तो  करूँगा यह तो आगाज़ है अभी तो न जाने कितनी आहुतियाँ इसमें हविष्य के रूप में होम होने वाली हैं | परन्तु यह निश्चित है जो भी इस पवित्र यज्ञ में समिधा बनेगा वह निस्संदेह महान होगा उसकी गंध चारों और फैलेगी ||  विभिन्न नामों व अद्भुत , अद्वितीय अलंकरणों से सुसज्जित सम्मान पत्र बनाने का दुरूह कार्य असीम धैर्य के धनी मंडलोई जी कदंब दादा अनवरत कर रहे हैं उनके लिए मेरे पास शब्द नहीं हैं |
इस पुनीत कार्य में अन्य साहित्यकारों का भी अमूल्य योगदान रहा जिनके नाम गिना पाना मेरे सामर्थ्य में नहीं है | मैं क्षमाप्रार्थी हूँ सबके नाम नहीं ले पाया | मुझ मूढ़मति की अल्प बुद्धि में जितने विचार प्रवाहित होते रहे उन्हें कलमबद्ध कर रहा हूँ | इसमें रही त्रुटियों के लिए मैं सदैव क्षमाप्रार्थी रहूँगा | जो इस मंच पर प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से सहयोगी हैं वे अपना सहयोग अनवरत जारी रखें ताकि यह मंच वांछित उद्देश्यों को प्राप्त कर सके |
सादर धन्यवाद |

#मनोज कुमार सामरिया ‘मनु'

परिचय : मनोज कुमार सामरिया  `मनु` का जन्म १९८५ में  लिसाड़िया( सीकर) में हुआ हैl आप जयपुर के मुरलीपुरा में रहते हैंl बीएड के साथ ही स्नातकोत्तर (हिन्दी साहित्य ) तथा `नेट`(हिन्दी साहित्य) भी किया हुआ हैl करीब सात वर्ष से हिन्दी साहित्य के शिक्षक के रूप में कार्यरत हैं और मंच संचालन भी करते हैंl लगातार कविता लेखन के साथ ही सामाजिक सरोकारों से जुड़े लेख,वीर रस एंव श्रृंगार रस प्रधान रचनाओं का लेखन भी करते हैंl आपकी रचनाएं कई माध्यम में प्रकाशित होती रहती हैं।
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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।