पूंजीवाद के दौर में पर्यावरण की आवश्यकता

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21वीं सदी मानव विकास की गगनचुंबी विकास की कहानी की सदी जिसमें चारों ओर गगनचुंबी इमारतें, बड़े-बड़े कार्यालय ,लंबी चौड़ी चमचमाती सड़कें जिन पर सरपट भागते और हवा से बात करते वाहन , रात का अंधेरा भी दिन के उजाले की तरह जगमगाता है ,कुछ समय में एक देश से दूसरे देश,मोबाइल फोन की बटन लगा कर दूर बैठे हुए किसी भी व्यक्ति से बात करना, हर क्षेत्र जैसे इतना संपन्न हो गया है कि 24 घंटे, सातों दिन दुनिया के लगातार चलते कल कारखाने , उनसे होता उत्पादन और उसका व्यापार जिंदगी को गतिमान बनाए रखें हुए हैं।आज इंसानों के पास समय कम और काम बहुत ज्यादा हो गया है। दिन-रात बस विकास और विकास का शोर और आपाधापी में चलता हमारा जीवन।
विकास करना और पूंजी का संग्रहण करने का नशा, मनचाही जीवन शैली जीने की चाहत और हर वस्तु को प्राप्त करने की लालसा हमें विकसित होने को प्रदर्शित करती है ।
विकास करना मनुष्य के मस्तिष्क की श्रेष्ठता और ऊर्जा का सदुपयोग प्रदर्शित करता है। नित नए सोपानों को स्थापित करना ।हमारी और आने वाली पीढ़ियों का जीवन सहज और सुविधाजनक प्रदान करने का हमारा श्रेष्ठ विचार रखना और उसको कार्यान्वित करना अच्छी बात है किंतु प्रकृति के साथ क्रूरतापूर्वक छेड़छाड़ करना क्या वास्तव में न्यायोचित है । प्रकृति जो खामोश है किंतु अपनी खामोशी की बावजूद वह हमें सब कुछ निशुल्क देती है और बदले में हम उसे मात्र दुख ही दुख पहुंचाते रहते हैं उस पर आघात करते रहते हैं।
जल, जंगल, वायु और जीवन जिसे इंसान अपने श्रेष्ठतम अविष्कारों से भी प्राप्त नहीं कर सकता है। आक्सीजन को इलाज के लिए तो बनाया जा सकता है किंतु जीवन जीने योग्य नहीं लेकिन इतनी अनमोल चीजों को पाकर भी हम अपनी ही प्रकृति को लगातार चोट पहुंचाने में लगे हुए हैं सिर्फ पूंजी संग्रह करने के लिए ही ना ।
इन लगातार चोटों से हमारी धरती अब कराहने लगी है और अपने रूदन से अपनी नाराज़गी ज़ाहिर करने लगीं है जैसे अल्प वर्षा, बाढ़ सूखा, ग्लोबल वार्मिंग, ओजोन परत में छेद का होना, ग्लेशियरों का पिघलना, जलवायु परिवर्तन आदि अनेक रूपों से। जिससे ना केवल मानव जीवन प्रभावित हो रहा है बल्कि जीव जंतु भी प्रभावित हो रहे हैं और अनाज उत्पादन भी दिनों दिन घटता जा रहा है जिससे कुपोषण, भूखमरी और शारीरिक स्वास्थ्य भी प्रभावित हो रहा है।
हमे ना केवल इसको बचाने के लिए सोचना है बल्कि बहुत बड़े पैमाने पर कार्यान्वित भी करना है। धरती के सबसे खूबसूरत आभूषण उसके पेड़ पौधे और जल स्रोत होते हैं जिसको हमने विकास के नाम पर अंधाधुंध कटाई करके और औद्योगिकरण करके इसको बहुत अधिक सीमित और प्रदूषित कर दिया है। आज विश्व भर में बहुत ही कम जंगल बचे हुए हैं जो कि 7 अरब से अधिक होती विश्व जनसंख्या के अनुपात में कम हो गए हैं। हमने बड़े-बड़े बहू वर्षीय और सदाबहार वृक्षों को काटकर उसकी जगह मंहगे और सजावटी छोटे पौधे लगाकर आत्म संतुष्टि पाने का हुनर अपने मस्तिष्क हो जो सिखा दिया है।
