बाजार वेब

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एकबारगी मैं तो पहचान ही नहीं पाया उन्हे ।
कहां वो अन्नपूर्णा भाभी का चिर-परिचित नितांत घरेलू व्यक्तित्व , और कहां आज उनका ये अति आधुनिक रूप ! इस वक्त तो चोटी से पांव तक वे पूरी तरह बदली-बदली सी लग रही थीं ।
इस वक्त उन्हे यहां देखकर मुझे बड़ा बिस्मय हुआ । कस्बे के नये खुले इस फास्टफूड कॉर्नर से, वे जिस व्यक्ति के साथ निकल रहीें थीं , वह सोसाइटी का कोई भला आदमी नहीं कहा जा सकता था ।  मुझे तो ऐसा अनुभव हुआ कि सिर्फ  संग-साथ वाली बात नहीं , यहां कुछ  दूसरा ही मामला  है । क्योंकि वे बात-बेबात  उस भले आदमी से सट-सट जाती थीं , जैसे उसे पूरी तरह रिझाना चाहती हों  !
आज उनने बनने संवरने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ रखी थी । उनके चमक छोड़ते गोरे बदन पर मंहगे और उम्दा कपड़े सरसरा रहे थे । हल्की शिफॉन की मेंहदी कलर की साड़ी से मैच करता, महीन पारदर्शी कपड़े का लो-कट ब्लाउज , इसी रंग की बिन्दी और कलाई भर चूड़ियाँ , पांव में मेंहदी कलर की ही चौड़े पट्टे की डिजाइनदार चप्पलें और ताज़्जुब तो ये कि हाथ के पर्स का भी वहीं
रंग । मैंने उन्हे गौर से देखा तो ठगा-सा  रह गया ।
उनका हमेशा का चलने-फिरने और बोलने-बतियाने का वो निहायत घरेलू ढंग, इस वक्त एक मोहक और आकर्षक अदा में तब्दील हो चुका था ।
मैं ऐसी जगह खड़ा था, जहां वे मुझे जरूर देख लेते । शायद मुझे यहां पाकर कोई उन्हे संकोच अनुभव हो ,यह सोचकर मैं वहां से हटा और पीसीओे बूथ की ओट मंे आ गया । वे दोनों सड़क पार करके इसी तरफ चले आ रहे थे । मैंने जी कड़ा कर लिया -अब जो होना हो , सो हो ।
लेकिन तब मुझे थेाड़ी राहत मिली , जब मैंने देखा कि वे दोनों पीसीओ वूथ में प्रविष्ट हो गये हैं। वे कह रहीं थी-‘‘आप गलत अर्थ मत लगाइये , किसी के यहां जाने से पहले  आजकल फोन कर लेना ठीक रहता है। इस वक्त पता नही,ं वे फुरसत में हैं या नहीं , या यह भी हो सकता है कि , वे पहले से ही कहीं बाहर चले गये हों ।‘‘
उनके साथ वालेे  व्यक्ति ने निरपेक्ष भाव से कहा था-‘‘ अरे मैं कहां गलत अर्थ लगा रहा हूँ ! आप का कहना दुरूस्त है । अपने यहां तो वैसे भी समय लेकर पहुंचने का नियम है  न मैडम ।‘‘
वूथ में फोन डायल करने तक सन्नाटा रहा , फिर कुछ देर बाद उन साथ वाले सज्जन की आवाज गूंजी-‘‘ हलो सिमरनपुर से ! ़ ़ ़़़ ़ ़ ़ पटेल साहब हैं क्या ? मैं मनीराम बोल रहा हंू । जरा बात कराइये  उनसे ।‘‘
़ ़ ़ ़ ़ ़ ़ ़ ़ ़ ़ ़ ़ ़
              ‘‘ हलो पटेल साहब, मैंने कहा था न , मैं आज मिलने आ रहा हंू ।  उन्हे साथ ला रहा हूं । ‘‘
               कुछ देर बाद वे लोग बाहर आये । मनीराम ने जेब से चाभी निकाल कर अपनी वाइक स्टार्ट की और मुस्करा के उनकी ओर देखने लगा । अन्नपूर्णा भाभी  बेपनाह आत्मीयता झलकाती हुयी , उसके कंधे का सहारा लेकर वाइक पर पीछे बैठ गयीं । गियर डाल के मनीराम  ने एक झटके से अपनी गाड़ी आगे वढ़ायी, तो वे उसकी पीठ पर लद सी गयीं ।
मैं पीसीओ के पीछे से आगे  आ गया । जाती हुयी मोटरसाइकिल की दिशा में मैंने उदास मन से देखा तो पाया कि वे जाने किस बात पर खिलखिला कर हँस रहीं हैं । उनकी उन्मुक्त हँसी यहां तक सुनाई पड़ रही थी । अब मुझे क्षोभ हो रहा था कि मै खा़मोख़ां संकोच में फंस कर ओट में चला गया , मुझे तो उस वक्त बेहिचक सामने आकर उनसे कुशल क्षेम पूछना थी ।
खैर , अब तो मामला हाथ से निकल चुका है । मैं निराश होकर वहां से मुड़ा और गाड़ी उठाके अपने बीमा ऑफिस की तरफ चल पड़ा ।
            अगले दिन मन न माना तो मैं सुबह-सुबह सिविल-लाइन्स में उनके घर जा धमका ।
उनके सरकारी क्वार्टर के बाहर , बाउंण्ड्रीवाल पर पुरानी नाम-पट्टिका की जगह पीतल की नयी चमकदार प्लेट लग चुकी थी-भरत वर्मा, क्षेत्रीय अधिकारी ।
दरवाजा वर्माजी ने खोला । मुझे देख कर वे थोड़ा सहमे -‘ क्यों अमर ,बीमा का प्रीमियम ड्यू हो गया क्या?‘‘
हमेशा बनियान-पैजामा पहने रहने वाले वर्माजी को मैंने अच्छी क्वालिटी के गाऊन में सजा-धजा देखा तो मुझे उनमें कुछ बदलाव महसूस हुआ । पर जब गौर किया  तो मैंने उनके पैतालीस वर्षीय बदन को पहले जैसा ही  दुबला और कमजोर पाया । वही गरदन के पास से झांकती कॉलर-बोन ,कपोलों पर मांस से ज्यादा हाड़ दर्शाता सूखा-सा चेहरा ओैर वे ही खपच्चीयों से लटके, दुबले, लम्बी अगुंलियों वाले हड़ियल हाथ । उन्हे आश्वस्त करता हुआ मैं बोला-‘‘ नहीं वर्मा जी , प्रीमियम तो तीन महीने बाद है ! मैं तो बस यूं ही !‘‘
‘‘ कोई बात नहीं ,स्वागतम्  ! आइये न !‘‘
मैं प्रसन्न मन से भीतर घुसा और सोफा की सिंगल सीट पर पसर के बैठ गया । वर्माजी मेरे ऐन सामने बैठे, फिर मुस्कराते हुये बोले-‘‘ और सुनाइये, आपकी प्रोग्रेस कैेसी है ? अब तक ‘‘डी एम क्लब ‘‘  के मैम्बर बने या नही !‘‘
‘‘ हां , वो तो मैं दो बरस पहले ही बन गया था , अपनी ब्रांच का पहला करोड़पति एजेण्ट हूूं मैं ।‘‘ बताते हुये मैं पुलकित था , पर  भीतर ही भीतर सोच रहा था कि पहले कभी किसी बात में रूचि न लेने वाले वर्माजी आज बड़ेे व्यवहारिक दिख रहे है । ऐसा क्यों है ?
