सृजन

amit mishra
          बहुत दिनो बाद  रामु  शहर से  गाँव वापस आ  रहा था l
तीन-चार  दिन  के  य़ात्रा के बाद गाँव पहुंचा।  गाँव में  सब  कुछ बदला-बदला सा नज़र  आ रहा था ,बस अड्डा, मकान सब कुछ पक्के बन गये थे। मानो सब कुछ पराया सा लग रहा था, अचानक रामु की  नज़र बरगद  के पेड़ पर  परी ,फिर  उसके  निचे  बने चौपाल पर एक  नज़र  परते  ही रामु  की आखें भर  आई  l
जैसे  कोई  पुरानी  याद  ताजा  हो गई  हो ……..
         अरे  ए  तो ओही चौपाल है जहाँ  हम  सभी  खेलते-खेलते  बड़े  हूए , यहाँ  तो  पूरा  बचपन हमने  देखा  है l जब  भी  पापा  मुझे  ढूँढ़ा  करते  थे , तो  माँ  कहाँ करती  थी  “चौपाल ” हो आओ  रामु  ओहीं  मिलेगा , उस  ज़माने में  गाँव के  सारे  बच्चे यहीं  मिल  जाया  करते  थे l ए  चौपाल  बच्चे  और  अन्य  लोगो से भरा  रहता  था , शियाम  चाचा  हुक्का  पिते  हूएे गाँव के  बड़े  से  बड़े  मसले सुलझाया  करते  थे , ए  ओही  जगह  है जहाँ मोहन लाल की  बेटी पिंकी की  शादी  के  वक़्त जब दहेज  का  मामला  सामने  आया  था….
        लड़के  वालो  ने  दहेज  के लिये शादी  से  मना कर  दिया  था , गरीब मोहन लाल ने अपने गाँव के एक-एक लोगो को इक्टठा कर के  इसी चौपाल मे  इंसाफ की गुहार लगाई  थी, लेकिन इस गरीब बाप को इंसाफ ना मिला, मिला  तो बस….. रूसवाई और  कलंक …..
        मोहन लाल अपने बेटी के  भविष्य से चिन्तित होकर, अपनी गरीबी से  तंग आकर  इसी  बरगद के  पेड़ पर  फासी  लगा  कर  अपनी  जान  दे  दी  थी ….पता ही नहीं चला की मौत किस्की हुई एक गरीब की , एक मजबूर बाप  की या इंसानियत  की…….
        तब  से  मानो  यह  चौपाल जैसे  श्रापित हो  गया  हो, लोग  अपने  बच्चे  को  यहाँ  खेलने भी आने  नही  देते…लोग  रात  को  इस  रास्ते  से  जाने  से  भी  डरते है ….
        लोगो  का  मानना  है  आज  भी गरीब  मोहन लाल की  आत्मा इसी  चौपल  में  भटकती है ……तब से यह चौपाल और  ए  बरगद का पेड़ हर आने जाने वाले मुसाफिर से मानो ए ही कह रहा हो की …
          वक़्त के तराजू से हमें ना तौल  गालिब ….
          वक़्त के आयने  से  हमने ज़माने  देखें है …
        ए  समाज  की कुरीती ही  तो  है  जो  दहेज  के  नाम  पे  जिते  ज़ागते  “चौपाल ” को  समशान  बना  डाला ….यहाँ  और  संसार में  सब  बदल गया,  ना बदला  तो  लड़कीयों के प्रति लोगो की  सोच  और  ए  दहेज  प्रथा….
        अचानक  रिक्से वाले  ने  आवाज लगाई  साहाब  घर  आ  गया  आपका ……
#अमित मिश्रा
परिचय : अमित मिश्रा की जन्मतिथि-७ जनवरी १९८९ तथा  जन्म स्थान-आबादपुर,जिला-कटिहार(बिहार)हैl आप  वर्तमान में जयपुर विमानतल के समीप सीआईएसएफ इकाई(प्रताप नगर)में रहते हैंl श्री मिश्रा बिहार राज्य के शहर बरसोई से होकर बी.ए.(ऑनर्स)तक शिक्षित हैंl आपका कार्यक्षेत्र-सीआईएसएफ ही हैl हिंदी लेखन के शौकीन अमित जी की लेखन विधा-गीत,ग़ज़ल,कविता सहित कथा,लघुकथा एवं मुक्तक हैl आपके लेखन का उद्देश्य मन के भावों को उकेरना हैl 

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मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष, ख़बर हलचल न्यूज़, मातृभाषा डॉट कॉम व साहित्यग्राम समाचार पत्र के संपादक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मध्य प्रदेश ही नहीं अपितु देशभर में हिन्दी भाषा के प्रचार, प्रसार और विस्तार के लिए निरंतर कार्यरत हैं। लगभग दो दशकों से हिन्दी पत्रकारिता में सक्रिय डॉ. जैन के नेतृत्व में पत्रकारिता के उन्नयन के लिए भी कई अभियान चलाए गए। आप 29 अप्रैल को जन्मे तथा कम्प्यूटर साइंस विषय से बैचलर ऑफ़ इंजीनियरिंग (बीई-कम्प्यूटर साइंस) में स्नातक होने के साथ आपने एमबीए किया तथा एम.जे. एम सी की पढ़ाई भी की। उसके बाद ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियाँ’ विषय पर अपना शोध कार्य करके पीएच.डी की उपाधि प्राप्त की। डॉ. अर्पण ने 35 लाख से अधिक लोगों के हस्ताक्षर हिन्दी में परिवर्तित करवाए, जिसके कारण आपको विश्व कीर्तिमान प्रदान किया गया। अब तक आप 15 पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं। इसके अलावा साहित्य अकादमी, मध्य प्रदेश शासन द्वारा वर्ष 2020 के अखिल भारतीय नारद मुनि पुरस्कार से पुरस्कृत हुए हैं। साथ ही, आपको वर्ष 2023 में जम्मू कश्मीर साहित्य एवं कला अकादमी व वादीज़ हिन्दी शिक्षा समिति ने अक्षर सम्मान, वर्ष 2024 में प्रभासाक्षी द्वारा हिन्दी सेवा सम्मान, वर्ष 2025 में लघुकथा शोध केन्द्र भोपाल द्वारा विशिष्ट हिंदी सेवा सम्मान तथा वर्ष 2026 में वर्ल्ड रिकॉर्ड ऑफ़ एक्सीलेंस, इंग्लैंड द्वारा सम्मानित किया गया है। इसके अलावा आप सॉफ़्टवेयर कम्पनी सेन्स टेक्नोलॉजीस के सीईओ हैं, साथ ही, लगातार समाज सेवा कार्यों में भी सक्रिय सहभागिता रखते हैं। कई दैनिक, साप्ताहिक समाचार पत्रों व न्यूज़ चैनल में आपने सेवाएँ दी हैं। भारतभर में आपने हज़ारों पत्रकारों को संगठित कर पत्रकार सुरक्षा कानून की माँग को लेकर आंदोलन भी चलाया है। वर्तमान में आप देशभर में हिन्दी आन्दोलन का नेतृत्व करने के कारण हिन्दी योद्धा के रूप में पहचाने जाते हैं।