वह

aalok pandey
वह
हर दिन आता
सोचता
बडबडाता,घबडाता
कभी मस्त होकर
प्रफुल्लता, कोमलता से
सुमधुर गाता…
न भूख से ही आकुल
न ही दुःख से व्याकुल
महान वैचारक
धैर्य का परिचायक
विकट संवेदनाएँ
गंभीर विडंबनाएँ
कुछ सूझते ध्यान में पद,
संभलता, बढाता पग !
होकर एक दिन विस्मित्
किछ दया दूँ अकिंचित्
इससे पहले ही सोचकर…
कहा, जाने क्या संभलकर
लुटती, टुटती ह्रदय दीनों की
नष्ट होती स्वत्व संपदा सारी
मुझे क्या कुछ देगी
ये व्यस्त, अभ्यस्त दुनिया  भिखारी !
लुट चुके अन्यान्य साधन
टुट चुके सभ्य संसाधन
आज जल भी ‘जल’ रहा है-
ये प्राणवायु भी क्या रहा है ?
आपदा की भेंट से संकुचित
विपदा की ओट से कुंठित
वायु – जल ही एक बची है-
उस पर भी टूट मची है |
ह्रदय की वेदनाएँ
चिंतित चेतनाएँ
बाध्य करती ‘गरल’ पीने को
हो मस्त ‘सरल’ जीने को
करता हुँ सत्कार,
हर महानता है स्वीकार;
पर, दुःखित है विचार
न चाहिए किसी से उपकार|
दया-धर्म की बात है,
किस कर्म की यह घात है
‘उर’ विच्छेद कर विभूति लाते; ‘जन’ क्यों ऐसी सहानुभूति दिखाते ?
हर गये जीवन के हर विकल्प,
रह गये अंतिम सत्य-संकल्प !
लेता प्रकृति के वायु-जल
नहीं विशुद्ध न ही निश्छल
न हार की ही चाहत
न जीत की है आहट
विचारों में खोता
घंटों ना सोता
अचानक-
तनिक सी चिल्लाहट
अधरों की मुस्कुराहट
न सुख की है आशा
न दुःख की निराशा
समय-समय की कहानी
नहीं कहता निज वाणी,
अब हो चुके दुःखित बहु प्राणी;
होती पल-पल की हानी |
न जाने कब की मिट चुकी आकांक्षाएँ,
साथ ही संपदाएँ और विपदाएँ|
दुनिया ने हटा दी-
अस्तित्व ही मिटा दी
सोचा ! कुछ करूँ
जिऊँ या मरूँ ?
कुछ सोच कर संभला था,
लेकिन बहुत कष्ट मिला था…
कारूणिक दृश्य देखकर
ह्रदय से विचार कर
कहा – “भाग्य-विधाता”
निर्धन को दाता
मुझे ना कुछ चाहिए
पर
व्रती , धन्य
अनाथों को क्यों सताता ?
यह सुनकर मैं बोला –
स्तब्धित मुख को खोला
ये अब दुनिया की रीत है
स्वार्थ भर की प्रीत है
समझते ‘जन’ जिसे अभिन्न
वही करते ह्रदय विछिन्न !
नहीं जग महात्माओं को पुजता
वीरों को भला अब कौन पुछता
पीडितों के प्राण हित-
मैं भी प्रतिपल जिया करता हूँ
‘उर’ में ‘गरल’ पीया करता
हूँ !
अंतर्द्वन्द से क्षणिक देख
पहचान ! जान सुरत निरेख !

अखंड भारत अमर रहे !

#आलोक पाण्डेय
( वाराणसी )

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संस्थापक एवं सम्पादक

डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’

मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष, ख़बर हलचल न्यूज़, मातृभाषा डॉट कॉम व साहित्यग्राम समाचार पत्र के संपादक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मध्य प्रदेश ही नहीं अपितु देशभर में हिन्दी भाषा के प्रचार, प्रसार और विस्तार के लिए निरंतर कार्यरत हैं। लगभग दो दशकों से हिन्दी पत्रकारिता में सक्रिय डॉ. जैन के नेतृत्व में पत्रकारिता के उन्नयन के लिए भी कई अभियान चलाए गए। आप 29 अप्रैल को जन्मे तथा कम्प्यूटर साइंस विषय से बैचलर ऑफ़ इंजीनियरिंग (बीई-कम्प्यूटर साइंस) में स्नातक होने के साथ आपने एमबीए किया तथा एम.जे. एम सी की पढ़ाई भी की। उसके बाद ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियाँ’ विषय पर अपना शोध कार्य करके पीएच.डी की उपाधि प्राप्त की। डॉ. अर्पण ने 35 लाख से अधिक लोगों के हस्ताक्षर हिन्दी में परिवर्तित करवाए, जिसके कारण आपको विश्व कीर्तिमान प्रदान किया गया। अब तक आप 15 पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं। इसके अलावा साहित्य अकादमी, मध्य प्रदेश शासन द्वारा वर्ष 2020 के अखिल भारतीय नारद मुनि पुरस्कार से पुरस्कृत हुए हैं। साथ ही, आपको वर्ष 2023 में जम्मू कश्मीर साहित्य एवं कला अकादमी व वादीज़ हिन्दी शिक्षा समिति ने अक्षर सम्मान, वर्ष 2024 में प्रभासाक्षी द्वारा हिन्दी सेवा सम्मान, वर्ष 2025 में लघुकथा शोध केन्द्र भोपाल द्वारा विशिष्ट हिंदी सेवा सम्मान तथा वर्ष 2026 में वर्ल्ड रिकॉर्ड ऑफ़ एक्सीलेंस, इंग्लैंड द्वारा सम्मानित किया गया है। इसके अलावा आप सॉफ़्टवेयर कम्पनी सेन्स टेक्नोलॉजीस के सीईओ हैं, साथ ही, लगातार समाज सेवा कार्यों में भी सक्रिय सहभागिता रखते हैं। कई दैनिक, साप्ताहिक समाचार पत्रों व न्यूज़ चैनल में आपने सेवाएँ दी हैं। भारतभर में आपने हज़ारों पत्रकारों को संगठित कर पत्रकार सुरक्षा कानून की माँग को लेकर आंदोलन भी चलाया है। वर्तमान में आप देशभर में हिन्दी आन्दोलन का नेतृत्व करने के कारण हिन्दी योद्धा के रूप में पहचाने जाते हैं।