‘‘ कौन हैं जी !‘‘ यकायक भीतर से अन्नपूर्णा भाभी की  मीठी आवाज आयी, तो मेरा दिल उछल के हलक में आ गया । मेेरी निगाहें बैठक कक्ष के भीतरी दरवाजे पर टिक गयीं ।
सुआपंखी रंग की ज़मीन पर गहरे काले रंग की छींट वाला , सूती कपड़े का ढीला-ढाला गाऊन पहने, दोनों हाथ पीछे करके जूड़ा बांधती वे जब नमूदार हुयीं , तो मैं ठगा सा उन्हे देखता ही रह गया । इस अस्त-व्यस्त दशा में भी वे गजब की जम रहीं थीं ।
मुझे देखकर वे गहरे से मुस्करायीं और हाथ जोड़कर बोलीं-‘‘ अरे गुप्ताजी नमस्कार !  ़ ़ ़ ़़ ़ बड़ी उमर हैं आपकी  ! मै कल  इनसे कह रही थी, कि एक दिन आपसे मिलना है । आप न आते तो मैं आज ही आपके पास आ रही थी ।‘‘
‘‘ तो ठीक है  ! अभी आप सुबह के काम-धाम में व्यस्त हांेंगी । मैं शाम को घर पर आपका इन्तजार करता हंू ।‘‘ कहते हुये मैंने उठने का उपक्र्रम किया , तो वे चौंकती सी बोली -‘‘ अरे आप उठ क्यों रहे हैं ! जिस काम से मुझे आना है ,उसके लिये मैं वहीं आऊँगी । आप बैठिये तो  ! अपन लोग गपशप करते हैं।‘‘
फिर यकायक वर्माजी की तरफ मुड़के उनने आग्रह सा किया-‘‘ आप चाय बना लेंगे प्लीज !‘‘
 ‘‘ ओ के‘‘ कहते हुये  वर्माजी निरपेक्ष भाव से अपनी जगह से उठे, तो मैं फिर से बिस्मय में डूब गया था , अरे इतना परिवर्तन कैसे हो गया इस घर में ! वर्माजी तो हद दरजे के प्राच्यवादी पुरूष थे ।  पहले इन्हे भला यह कहां सुहाता था , कि कोई गैर व्यक्ति इनकी पत्नि के साथ बैठके गपशप करे। जरूर कोई क्र्रांति  हो गयी है इस घर में ! तभी तो पहली बार इतनी उम्दा आपसी समझ देख रहा हूं मैं यहाँ ।
मुझे सोच में पड़ा देख वर्माभाभी के चेहरे पर कौतूहल का भाव झलका । मेरा हाथ हिलाकर उनने  मुझे टोका ं-‘‘आप किस टैन्शन में फंसे है आज !‘‘
‘‘ कहां ़ ़ ़ ? मैं किसी टैन्शन में नहीं हूँ ।‘‘ कहता हुआ मैं मुस्कराने की व्यर्थ सी चेष्टा करने लगा-‘‘आपके बच्चे नही दिख रहे आज ! ‘‘
‘‘ वे दोनों स्कूल गये हैं ‘‘ कहते हुये बड़ी उत्सुकता से उनने मुझसे पूछा-‘‘आपने बीमा एजेंसीं लेते वक्त , ग्राहक को डील करने का कोई खास कोर्स किया था क्या ?‘‘
‘‘ नहीं तो , बस पन्द्रह दिन का ओरियेंटेशन प्रोग्राम हुआ था ,मंडल कार्यालय में ! क्यों कोई खास बात ?‘
‘‘ना ! बस ऐसे ही पूछ रही थी । हाँ, यह तो बताइये कि भाभी जी कहां तक पढ़ी लिखी है ?़ ़ ़मतलब आपकी मिसेज ! ‘‘
मुझे लगा , कोई ख़ास बात है, इसी वजह से वे इतना अपनत्व जता रही हैं।
              मेरी पत्नी को खूब पढ़ा-लिखा जान कर वे बड़ी खुश हुयीं, बोलीं-‘‘गुप्ता जी ,आपने कभी सोचा कि हमारी सोसायटी में केवल दो वर्गों के लोग सुखी हैं -एक अपर क्लास , दूसरी लोअर क्लास । उन लोगों में न बेकार के टेबू हैं , न छोटे-बड़े काम का झंझट । उन्हे तो हर वो काम  अच्छा लगता है ,जो पैसा दे सके ।  ़ ़ आज की दुनिया में पैसा सबसे बड़ा भगवान है । पैसा है तो हर चीज़ है-  इज्जत ,प्रतिष्ठा, सुख ,शांति ़ ़ ़ ़ ़ ़यानी की सब कुछ । वेस्टर्न कंट्री के लोग, कभी बेकार की चकल्लस में नहीं पड़ते । सिर्फ़ हम लोग ख़ामोंखां के संकोचों में फंसे रहते हैं । ज्योे-ज्योें आधुनिक जमाना आ रहा है ,हम त्योें-त्यों कल्चर्ड होते जा रहे हैं। एक ओर तो सब तरफ ग्लोबनाइजे़शन का जोर है , दूसरी ओर हमारी सोच दिनोंदिन संकरी होती जा रही है । ‘‘
              वे बड़े ही धाराप्रवाह ढंग से मुझसे बोलने में जुट गयीं, जैसे इस विषय का कोई ख़ास कोर्स कर लिया हो उनने,  मैं भकुआया-सा उन्हे ताक रहा था ।
वर्माजी चाय बहुत अच्छी बनाने लगे थे ।
