क्या भूला का याद

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हम जिन्हें चाहते है वो
अक्सर हमसे दूर होते है।
जिंदगी याद करें उन्हें जब
वो हकीकत में करीब होते है।।

मोहब्बत कितनी रंगीन है
अपनी आँखो से देखिये।
मोहब्बत कितनी संगीन है
खुद साथ रहकर के देखिये।।

है कोई अपना इस जमाने में
जिसे अपना कह सके हम।
और दर्द जो छुपा है दिलमें
उसे किसी से व्यां कर सके।।

दिलका दर्द छुपाये नहीं छुपता है
आज नहीं तो ये कल दिखता है।
इसलिए आजकल मोहब्बत का भी
जमाने के बाजार में दाम लगता है।।

अब तक यही करता आ रहा था
पर अब उन्होंने साथ छोड़ दिया।
चारो तरफ अंधेरा सा छा गया
जहाँ मैं हूँ वहाँ थोड़ा उजाला है।।

तरस है जब काली घटाये
चारो ओर छा जाती है।
तब अंधेरे में अपनी प्यारी
मेहबूबा चाँद सी दिखती है।।

जब तक चाहत थी उन्हें
तब तक दिल जबा था।
उम्र के डालाव पर आके
वो न जाने क्यों कतराते है।।

दिल तो जबा रहता नहीं
आँख कान और जुबान।
सब बेवफा हो जाते है
और एक दूसरे से भागते है।।

तब वो और उनकी मोहब्बत
हमें एक नई राह दिखती है।
और बीती हुई यादों को
बहती नदी की राह दिखती है।।

जब से इश्क का बुखार चढ़ा है।
तब से किनारे पर जाने का
बिल्कुल मन नहीं करता है।
बस प्यार के सागर में डूबे
रहने का ही दिल करता है।।

न दिल लगता है
न मन लगता है।
बस हर दम तू ही
तू हमें दिखता है।।

जय जिनें देव
संजय जैन “बीना” मुंबई

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’

29 अप्रैल, 1989 को मध्य प्रदेश के सेंधवा में पिता श्री सुरेश जैन व माता श्रीमती शोभा जैन के घर अर्पण का जन्म हुआ। उनकी एक छोटी बहन नेहल हैं। अर्पण जैन मध्यप्रदेश के धार जिले की तहसील कुक्षी में पले-बढ़े। आरंभिक शिक्षा कुक्षी के वर्धमान जैन हाईस्कूल और शा. बा. उ. मा. विद्यालय कुक्षी में हासिल की, तथा इंदौर में जाकर राजीव गाँधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के अंतर्गत एसएटीएम महाविद्यालय से संगणक विज्ञान (कम्प्यूटर साइंस) में बेचलर ऑफ़ इंजीनियरिंग (बीई-कंप्यूटर साइंस) में स्नातक की पढ़ाई के साथ ही 11 जनवरी, 2010 को ‘सेन्स टेक्नोलॉजीस की शुरुआत की। अर्पण ने फ़ॉरेन ट्रेड में एमबीए किया तथा एम.जे. की पढ़ाई भी की। उसके बाद ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियाँ’ विषय पर अपना शोध कार्य करके पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। उन्होंने सॉफ़्टवेयर के व्यापार के साथ ही ख़बर हलचल वेब मीडिया की स्थापना की। वर्ष 2015 में शिखा जैन जी से उनका विवाह हुआ। वे मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं और हिन्दी ग्राम के संस्थापक भी हैं। डॉ. अर्पण जैन ने 11 लाख से अधिक लोगों के हस्ताक्षर हिन्दी में परिवर्तित करवाए, जिसके कारण वर्ल्ड बुक ऑफ़ रिकॉर्डस, लन्दन द्वारा विश्व कीर्तिमान प्रदान किया गया।