आग जलती रहे,फिल्म वालों की तिजोरी भरती रहे

tarkesh ojha

अब स्वर्ग सिधार चुके एक ऐसे जनप्रतिनिधि को जानता हूं,जो युवावस्था में किसी तरह जनता द्वारा चुन लिए गए तो मृत्युपर्यंत अपने पद पर कायम रहे। इसकी वजह उनकी लोकप्रियता व जनसमर्थन नहीं,बल्कि एक अभूतपूर्व तिकड़म थी। इसमें उनके परिवार के कुछ सदस्य शामिल होते थे। दरअसल उन साहब ने अपने घर में कृत्रिम विभीषण तैयार कर लिया था, जो पूरे पांच साल तक घूम-घूम कर अपने नेता भाई को कोसता रहता था। उस पर जनता के लिए कुछ न करने का आरोप लगाता रहता और  चुनाव आने पर वह विभीषण घूम-घूमकर राजनीतिक दलों को चुनौती देता रहता कि यदि हिम्मत है तो मेरे भाई के खिलाफ मुझे टिकट दें,दूसरों में यह कुव्वत कहाँ, मैं उसे धूल चटा दूंगा, उसके नकारेपन को मैं जनता के समक्ष रखूंगा। कोई-न-कोई राजनीतिक दल उसके झांसे में आकर उसे टिकट थमा देता और बिल्कुल मैच फिक्सिंग की तरह वह विभीषण चुनाव तक विरोधियों का सारा गुड़- गोबर कर गायब हो जाता। चुनाव बाद कोई पूछता तो मासूम-सा जवाब देते हुए वह पूछने वालों पर ही फट पड़ता कि चुनाव के दौरान मुझ पर क्या- क्या बीती, आपको पता है?बड़ी मुश्किल से जान बच पाई। इस पर पूछने वाला चुप्पी साध जाता और रावण और विभीषण फिर से लोगों को बेवकूफ बनाने के नए खेल में जुट जाते। इस तरह उनका यह गेम प्लॉन उन नेता महोदय के जीवित रहने तक निर्बाध रूप से जारी रहा। लगता है कि, कुछ ऐसी ही स्ट्रेटेजी या गेम प्लॉन हमारे फिल्म वालों ने भी सीख लिया है। कोई नई फिल्म शुरू करते ही मंजे हुए निर्माता उसमें विवाद का तड़का लगाने के मौके तलाशने लगते हैं। चाहे बगैर जरूरत के फिल्म में पाकिस्तानी कलाकार को लेने का पासा हो,या फिल्म में कुछ ऐसा दिखाने का ,जो किसी वर्ग को नागवार गुजरे और इस पर बखेड़ा खड़ा हो जाए। जो काम लाखों-करोड़ों के खर्च वाले  प्रमोशन से नहीं हो सकता,वह इस फंडे से चुटकियों में हो जाता है। अब तो आलम यह है कि,किसी नामी फिल्म निर्माता के बारे में यह सुनने को मिलता है कि वह कोई नई फिल्म बना रहा है तो मुझे अंदाजा हो जाता है कि जल्द ही वह कोई-न-कोई विवाद जरूर खड़ा करेगा। इन फिल्म वालों के बीच भी कमाल की केमिस्ट्री है। जैसे ही भड़काई गई आग के शोले इधर-उधर बिखरने लगते हैं,उसके दूसरे संगी-साथी मानो इसी इंतजार में बैठे मिलते हैं। फिर शुरू हो जाता है धड़ाधड़ ट्वीट पर ट्वीट का खेल.. फलां ने यह कहा और ढिमका ने यह। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला जैसे जुमले सुनना अब तो बोरिंग पैदा करने लगा है।मानो इनके लिए अभिव्यक्ति और स्वतंत्रता को छोड़ दुनिया में और कोई समस्या ही नहीं है। विवाद भड़काकर अपनी तिजोरी भरने वालों की कारस्तानी कई साल पहले देखी गई उस फिल्म के भ्रष्ट राजनेता की तरह है,जिसे चुनाव में दोबारा जीतने का जब कोई उपाय नहीं सूझता तो वह अपनी ही पत्नी का चीरहरण करवा देता है। इससे उपजी सहानुभूति की लहर में सवार होकर वह बंदा फिर मुख्यमंत्री बन जाता है। युवावस्था में देखी गई उस फिल्म को लेकर तब मैं सोच में पड़ गया था कि, सचमुच क्या कोई ऐसा कर सकता है?, लेकिन इतने सालों बाद फिल्म वालों की कारस्तानी से लगता है बिल्कुल कर सकता है।दरअसल, ये फिल्म वाले अपनी तिजोरी भरने के लिए किसी का भी चरित्र हनन करने से बाज नहीं आते हैं, लेकिन उनकी इस कारस्तानी से बेवकूफ भी बेचारे दर्शक ही बनते हैं। यह एक तरह से अपराध ही है,जिस पर रोक लगाने के कठोर कदम अब उठने ही चाहिए।