बिस्कुट कुतरते समय वे गहरे सोच-विचार में डूबी दिख रहीं थीं । मैं उनके व्यवहार पर क्षण-क्षण चकित था । यूं बीमा की किश्त लेने मैं हर छह माह में इनके यहां आता रहा हूँ और बीच में  नयी लांच की गयी  पॉलिसी के लिये उनको पटाने भी मैं अक्सर आ जाता था , पर वे इतना खुलकर कभी नहीं मिली । प्रायः वर्माजी से बातचीत होती थी , ये बीच में कभी-कभार बैठक में आती थीं, तो नमस्कार करके तुरंत भीतर चली जाती थीं ।
      शाम को बाजार से घर लौटकर , मैं बाथ रूम से बाहर ही आया था कि पत्नी ने आंखें चमकाते हुये कहा-‘‘जाओ , बैठक में एक स्मार्ट और सुंदर सी महिला आपसे मिलना चाहती है । ‘‘
मै समझ गया कि वे ही होंगी । पांच मिनट में ही  बाहर वाले कपड़े पहन, सेंट का छिड़काव कर मैं बैठक मंे उपस्थित था ।
‘नमस्ते ! सॉरी ,मुझे जरा देर हो गयी ।‘‘ आवाज में ढेर सी मुलामियत भर के मैं अदब से झुकते हुये बोला ।
     ‘‘ नमस्ते , नमस्ते !‘‘ वे चहकीं ।
     ‘‘ अरे शुभा  ! भाभी जी को चाय पिलाओ , औेर देखना ,जरा बिस्कुट वगैरह लेती आना ।‘‘ मेैंने भीतर की ओर मुंह करके पत्नी से इल्तिज़ा की ।
‘‘ अरे रहने दीजिये ,गुप्ता जी । मेरे रिसोर्स परशन आने वाले हैं ,उन्हे चाय पिला देना आप ।‘‘
‘‘रिसोर्स परशन माने ?‘‘
‘‘माने मुझे काम सिखाने वाले ! मेरे अपलाइनर !‘‘
‘‘आप कोई काम करने लगी हैं क्या इन दिनों !‘‘
‘‘आपको पता नहीं, मैंने पिछले महीने से एक  बिजनिस शुरू किया है । शायद आपको जानकारी होगी कि कुछ ऐसी  मल्टीनेशनल कंपनीयां हैं, जो विज्ञापन में फिजूलखर्ची नहीं करती, बल्कि अपना नेटवर्क बनाकेे सीधे ग्राहकों तक अपनी  चीजें पहुंचाती हैं ।‘‘
‘‘ हँू ! ‘‘ मैंने गंभीर होते हुये उनकी बात में रूचि प्रदर्शित की ।
 वे बोलीं-‘‘ मैंने अभी तक ज्यादा काम नही किया , इसलिये मैं ज्यादा नही बता सकती , बस मेरे रिसोर्स परशन आ रहे है !ं वे आपको विस्तार से सारी बातें समझायेंगे ।‘‘
शुभा चाय लेकर आयी तो उनने उठ कर उससे नमस्ते की ,और बोली -‘‘आप भी बैठिये भाभी जी ,दरअसल मैं जिस काम से आयी हूँ ,वो आप दोनों पति-पत्नी मिलके ज्यादा अच्छी तरह से कर सकेंगे ।‘‘
अब मेरी भौेहों में बल पड ़गये थे ।
झिझकती सी शुभा बैठ गयी । उसकी मुड़ी-तुड़ी साड़ी, बिखरते बाल और सूखे से चेहरे से फिसलती हुयी मेरी निगाह एकाएक वर्मा भाभी के बनाव-श्रृंगार पर गयी , तो मुझे लगा कि वे इनदिनों हरदम किसी मॉडल की तरह लकदक रहती हैं, जैसे खुद चलता-फिरता एक विज्ञापन हों । उनका पहले का हमेशा का चलने-फिरने और बोलने -बतियाने का वो निहायत घरेलू ढंग इस वक्त एक मोहक और आकर्षक अदा में तब्दील हो चुका था । उनकी करीने से तराशी गयी कमानदार भौंह, गोल चेहरे के सही  अनुपात की बिन्दी और गले को जकड़े रहने वाला नैकलेस उनके चेहरे को अलग लुक दे रहा था । कानों में लटकते एक-एक बालिश्त के लटकन,दिखने में भले ही असहज लग रहे हों, लेकिन उन्हे वे कोई दिक्कत देते महसूस नहीं हो रहे थे । दिक्कत तो उन्हे उस पल्लू से भी नहीं होती दिख रही थी,जो बार-बार उनके कंधे से फिसल कर उनके मांसल,पुष्ट  और गुदाज वक्ष को उघार देता था ।
हमारी चाय खत्म ही हुयी थी कि उनके वे रिसोर्स परशन आ  गये । मैने उठके उनका स्वागत किया और अपना परिचय दिया -‘‘ मै अमर गुप्ता ,बीमा एजेंट ।‘‘
     ‘‘ मैं जम्बो कंपनी का एक छोटा सा वर्कर सिल्वर डिस्ट्रीब्यूटर मनीराम !‘‘
हम लोग हाथ मिला कर बैठे तो शुभा बर्तन समेट कर बाहर जाने लगी,  वर्मा भाभी ने उसे फिर रोका -‘‘ भाभी आप रूकिये प्लीज !‘‘
‘‘ मै अभी आती हूँ ‘‘ कहती हुयी शुभा पीछा छुड़ा कर भागी , और भीतर पहुंच के बर्तन बजाकर मुझे अन्दर आने का इशारा करने लगी ।
मैं भीतर पहुंचा , तो वह झल्ला रही थी -‘‘ कोैन है ये सयानी मलन्दे बाई !‘‘
हँसते हुये मैं बोला-‘‘ तुम काहे जल रही हो ? बेचारी वो तुम्हे क्या सयानपन दिखा रही है ? वो अपना कोई प्रॉडक्ट बेचने आयी है ।‘‘
