चुनाव,पार्टियां,चुनावी घोषणापत्र और हम”

anup saini
आज गर्व के साथ हम यह कह सकते हैं कि हम विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र का हिस्सा हैं। “लोकतंत्र” यानी शासन व्यवस्था की वह प्रणाली जिसमें हर बार जनता को अपना भाग्यविधाता चुनने का अवसर मिलता है। इसी लिए देश के किसी न किसी हिस्से में हर वर्ष चुनाव होते रहते हैं।
देशव्यापी होने वाले चुनावों में,खासकर लोकसभा और विधान सभा के चुनावों में सभी पार्टियां जोर शोर से चुनाव मैदान में उतरती हैं। उस समय पूरा देश चुनावी अखाड़ा बन जाता है। सभी अपना दम खम दिखाते हैं। यही वो समय होता है जब जनता जनार्दन बन जाती है और जनमत को अपने पक्ष में करने नेता और पार्टियां हर तरीक़े के हथकंडे अपनाते हैं। जनता को रिझाने के हर सम्भव प्रयास किये जाते हैं।
इन्ही प्रयासों की वृहत रूप स परिणति होती है देश की बड़ी पार्टियों द्वारा जारी किए गए “चुनावी घोषणापत्र”।
इसे आप चुनाव जीतने,जनता को लुभाने की दिशा में  किया गया एक बड़ा प्रयास में सकते हैं।
इसमें वे सभी लोक लुभावन वादे होते हैं जिन्हें पूरा करने का सभी पार्टियां वचन देती हैं।
इस घोषणापत्र का जोर शोर से प्रचार भी किया जाता है। चुनावी समय में यही घोषणा पत्र पार्टी की आवाज और उसका मेनिफेस्टो बन जाता है। इसी में किये गए वादों को पूरा करने के नाम पर ही जनता से वोट मांगे जाते हैं।
लेकिन जैसा कि इतिहास रहा है कि चुनाव जीतने के बाद घोषणापत्र और उसके वादे, सपने और उन्हें पूरा करने की कसमें खाने वाले नेताजी उसी तरह गायब हो जाते हैं जिस प्रकार गधे के सिर से सींग।
जनता फिर मुँह ताकती हुई,ठगी की ठगी रह जाती है। जनता की नींद जब तक खुलती है तब तक वे इस छल का शिकार हो चुके होते हैं।
अब सोचने वाली बात यह है कि एक राष्ट्रीय स्तर की पार्टी अगर झूठ का सहारा लेकर सत्ता में आती है। क्योंकि अब जबकि वो सत्ता में आ चुकी होती है और अपने किए हुए चुनावी वादे पूरे नही करती है।इसका अर्थ तो यही हुआ कि वे सभी वादे चुनाव जीतने के लिए बोले गए झूठ मात्र थे।
एक आम आदमी की एक छोटी सी गलती ही अपराध बन जाती है।
एक व्यक्ति को अदालत में झूठी गवाही देने पर ही सजा हो जाती है।
लेकिन पूरे देश के सामने झूठ बोल कर सत्ता हासिल करने वालों के लिए इसका कोई प्रावधान नही है। एक ऐसा झूठ जो आपने सभी के सामने , कितनी ही बार सार्वजनिक मंचो के माध्यम से बोला है। यह बात दीगर है कि आप उसमें नीचे की तरफ अति सूक्ष्म शब्दों में यह लिखकर कि पार्टी इन्हें पूरा करने का प्रयास करेगी; तुम इसे नीति निर्देशक तत्त्वों की श्रेणी में शामिल करवा देते हो।
दूसरी बात यह भी विचारणीय है कि जब आपके घोषणापत्र की कोई वैधानिकता ही नही है तो इसे पार्टियों द्वारा जारी करने का औचित्य ही क्या है? क्यो इसके नाम पर छाती पीट पीट कर वोट मांगे जाते है? क्यो इसे चुनाव होते ही डस्टबीन के हवाले कर दिया जाता है।
इस बारे में गहनता से विचार करने की आवश्यकता है कि जब घोषणापत्र में कही गई बातें मात्र चुनावी स्टंट साबित हो रही हैं तो क्यों न इसे बंद करवाया जाए,क्यो कि इसके नाम पर पार्टियां जनमत को प्रभावित करती हैं।
अगर जारी किया ही जाए तो इसे एक वैधानिक दस्तावेज बनाया जाए,जिसे पूरा करने को प्रत्येक राजनैतिक दल बाध्य हो। ऐसा करने से देश और जनता को कई फायदे हो सकते हैं जैसे पार्टियां और उनके नेता जनता की भावनाओं से खिलवाड़ न कर सकेंगे। ऐसे हवाई वादे जो कभी पूरे न हों,जैसा कि सभी नेता करते हैं, करने से बचेंगे।ऐसी योजनाएं जो कभी सम्भव ही न हों,की घोषणा करने पर रोक लगेगी। युवाओं को झूठे रोजगार के सपने, झाँसेबाजी पर रोक लगेगी।
पार्टी द्वारा अपने चुनावी घोषणापत्र में किए गए वादों को पूरा न करने पर सजा अथवा जुर्माने का प्रावधान हो क्योंकि उनके द्वारा किए गए वादों ने जनता को लालायित किया है,आकर्षित किया है,फलस्वरूप जनमत उनकी और झुका है जो कि चुनावी समय में आदर्श आचार संहिता का भी स्पष्ट उल्लंघन है।
अतः ऐसे किसी भी प्रकार के घोषणापत्रों से चुनाव आयोग द्वारा भी पूर्णतः रोक लगनी चाहिए
 ऐसा करने पर ही किसी भी पार्टी के घोषणापत्र की सार्थकता हो सकती है।
तभी इस देश में लोकतंत्र सफल हो सकता है।…बेबाक़
परिचय-
अनूप सैनी ‘बेबाक़’
गांव- शेशू
वाया- बिसाऊ
जिला झुंझुनूं, राजस्थान-

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