#तारकेश कुमार ओझा

लेखक पश्चिम बंगाल के खड़गपुर में रहते हैं और वरिष्ठ पत्रकार हैं

matruadmin

Next Post

अजीब कश्मकश में हूँ

Wed Feb 8 , 2017
मुझे प्यार हुआ भी, और नहीं भी। इक़रार हुआ भी, और नहीं भी। हम तो ताकते रहे , उस चाँद की राह रातभर, बादलों की ओट से, दीदार हुआ भी,और नहीं भी।           #प्रीती दुबे परिचय : मध्य प्रदेश में ही निवासरत प्रीति दुबे प्रधानमंत्री सड़क […]

संस्थापक एवं सम्पादक

डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’

मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष, ख़बर हलचल न्यूज़, मातृभाषा डॉट कॉम व साहित्यग्राम समाचार पत्र के संपादक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मध्य प्रदेश ही नहीं अपितु देशभर में हिन्दी भाषा के प्रचार, प्रसार और विस्तार के लिए निरंतर कार्यरत हैं। लगभग दो दशकों से हिन्दी पत्रकारिता में सक्रिय डॉ. जैन के नेतृत्व में पत्रकारिता के उन्नयन के लिए भी कई अभियान चलाए गए। आप 29 अप्रैल को जन्मे तथा कम्प्यूटर साइंस विषय से बैचलर ऑफ़ इंजीनियरिंग (बीई-कम्प्यूटर साइंस) में स्नातक होने के साथ आपने एमबीए किया तथा एम.जे. एम सी की पढ़ाई भी की। उसके बाद ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियाँ’ विषय पर अपना शोध कार्य करके पीएच.डी की उपाधि प्राप्त की। डॉ. अर्पण ने 35 लाख से अधिक लोगों के हस्ताक्षर हिन्दी में परिवर्तित करवाए, जिसके कारण आपको विश्व कीर्तिमान प्रदान किया गया। अब तक आप 15 पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं। इसके अलावा साहित्य अकादमी, मध्य प्रदेश शासन द्वारा वर्ष 2020 के अखिल भारतीय नारद मुनि पुरस्कार से पुरस्कृत हुए हैं। साथ ही, आपको वर्ष 2023 में जम्मू कश्मीर साहित्य एवं कला अकादमी व वादीज़ हिन्दी शिक्षा समिति ने अक्षर सम्मान, वर्ष 2024 में प्रभासाक्षी द्वारा हिन्दी सेवा सम्मान, वर्ष 2025 में लघुकथा शोध केन्द्र भोपाल द्वारा विशिष्ट हिंदी सेवा सम्मान तथा वर्ष 2026 में वर्ल्ड रिकॉर्ड ऑफ़ एक्सीलेंस, इंग्लैंड द्वारा सम्मानित किया गया है। इसके अलावा आप सॉफ़्टवेयर कम्पनी सेन्स टेक्नोलॉजीस के सीईओ हैं, साथ ही, लगातार समाज सेवा कार्यों में भी सक्रिय सहभागिता रखते हैं। कई दैनिक, साप्ताहिक समाचार पत्रों व न्यूज़ चैनल में आपने सेवाएँ दी हैं। भारतभर में आपने हज़ारों पत्रकारों को संगठित कर पत्रकार सुरक्षा कानून की माँग को लेकर आंदोलन भी चलाया है। वर्तमान में आप देशभर में हिन्दी आन्दोलन का नेतृत्व करने के कारण हिन्दी योद्धा के रूप में पहचाने जाते हैं।