‘‘ हमे नहीं खरीदना उसकी कोई चीज । उससे कहो अपने खसम के साथ उठे औेर कहीं दूसरी जगह जाकर नैन मटक्का करे ! और जोे मर्जी हो बेचे या गिरवी रखे ।‘‘
मै शरारतन मुस्कराया -‘‘ अरे यार ,हजार दो हजार रूपये देकर इतनी कमसिन और ख़ू़बसूरत औरत के साथ बैठने का मौका मिल जाये तो महंगा नही है ।‘‘
शुभा की आंखें अंगार हो गयीं थीं , वह जलते स्वर में बोली -‘‘कहे दे रही हूं , मै अभी बैठक में जाकर उसे घर से बाहर निकाल  दंूूगी ।‘‘
मुझे लगा कि खेल बिगड़ रहा है ,सो समझौते के स्वर में उससे कहा-‘यार तुम भी बिना पढ़ी-लिखी औरतों जैसी बेकार की बातें करने लगती हो । वो क्या हमारी जेब में हाथ डाल के रूपया निकाल लेगी । अब कोई अपना माल दिखाये तो लो मत लो, देखना तो चाहिये ।  वो जो बतायेगी , देख लेते हैं । बेचारी को निराश काहे करती हो ?‘‘
मैं बैठक में आ  गया और उनके रिसोर्स परशन महाशय से बात करने के बहाने  मुस्कराते हुये पूछने लगा-‘‘ आप रहते कहां हेै मनीराम जी ?‘‘
‘‘मै घाटीपुरा में रहता हूँ ,उधर हाई स्कूल की पुरानी इमारत है न ,उसके पीछे हमारा पुराना मकान है ।‘‘
‘‘अच्छा उधर ,जहां दरोगा संग्रामसिंह रहते हैं ।‘‘
‘‘आप उन्हे जानते हैं ! वे मेरे चाचा हैं ।‘‘
 अब हमे बात करने को एक विषय मिल गया था, सो हम पूरी दिलचस्पी के साथ अपने हाई स्कूल के अध्यापकों-छात्रों और दरोगा संग्रामसिंह के बारे में बातें करने लगे थे । हालांकि यह विषय अन्नपूर्णा भाभी को बोर कर सकता था,  पर ऐसा नहीं दिख रहा था । कुछ क्षण वे बड़ी रूचि से हमारी बात सुनती रहीं फिर वे  उठीं और भीतर चलीं गयीं। कुछ देर बाद वे लौटीं , तो उनके साथ आँखों में उलझन का भाव लिये शुभा भी थी ।
मनीराम जी ने उठकर मेरी श्रीमती जी का अभिवादन किया और बोला -‘‘ भाभीजी मैं जम्बो कंपनी का एजेन्ट मनीराम हंू । माफ़ी चाहूंगा कि मैं आपके मूल्यवान समय में से  दस मिनट ले रहा हूं । आपको अच्छा लगे तो आप मेरे बिजनिस-प्रपोजल पर विचार करें, और न जमे तो कोई बात नहीं ।‘‘
अब उसकी आवाज में  एक मखमली अंदाज आ गया था-‘‘ सर कभी आपने सोचा कि  आप दूसरों से कुछ हटकर यानी कि अलग हैं । दरअसल आपको अपनी योग्यता के अनुरूप जॉब नहीं मिला है । इसलिये आप अपने  वर्तमान-व्यवसाय से पूरी तरह संतुष्ट नहीं होंगे ़ ़ ़ ़ ़ ़ ़मन में कहीं न कहीं यह चाह रहती होगी यानी कि एक सपना होगा आपका भी , कि आपके पास खूब सारा पैसा हो  ! ़ ़ ़ ़़  ़़ ़ ़ बड़ा सा बंगला हो !  ़़ ़ ़़ शानदार कार हो!  ़ ़ ़भाभी के पास ढेर सारे जेवर हों ! ़ ़ ़़ ़ ़ ़ ़आपके बच्चे ऊंचे स्कूल में पढ़ने जायें ! आप लोग भी फॉरेन टूर पर जायें !  ़ ़ ़ ़यानी कि आपके पास वे सारी सुख-सुविधायें हों जो एक आदमी के जीवन को चैन से गुजारने के लिए जरूरी हैं । लेकिन आप लोग मन मसोस के रह जाते है, क्योंकि आपके सामने वैकल्पिक रूप में अपनी  इतनी बड़ी इच्छायें पूरी करने के लिए कोई साधन नहीं हैं ।  छोटी-मोटी एजेंसी या नौकरी से यह काम कभी पूरे नहीं होंगे-हैं
न ! एम  आय राईट ?‘‘
मैंने सहमति में सिर हिलाया-‘‘ आप बिलकुल सही कह रहे है। ‘‘
‘‘अपने सपने पूरे करने के लिए आपको कम-से-कम पचास हजार रूपये महीना आमदनी चाहिये और पचास हजार रूपये के मुनाफे के लिए आप अगर कोई बिजनिस करेंगे तो उसमें पच्चीस लाख रूपये की पूंजी लगाना पड़ेगी ़ ़ ़ ़ ़ठीक है न ! अब पच्चीस लाख रूपये की रिस्क , फिर नौकर-चाकर, दुकान-गोदाम ़ ़ ़ ़़ ़   कित्ते सारे झंझट हैं ! लेकिन मैं आपको ऐसा बिजनिस बताने आया हूं , जो आप बिना पूंजी,और बिना रिस्क के शुरू कर सकते है, और जितनी मेहनत करेंगे ,उतना ज्यादा कमाऐंगे ।‘‘
‘‘ हमे बेचना क्या है ?‘‘मुझे उलझन हो रही थी ।
