भारत पर ढाई लाख की हुकूमत

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vaidik

भारत भी कितना विचित्र देश है। देश के लगभग सवा सौ करोड़ लोगों पर सिर्फ ढाई लाख लोगों की हुकूमत चल रही है बल्कि यह कहें तो बेहतर होगा कि सवा सौ करोड़ की छाती पर ढाई लाख लोग सवार है। यदि ऐसा है तो यह तो लोकतंत्र का भुर्त्ता बन गया। जी हां, अंग्रेजी के गुलाम भारत की दशा ऐसी ही है। ताजा जन-गणना के मुताबिक देश में अंग्रेजी को अपनी ‘प्रथम भाषा’ बतानेवालों की संख्या सिर्फ 2 लाख 60 हजार है। अंग्रेजी इन लोगों की मातृभाषा नहीं है, प्रथम भाषा है। जाहिर है कि इनमें से बहुत कम लोग एंग्लो-इंडियन हैं और अंग्रेजों और अमेरिकियों की औलादें तो और भी कम होगी। इन भारतीय नागरिकों ने अंग्रेजी को अपनी मुख्य भाषा कई कारणों से लिखवाया होगा।

अभी हम उनमें नहीं जाते। अभी तो हम यह देखें कि भारत के जिन नागालैंड जैसे सीमांत राज्यों ने अंग्रेजी को अपनी राजभाषा बनाया है, उनके नागरिकों ने भी अंग्रेजी को अपनी मातृभाषा नहीं लिखवाया है। यदि वे भी लिखवा देते तो अंग्रेजी-मातृभाषावालों की संख्या कई लाखों तक पहुंच जाती लेकिन मैं बहुत खुश हूं कि लोगों ने सत्य का पालन किया। लेकिन हमारे सभी राजनीतिक दलों के नेताओं से मैं पूछता हूं कि देश को आजाद हुए 70 साल हो गए लेकिन उन्होंने इस भाषायी गुलामी को दूर करने के लिए क्या किया ?

आज भी देश में सारे कानून अंग्रेजी में बनते हैं, न्याय भी अंग्रेजी में होता है, सरकार की लगभग हर नौकरी में अंग्रेजी अनिवार्य है, शिक्षा में सर्वत्र अंग्रेजी का बोलबाला है। क्या अंग्रेजी का कोई विकल्प नहीं है ? अंग्रेजी के वर्चस्व के कारण भारत आज भी दुनिया के फिसड्डी और पिछलग्गू देशों में गिना जाता है। अपनी भाषा के जरिए दुनिया के कई छोटे-छोटे राष्ट्र– इस्राइल, कोरिया, जापान जैसे– भारत से आगे निकल गए हैं। हमारे अधपढ़ और कमअक्ल नेताओं को देश में सच्चा लोकतंत्र स्थापित करने की प्रक्रिया कब समझ में आएगी ?

आज भी कण भर लोग मन भर लोगों पर अपना राज चला रहे हैं। आज हिंदी को अपनी मातृभाषा कहनेवालों की संख्या 60 करोड़ के आस-पास होगी। यदि उसमें उर्दूभाषी और पड़ौसी देशों में हिंदी समझनेवालों की संख्या जोड़ लें तो हिंदी आज विश्व की सबसे ज्यादा बोली और समझी जानेवाली भाषा बन जाती है। ऐसी भाषा को यदि हम सच्ची राजभाषा, सच्ची राष्ट्रभाषा और सच्ची संपर्क भाषा बना सकें और देश की सभी भाषाओं और बोलियों को उचित सम्मान दे सकें तो अगले 10 वर्षों में भारत दुनिया का सबसे अधिक स्वस्थ, मालदार और ताकतवर देश बन सकता है।

   #डॉ. वेदप्रताप वैदिक

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।