लहू का रंग

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arpana thapaliya

केवल सैनिकों का
लहू लाल होता है
श्वेत रक्तधारियों की तो
बस जिह्वा में
उबाल होता है ।
अगर इन्हें
विरोध करना हो
सरकारी नीति का
तो
ये ही उल्लंघन करें
संविधान का,
और सड़कों पर भी
इन्हीं का
बवाल होता है।
लगा कर आग
परिस्थिति से भाग
इन्हें ,न कोई
मलाल होता है,
हर हाल में
लाभान्वित हो ं
फेंका
ऐसा जाल होता है ।
बहाते रक्त की बूँदें
बदन से
श्रंगारित ,
माँ भारती का
भाल होता है,
केवल सैनिकों का
लहू लाल होता है।
बड़ी बड़ी बातें
साथ ही
भितर घातें
स्वयम् के लिए सुविधाएँ,
सम्मान अपार
कार्य निर्वहन करते
आम जन को
जूते और लातें,
इनका तो ढंग
ही कमाल होता है
पहचान लो
श्वेत रक्त धारियों
की बस
जिह्वा में ही उबाल होता है.।
सच मानिए
केवल सैनिकों का
लहू लाल होता है
हाँ केवल सैनिकों का
लहू ही लाल होता है।
            #अपर्णा थपलियाल “रानू”

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।