‘‘ आप तो सिर्फ नेटवर्किंग करेंगे जनाब , सीधे कुछ नहीं बेचेंगे ।‘‘ मनीराम ने उसी मुस्तैदी के साथ कहा-‘‘ अब वो जमाना नहीं रहा जब दुकान खोलके बैठना पडता था । आप जिन लोगों को डिस्ट्रीब्यूटर बनाऐंगे , वे जम्बो कंपनी के प्रॉडक्ट बेचेंगे ,और  घर बैठे मुनाफा आपको मिलेगा ।‘‘
‘‘ लेकिन इसमें मेरी क्या भूमिका होगी ?‘‘ शुभा अब तक मनीराम का जाल नहीं समझ पा रही थी ।
‘‘ आपकी वजह से ही तो गुप्ताजी के डाउनलाइनर्स की फेमिली को इस बिजनिस और इन प्रॉडक्टस में विश्वास होगा । हमारी सोसायटी में ये माना जाता है कि आदमी तो ब्लफ दे सकता है, औरत नहीं ! सो आप इस मान्यता को फोर्स के साथ अमल में लायेंगी । इसका आपको व्यक्तिगत लाभ भी होगा, क्योंकि इस काम के लिए आप दोनों के एक साथ जाने-आने से एक बहुत बड़े सर्कल में आपकी सोशल-रिलेशनशिप बनेगी । जम्बो कंपनी की फेमिली बड़ी रिच है इसके लिये ऊंचे-ऊंचे आइ ए एस अफसर और बड़े-बड़े बिजनिस मैन तक काम करते हैं।  उन लोगों के ऐक्सपीरियंस, बिजनिस के टिप्स,  आर्ट-ऑफ-लिविंग और थिंकिग, आपकी लाइफ-स्टाइल बदल देगी ।‘‘
मनीराम द्वारा दिखाये गये सपने का जादू हम लोगों पर असर करने लगा था ,हम दोनों उसके चेहरे को  मंत्रमुग्ध-से होकर ताकने लगे थे ,यह अनुभव करके वर्माभाभी अब मनीराम की तरफ बड़े गर्व से देखने लगी ।
हठात् शुभा ने मनीराम से पूछा‘‘आपके इन प्रॉडक्ट की कीमत क्या है ?‘‘
     ‘‘यह टुथ-पेस्ट एक सौ दो रूपये का है , और ये नाईटक्रीम एक सौ बीस रूपये की है।‘‘
            मैंने हस्तक्षेप किया-‘‘वाय द वे , आपको नहीं लगता ये चीजें कुछ ज्यादा मंहगी हैं ? हमारी सोसायटी में कितने लोग ऐसे  होगे ,जो ये चीजें अफोर्ड कर सकेंगे !‘‘
               ‘‘ हां , थोड़ी सी कॉस्टली ! वट एक्चुअली , जनरल प्रॉडक्ट की तुलना में हमारे प्रॉडक्ट तीन गुना ज्यादा सेवा देते हैं । एक बार उपयोग करने पर कंज्यूमर सैटिसफाय हो जाता है। फॉर एग्जामपल देखें ,जनरल पेस्ट की एक इंच लम्बी टयूब जितना काम करती है, इस पेस्ट का चने बराबर हिस्सा ही उससे ज्यादा काम कर देता है ़़ ़ ़ ़ ़़ । मतलब ये कि सही मायने में ये चीजें महगी नहीं हैं ।‘‘
             ‘‘ इसकी शुरूआत कैसे करना पड़ती है ।‘‘ मुझे लगा कि प्रश्नों के बजाय मनीराम के सामने सीधा समर्पण कर दिया जाये तो शायद इस बहस का अंत हो जायेगा ।
‘‘ देखिये ,पहले मैं आपको गाइड-लाइन समझा रहा हूँ ! आपको सबसे पहले घर मंें बैठ कर एक सूची बना लेना हैे, जिसमें आप उन लोगों के नाम लिखेंगे, जिनसे आपका बिजनिस हो सकता है । इस सूची में आपके यार-दोस्त, कुलीग्स, रिश्तेदार , पड़ौसी और हर वो आदमी होगा जो आपके इर्द-गिर्द रहता है ,जिसके यहां आप सपरिवार आ जा सकते हों, और जो आप पर विश्वास करते हों । ‘‘
‘‘जाओ शुभा , चाय ले आओ , आगे की चर्चा हम चाय के बाद करेंगे । मनीराम जी ने हमको मंत्र पढ़ कर मोहित सा कर दिया है , शायद चाय उस जादू को तोड़ेगी ।‘‘ मेैने शुभा से चिरौेरी की, तो वह प्रसन्न मन से उठी और भीतर चली गयी । अन्नपूर्णा भाभी भी झट से उठीं औेर वे भी उसके पीछे-पीछे भीतर जा पहुंची ।
मनीराम बोला-‘‘मै आपको एक ऑडियो कैसेट दूंगा, जिसमें हमारी कंपनी का काम करने वाले उन तमाम लोगों के अनुभव सुनने को मिलेंगे , जिनमें से हर कोई हमसे जुड़ने के पहले जिनमें से हर कोई या तो छोटा-मोटा दुकानदार था, या फिर छोटी मोटी नौकरी करके अपना गुजारा किया करता था,  औेर वे सब इस कंपनी को ज्वाइन करने के बाद आज हर महीने लाखों में खेल रहे हैं ।‘‘
फिर उसने वह सिस्टम समझाया जिसे अपना के हम भी लाखों में खेल सकते थे । उसने बताया कि हमको पहले ऐसे आठ लोगों को टारगेट बना के काम शुरू करना है ,जो एक्टिव हों ओैर  उनमें से हरेक  व्यक्ति आठ-आठ वितरक बना सके ।
