वो नन्हा सा स्पर्श

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asprindar deji
वो नन्हा सा स्पर्श
जब पनपा मेरी कोख में …
इक आलौकिक सी
अनुभूतियों का एहसास
इक प्यारा सा
जब अंकुर फूटा
मेरी देह में …
      ..वो नन्हा सा स्पर्श
           जब पनपा मेरी कोख में ..
सुनो कह नहीं पाएंगे
कुछ एहसास लफ़्जों में
पिरोए नहीं जाएंगे …
जो अंतस को छू जाए ..
ऐसे शब्द मिल नहीं पाएँगे …
दिया है सिर्फ़ औरत को ..
माँ बनने का गरूर ..
वो सहनशीलता ..
वो अथाह पीड़ा सहने का सरूर
माँ शब्द सुखद अनुभूति .
 जब नन्हा स्पर्श आया मेरी गोद में ..
इससे प्यारा इससे न्यारा
जग में नहीं हो सकता कोई ओर
चुका ना सका ख़ुदा भी ..
माँ की अथाह पीड़ाओं का मोल ..
भूल गई हर दुःख हर दर्द
जन्म देने की वो असहनीय पीड़ा ..
जब छुआ उसे ओर
लगाया मैंने सीने से ..
आलौकिक सी
अनुभूतियों का एहसास
वो नन्हा सा स्पर्श
नन्हा सा अंकुर जब
 फूटा मेरी कोख में ..
#डेज़ी जूनेजा
नाम………डेज़ी जूनेजा
पता…….मोहाली (चंडीगढ़ )
सम्मान…काव्य दंगल साहित्य प्रतियोगिता सम्मान पत्र
( 2) काव्य सागर सम्मान ॥
 प्रकाशन___*गूलनार ओर मृगनयनी* सांझा काव्य संग्रह
सत्यम प्रकाशन ओर ऋषि ज़ी क़े नेतृत्व में
*एक मुलाक़ात* (प्रकाशाधिन ) प्रीति सूराना ज़ी क़े नेतृत्व में ..

matruadmin

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’

29 अप्रैल, 1989 को मध्य प्रदेश के सेंधवा में पिता श्री सुरेश जैन व माता श्रीमती शोभा जैन के घर अर्पण का जन्म हुआ। उनकी एक छोटी बहन नेहल हैं। अर्पण जैन मध्यप्रदेश के धार जिले की तहसील कुक्षी में पले-बढ़े। आरंभिक शिक्षा कुक्षी के वर्धमान जैन हाईस्कूल और शा. बा. उ. मा. विद्यालय कुक्षी में हासिल की, तथा इंदौर में जाकर राजीव गाँधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के अंतर्गत एसएटीएम महाविद्यालय से संगणक विज्ञान (कम्प्यूटर साइंस) में बेचलर ऑफ़ इंजीनियरिंग (बीई-कंप्यूटर साइंस) में स्नातक की पढ़ाई के साथ ही 11 जनवरी, 2010 को ‘सेन्स टेक्नोलॉजीस की शुरुआत की। अर्पण ने फ़ॉरेन ट्रेड में एमबीए किया तथा एम.जे. की पढ़ाई भी की। उसके बाद ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियाँ’ विषय पर अपना शोध कार्य करके पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। उन्होंने सॉफ़्टवेयर के व्यापार के साथ ही ख़बर हलचल वेब मीडिया की स्थापना की। वर्ष 2015 में शिखा जैन जी से उनका विवाह हुआ। वे मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं और हिन्दी ग्राम के संस्थापक भी हैं। डॉ. अर्पण जैन ने 11 लाख से अधिक लोगों के हस्ताक्षर हिन्दी में परिवर्तित करवाए, जिसके कारण वर्ल्ड बुक ऑफ़ रिकॉर्डस, लन्दन द्वारा विश्व कीर्तिमान प्रदान किया गया।