राजभाषा विभाग का गौरव

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राष्ट्रीय पुरस्कार मिलना किसी व्यक्ति के जीवन का सर्वाधिक आनन्ददायी और अविस्मरणीय क्षण होता है, जिसे यह पुरस्कार मिलता है उससे भी ज्यादा उसके अपनों के लिए । कोई बड़ा सम्मान-पुरस्कार माता-पिता और गुरुजनों की उपलब्धि तो होता ही है लेकिन अर्धांगिनी को तो लगता है यह पुरस्कार उसे ही मिला है। उसकी खुशी का कोई ठिकाना नहीं होता । लेकिन यहाँ कुदरत का खेल बड़ा ही विचित्र रहा । यह क्षण आया भी तो तब जबकि कुछ ही समय पूर्व जब मेरी अर्धांगिनी का देहान्त हो गया। जिस समय उसे होना ही चाहिए था, वह नहीं थी। पुरस्कार की घड़ी बड़ी विचित्र थी। दो विपरीत मनोदशाओं का वेगवान प्रवाह मेरे अन्तर्मन को द्रवित कर रहा था, प्रतिपल परिवर्तित भावनाओं का आवेग इतनी तेजी से बदल रहा था कि आंखें भावों के निर्देशों को समझ न पाने के कारण भावशुन्य सी हो रही थीं। ।

इस पुरस्कार का श्रेय यदि आज मैं अपनी स्वर्गीय पत्नी डॉ. श्रीमती कामिनी गुप्ता को दे रहा हूँ तो यह केवल भावनात्मक कारण से नहीं है, इसके पीछे वास्तविकता भी है। भारतीय भाषाओं के प्रसार को ले कर मेरा जुनून जितना वह जानती थी उतना शायद ही कोई जानता हो। उससे सर्वाधिक प्रभावित भी वही थी। रोज घंटों तक भाषाओं के लिए सोशल मीडिया पर दूसरों की और अपनी बात रखना। भाषा-प्रौद्योगिकी संबंधी जानकारियों का आदान-प्रदान, फोन पर या इंटरनेट पर संवाद को जन-जन तक पहुंचाना आदि दिनचर्या का अंग रहा है। वह परेशान हो कर अक्सर कहती थी, ‘इस भाषा सेवा के चक्कर में क्यों अपनी सेहत बिगाड़ रहे हैं, दिन रात पागलों की तरह लगे रहते हैे, कभी कुछ मिला, सिवाय दुनिया से बुराई के ? हिंदी सेवा कीजिए पर थोड़ा समय खुद को भी दिया काजिए।’

एक समय मैं देशभर के समाचारपत्रों और पत्रिकाओं में कलम के मजदूर की तरह लिखा करता था। इसके पीछे तब के मुंबई जनसत्ता के संपादक राहुलदेव जी का प्रोत्साहन था। लेकिन आगे चल कर भाषायी जुनून ने सब छुड़वा दिया था। भाषा संबंधी कार्य के अलावा कभी कभार ही कोई लेख लिखता था। कुछ समय पूर्व एक दिन पत्नी ने कहा, ‘भाषा पर टिप्पणीबाजी और विचार-विमर्श के साथ-साथ थोड़ा समय मौलिक लेखन को क्यों नहीं देते ?’ मैंने सोचा बात तो सही है और तब मैंने भाषा को ले कर, मुख्यत: ‘भाषा प्रौद्योगिकी’ को ले कर कुछ लेख लिखे। और ‘भाषा प्रौद्योगिकी : सत्तर साल का सफरनामा’ उनमें नवीनतम था। यह लेख तब लिखा गया जब वे जिंदगी से संघर्ष कर रही थीं और मैं जिंदगी की अनेक दुश्वारियों के बीच से गुजर रहा था। और जब तक मुझे इसके प्रकाशन की जानकारी मिली वे दुनिया को छोड़ चुकी थीं। मुझे तो लगता है कि उसने ईश्वर से मेरे साथ होती रही कथित नाइऩ्साफी की शिकायत की होगी और अपनी दुआओं से मेरी सिफारिश कर मुझे इतना बड़ा पुरस्कार दिलवाया है । शायद इसलिए भी कि मैं इस खुशी में उसके वियोग को भूल कर आगे बढ़ सकूँ।

यह केवल संयोग नहीं लगता, 14 मार्च 2018 को वह अनन्त में विलीन हुई और ठीक छह महीने बाद अर्थात 14 सितंबर 2018 को माननीय उपराष्ट्रपति जी के हाथों राजभाषा गौरव, प्रथम स्थान के लिए मुझे पुरस्कार मिला। उसीकी प्रेरणा से लेख लिखा, उसीकी दुआओँ से यह पुरस्कार भी पाया और वह भी महाप्रयाण के ठीक छह महीने बाद। उसीकी प्रेरणा से लेख लिखा और उसीकी दुआओँ से यह पुरस्कार भी पाया। शून्य में समा कर भी वह मेरे हित साधने के लिए प्रयासरत है। यह जो भी गौरव है उसीसे है,उसीका है और उसीको समर्पित है।

#डॉ. एम.एल. गुप्ता ‘आदित्य’

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।