             मनीराम की बातें बड़ी आकर्षक थीं , उनमें मोहक तथ्य थे, और प्रामाणिक आंकड़े भी, पर वह ऐसा प्लान था जिस पर हजारों-लाखों में शायद कोई एक चल पाता होगा । हां, वह ऐसा जादू तो करता था, कि लोग उसे अपनी पहुंच के भीतर महसूस करते थे ।
            उस दिन हम लोगों ने तुरन्त ही बिजनिस ज्वाइन नहीं किया और इस बारे में विचार करने के लिये कुछ मुहलत मांग ली । इस प्रकार किसी तरह  हमने उन दोनों से मुक्ति पायी ।
उन लोगों के जाने के बाद शुभा बड़ी उत्साहित थी -‘‘ ये मनीराम जी क्या सही कह रहे थे ? क्या सच्ची में ऐसा कोई बिजनिस हो सकता है-जिसमें बिना पूंजी के काम चल जाये !‘‘
‘‘ हां, इन दिनों कुछ कम्पनी ऐसा नेटवर्क चला  रही हैं। अपने विदिशा वाले जीजाजी भी तो अपनी नौकरी छोड़ के आजकल यही कर रहे हैं। ‘‘ मैंेने  उसका समाधान किया ।
   ‘‘ अच्छा ! तो उनकी गृहस्थी में अभी-अभी जो बहुत सारी नई चीजें आई हैं, इसी बिजनिस की देन होना चहिये । लेकिन जिस स्टाइल से मनीरामजी बोल रहे थे, उसके लिए तो कोई वोकेशनल-कोर्स करना पड़ता होगा ।‘‘
‘‘ कुछ-न-कुछ तो करना पड़ता होगा! नहीं तो यही मनीराम कहां से यह सब सीख गया ? अभी कुछ बरस पहले ये आदमी पान की एक गुमटी लगाके दिन भर लफंगों  और उचक्कों में घिरा रहता था ।‘‘
‘‘ आप तो वैसे भी इस बिजनिस से मिलता-जुलता काम करते हो, सो ज्यादा दिक्कत नहीं होने वाली । लेकिन मुझे सचमुच बड़ा डर लग रहा है , मुझ जैसी घरेलू औरत का इस तरह सैल्स-गर्ल बन पाना क्या ़ ़ ़ ़ ़ ़!‘‘
‘‘ तुम अपने आपको ऐसी बैक-वर्ड क्यों समझती हो ?‘‘ मैंने शुभा का उत्साह वढ़ाया ‘‘इन अन्नपूर्णा भाभी को देखो ,ये भी शुरू से कहां की एम बी ए करे बैठी थीं ?बिलकुल घर-घुस्सी थीं तुमसे ज्यादा !‘‘
‘‘ आप ये भी तो सोचो , कि अपने घर से आपके संग-संग मैं भी इस  तरह भटकना शुरू कर दूंगी, तो घर पर बच्चों का क्या होगा ? ़़ ़ ़ ़ ़नाराज मत होना, ऐसा करो कि आप भी मनीराम की तरह इन अन्नपूर्णा भाभी जैसी कोई बिजिनिस पार्टनर ढूढ़ लो और इनकी तरह ़ ़ ़ ़ ़ ‘‘
मैंने पाया कि अपनी बात अधूरी छोड़ के, शुभा एकदम भीतर भाग गयी है, शायद उसने किचेन में जाती बिल्ली देख ली थी ।
आठ दिन बाद वर्मा भाभी एकाएक मेरे ऑफिस में आ धमकी। मैं  उस दिन अपने डेवलपमेंट ऑफीसर के पास बैठा था ।
उन्हे बैठा कर मैैंने मुस्कराते हुये पूछा‘‘कहिये भाभीजी, क्या हुकुम है ?‘‘
     ‘‘ अपन लोग बाहर चल कर चाय पियें, तो कैसा रहे !‘‘
मैं तपाक से तैयार हो गया । गाड़ी स्टार्ट हुयी तो अन्नपूर्णा भाभी फुर्ती से लपकीं और एक अभ्यस्त की तरह इत्मीनान से मेरे पीछे बैठ गयीं । अब उनका चेहरा मेरे कान के पास था , इतने पास , कि उनके बालों में लगे सुगंधित तेल औेर चेहरे पर लगायी गयी क्रीम की खुशबू मेरे नासापुटों में प्रवेश कर रही थी । उनके दांये हाथ ने मेरी कमर के गिर्द घेरा कसा तो मुझे लगा कि मेरीे वाइक जमीन पर नहीं चल रही , आहिस्ता से जमीन से ऊपर उठी है और हम आसमान में कुलांचे भरने लगे हैं ।
 हर्बल चाय पीते हुये गंभीर मुद्रा में भाभी ने बताया कि दिल्ली में जम्बो कंपनी की एक दिवसीय सेमिनार हैे । वहां जो भी वितरक जाना चाहता हो, वो सोलह सौ रूपये का टिकट खरीदकर शामिल हो सकता है । पता लगा कि इस बिजनिस-विल्डिंग-सेमिनार के लिए वे खुद के साथ मेरा भी टिकट ले आयी हेैं ।
              मैं ना-नुकर करने वाला था, कि वे बोलीं -‘‘ दरअसल मनीराम जी के घर में गमी हो गयी हैे ,सो वे नहीे जा पा रहेे ,इस कारण आप से इस़रार करने आयी हूं कि आप मेरे साथ चलें ।‘‘
अब भला मैं मना भी कैसे कर सकता था !
उन्हे विदा कर मैं दफ्तर में लौटा ,तो मेरे मस्तिष्क में एक पुराना मुहावरा गूंजने लगा-अंधे के हाथ बटेर । बटेर की कल्पना करते समय मैं जाने क्यों बड़ा पुलकित था ।
 घर पहुंचा , तो शुभा चाय पकड़ाते हुये बड़े प्रसन्न मन से सुना रही थी-‘‘ पता हैै , आज अपनी चिंकी की टीचर  कुलकर्णी मैडम आयी थीं । पैरेन्ट-टीचर मीटिंग में तो वे प्रायः मिलती रहती हेैं ? पर इस बार उनके आने की वजह वहीं जम्बो कंपनी थी ।‘‘
‘‘ जम्बो कंपनी ?‘‘ अब चौंकने की बारी मेरी थी ।
‘‘ हां !‘‘ मन्द-मन्द मुस्काती शुभा रहस्य खोलने के अन्दाज में बोली-
‘‘ आजकल वे भी जम्बो कम्पनी का काम कर रही हैं । बोल रहीं थीं , कि इस काम से उन्हे हर महीने पांच हजार से ज्यादा अर्निंग हो जाती है ।‘‘
‘‘हूं ! !‘‘ एक गंभीर हुंकारा छोड़ कर मैंने उसे प्रोत्साहित किया ।
‘‘सुनो !! ़ ़ ़ ़ ़ ़ अपन लोग इस काम को काहे को लटका रहे हैं ? चलो अपन भी  शुरू कर दें ।‘‘ उसके स्वर में बड़ा आत्मीय आग्रह झांक रहा था ।
मैंने जम्बो कंपनी के काम से ही वर्मा भाभी के साथ दिल्ली जाने की सूचना दी, तो यकायक शुभा  जिद करने लगी , कि वह भी दिल्ली जाना चाहती हेै । मेरी सारी उमंग समाप्त हो गयी । लेकिन दिल्ली तो जाना ही पड़ा ।
             अलबत्ता, दिल्ली यात्रा में मुझे वो आनंद नहीं आया ,जैसी कि मैं कल्पना कर रहा था । हां ,ग्राहक से बात करने की नई टिप्स , नये प्रॉडक्टस का परिचय औेर नयी स्कीमों के बारे में बहुत कुछ सीखने को मिला । कुछ बातें तो ऐसी भी सीखने कोे मिलीं, जो बीमा एंजेंट होने के नाते मेरे जॉब के लिये लाभ दायक हो सकतीं थीं
एक दिन, रात आठ बजे मैं अपने एक पॉलिसी होल्डर से प्रीमियम लेने वर्माजी के मोहल्ले की तरफ जा निकला था, और वहां से  लौट ही रहा  था कि अन्नपूर्णा भाभी से मिलने का मन हो आया ।  वर्माजी  दरवाजे खोले बैठे थे । मेरी गाड़ी को उनने मनीराम की गाड़ी समझा । पहले तो मायूस हुये, फिर मुझे देख कर वे मुस्कराये । अन्दर जाकर मैं एक कुर्सी उठा कर उनके निकट वहां जा बैठा, जहां से वे शायद भीतर पढ़ रहे बच्चों को भी देखते जा रहे थे । घर में सुनसान देख कर मेैने  भाभी के बारे में पूछा तो उनने बताया कि वे सुबह से ही मनीराम के साथ गयी हैे, और अब तक लौटी नहीं हैे ।
मैंने दुखी से स्वर में उनसे कहा -‘‘  इस तरह बिजनिस के लिये भाभी ज्यादातर  घर से बाहर रहती होंगी,  तो इससे आपको दिक्कत होती होगी ! ‘‘
‘‘अब भई  तरक्की करना है, तो हमको  कुछ न कुछ त्याग करना ही पडेगा न !‘‘
‘‘फिर भी घर के काम ़ ़ ़ ़?‘‘
‘‘घर के काम तो कैसे ही हो जाते हैं अमर भैया ! इत्ती सी बेगार के लिए महिलाओं को घर में बंद करके रखना ठीक नहीं हैं । मैं बेेसिकली महिलाओं की  स्वतंत्रता का समर्थक हूं । महिलाओं को उनकी इच्छा के विरूद्ध,काम न करने देना गलत समझता हूं मै ! मेरा कहना है कि औेरतों को रसोेईघर से बाहर निकल कर काम-धाम सीखना चाहिये। इससे उनका  आत्म-विश्वास वढ़ता है, और उन्हे अभिव्यक्ति का  सही-मौका मिलता है । यही नहीं उन्हे आर्थिक स्वतंत्रता भी मिलती है।‘‘
            मन ही मन मैंने कहा -‘ पिछले साल , हमने जब भाभी को बीमा-ऐजेंट बनाने का प्रस्ताव रखा था, तो आप कहते थे कि औरतों की सही जगह घर में है, उन्हे घर में ही रहना चाहिये ! और अगर जॉब भी करना है, तो किसी कॉन्वेंट में टीचरशिप वगैरह करें ।‘
         लेकिन प्रत्यक्षतः मैं यही बोला–‘‘ हां अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और आर्थिक स्वतंत्रता तो मिलती है।‘‘
            ‘‘ कहिये आप कैसे पधारे !‘‘ वर्माजी ने सहसा मुझे सकते की स्थिति में डाल दिया था ।
‘‘मैं दरअसल ,़ ़ ़ ़ ़ ़ ़ ‘‘ कहते हुये मैं कुछ अटकने लगा फिर यकायक याद आया तो मैंनेे बेधड़क उनसे कह डाला -‘‘  मुझे उस दिन भाभी ने बताया था कि  इस कस्बे का जम्बो कंपनी का स्टोर आपके ही घर में है, सो मैं , टुथ-पेस्ट और नाईटक्र्रीम के एक-एक पैकिट लेने आया था ! आप दे सकेंगे प्लीज !‘‘
यह सुनके उदास और अलसायेसे वर्माजी उठे  और मेरी मांगी गयी चीजें तलाशने लगे । सामने दिखते किचेन में जम्बो कंपनी के तमाम कार्टून नीचे से ऊपर तक अंटे पड़े थे, जिनकी वजह से रसोई पकाने के बहुत से जरूरी बर्तन भी शायद उन्हेे  वहां से हटाना पड़े होंगे, क्योंकि  किचेन में हर ओर सिर्फ कॉस्मेटिक सामान  था ।
किचेन में वे चीजें नहीं मिलीं, तो वर्माजी ने सामने दिखते एक दूसरे कमरे की लाइट जलाई और वहां खोजने लगे । टयूबलाईट की चमकदार दूधिया रोशनी में यहीं से मैंने देखा कि उस कमरे में -जो कि उनका बेडरूम था-जम्बो कंपनी की तमाम चीजें ,अपने प्राइस-टैग को प्रदर्शित करतीं, फर्श पर बिखरी पड़ी थीं-जैसे  गहन आतुरता से अपने बिकने की प्रतीक्षा कर रही हों । उन्ही चीजों में मिल गयीं थीं अन्नपूर्णा भाभी की निहायत निजी चीजें भी । सामने रखी कुर्सी की पुश्त पर अन्नपूर्णा भाभी की गुलाबी रंग की रेशमी, झीनी सी नाइटी और ब्रा अव्यवस्थित ढंग से टंगी थीं, जिन्हे देखकर सुबह  मार्केटिंग-विजिट पर जाते समय  भाभी द्वारा किये गये चेंज की जल्दबाजी का आभास हो रहा था ।
अंततः मेरी बांछित चीजें लाकर वर्माजी थके-हारे से बैठ गये । मैंने पैकेट पर छपी कीमत के अनुसार भुगतान किया तो उनने उदासीन भाव से  वे रूपये लिये और वहीं रखे पर्स में ठूंस दिये ।
वर्माजी को नमस्कार करके मैं घर को चला, तो मेरे मस्तिष्क में बार-बार जो बात घूम रही थी वह मैंने पूछ्हा ली- सर, आपके घर का सामान कम हो रहा और मार्किट की चीजें बढ़ रही है, कभी आपने ध्यान दिया?
 निस्पृह भाव से वर्मा जी बोले-अन्नपूर्णा  जैसे लाखों लोगों के मधुर ख्वाब में बसे ग्लोबनाइजेशन के साथ आ रहे , इस बाजारवाद ने हमारे समाज में काफी बदलाव कर दिया है । इस दौर में हम रोज अनायास ही बहुत कुछ खो रहे है । दरअसल ,चीज़ें तेज़ी से अपनी जगह बदल रही हैं ! ़ ़ ़ ़ जिस चीज़ के लिये जो जगह तय की गयी है, अब वह केवल वहीं नहीं मिलती,  हर जगह मिल जाती है ! ़बाजार अब केवल बाजार तक सीमित नहीं रहा, वह अब कई घरों में ,बिलकुल भीतर तक घुस आया है-अपने पूरे संस्कारों, कारिन्दों, अवगुणों और शब्द समूहों के साथ !
मैं अवाक होंके उन्हें देखः रहा था।चुपचाप ही निकल आया मैं वहां से।
घर पहुंचते वक्त मन-ही-मन मैं इस नयी तरक्की के लाभ-हानि का बही-खाता  तैयार कर रहा था, जिसम मैं और मेरी पत्नि शुभा भी अपनी प्रविष्टि कराने को आतुर थे ।
    #राजनारायण बोहरे

   परिचय

राजनारायन बोहरे
शिक्षा- एम ए हिन्दी साहित्य
एल एल बी, पत्रकारिता में स्नातक
प्रकाशन- 1-कहानी सँग्रह ” इज़्ज़त आबरू” ” गोस्टा तथा अन्य कहानियां” “हादसा” “मेरी प्रिय कथाएं”
2,-उपन्यास-मुखबिर
3- बाल उपन्यास- बाली का बेटा, रानी का प्रेत, सुनसान इमारत,छावनी का नक्शा
पुरस्कार
1- साहित्य अकादेमी मध्यप्रदेश का सुभद्रा कुमारी चौहान पुरस्कार
2- मप्र हिन्दी साहित्य सम्मेलन भौपाल का वागीश्वरी पुरस्कार
ब्लॉग- kissaa goi, राज बोहरे उवाच

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29 अप्रैल, 1989 को मध्य प्रदेश के सेंधवा में पिता श्री सुरेश जैन व माता श्रीमती शोभा जैन के घर अर्पण का जन्म हुआ। उनकी एक छोटी बहन नेहल हैं। अर्पण जैन मध्यप्रदेश के धार जिले की तहसील कुक्षी में पले-बढ़े। आरंभिक शिक्षा कुक्षी के वर्धमान जैन हाईस्कूल और शा. बा. उ. मा. विद्यालय कुक्षी में हासिल की, तथा इंदौर में जाकर राजीव गाँधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के अंतर्गत एसएटीएम महाविद्यालय से संगणक विज्ञान (कम्प्यूटर साइंस) में बेचलर ऑफ़ इंजीनियरिंग (बीई-कंप्यूटर साइंस) में स्नातक की पढ़ाई के साथ ही 11 जनवरी, 2010 को ‘सेन्स टेक्नोलॉजीस की शुरुआत की। अर्पण ने फ़ॉरेन ट्रेड में एमबीए किया तथा एम.जे. की पढ़ाई भी की। उसके बाद ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियाँ’ विषय पर अपना शोध कार्य करके पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। उन्होंने सॉफ़्टवेयर के व्यापार के साथ ही ख़बर हलचल वेब मीडिया की स्थापना की। वर्ष 2015 में शिखा जैन जी से उनका विवाह हुआ। वे मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं और हिन्दी ग्राम के संस्थापक भी हैं। डॉ. अर्पण जैन ने 11 लाख से अधिक लोगों के हस्ताक्षर हिन्दी में परिवर्तित करवाए, जिसके कारण वर्ल्ड बुक ऑफ़ रिकॉर्डस, लन्दन द्वारा विश्व कीर्तिमान प्रदान किया गया।