आत्मनिर्भर और स्वस्थ ग्रामीण जनसंख्या को उच्च शिक्षा और आधुनिक जीवनशैली का सपना दिखाकर बीमार, बेरोजगार और अनियंत्रित शहरीकरण की चकाचौंध की ओर पलायन करने पर मजबूर कर दिया है। जिससे अनेकों विसंगतियां समाजों में पैदा हो गई हैं और सरकारें एवं प्रशासन उसी को नियंत्रित करने के प्रबंधन में अपना कीमती समय व्यतीत करता रहता है। शहरीकरण की बढ़ती चकाचौंध और विसंगतियों के साथ ही किसानों के द्वारा कृषि उत्पादन पर कम ध्यान दिया जा रहा है और अपने खेतों की उपजाऊ मिट्टी को विकास के बड़े-बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए बेचा जा रहा है जिससे अनाजों को आयात करने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है।
क्यों बड़े-बड़े किंतु खोखले और शोषित शहरों को बसाना आवश्यक है या मजबूत और आत्मनिर्भर ग्रामीण जीवन को सुदृढ बनाना आज विश्व की सोच में क्यों बाहर हो गया है।
शहरीकरण अर्थात आधुनिकीकरण या औद्योगिकीकरण आज के अंधे विकास की हम सभी की सोच बन गई है ।भले ही हमें लाखों विसंगतियों का सामना करना पड़ रहा है फिर भी हम उन विसंगतियों के बीच में अपने आप को सहज पा रहें हैं क्योंकि शहरों में पूंजी दिखती हैं । भले ही एक हाथ से आती हैं और दूसरे हाथ से चली जाती हैं।
पूंजीवादी अर्थव्यवस्था को ही उद्योगपति बढ़ावा दे रहे हैं क्योंकि उन्हें अपने उत्पादों की खपत पर निर्भर उपभोक्ता चाहिए जो शहरों में ही सर्वाधिक सहज रूप से उपल्ब्धि हो सकते हैं और आजकल सरकारें भी इन्हीं उद्योग पतियों की ही खैरातों से चल रही हैं। पूंजीपतियों का एकमात्र उद्देश्य सिर्फ पुंजी संग्रहण होता है समाज सेवा या आम जनता की सेवा का नहीं।
ऐसे में पूंजीवादी अर्थव्यवस्था के दौर में पर्यावरण संरक्षण की कोशिशें करना सचमुच बहुत ही कठिन है क्योंकि पर्यावरण हम सभी आम जनता की जरूरतों को आवश्यक रूप से पूरा करता है जबकि पूंजीपतियों की आवश्यकता सिर्फ और सिर्फ अधिक से अधिक पूंजी संग्रहण होती हैं।
विश्व भर में कई तरह की अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएं जैसे यूनाइटेड नेशंस पर्यावरण प्रोग्राम, डब्ल्यू. एच. ओ. , खाद्य एवं कृषि संगठन आदि मुख्य अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं जो कई प्रकार के आयोजन जैसे 1992 में रियो डी जेनेरियो का सम्मेलन ,2002 में जोहांसबर्ग में उसके पश्चात क्योटो और पेरिस आदि में कई तरह के अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय आयोजन पर्यावरण को बचाने के लिए किए जा रहे हैं किंतु फिर भी हम प्राकृतिक आपदाओं के शिकार हो रहे हैं क्योंकि यह आयोजन सिर्फ मेल- मुलाकातों और कॉन्फ्रेंस तक ही सीमित होते जा रहे हैं ।इनका धरातल स्तर पर कोई भी काम होता दिखाई नहीं देता है क्योंकि पूंजीवादी अर्थव्यवस्थायें नहीं चाहती हैं कि उनकी पूंजी के संग्रहण पर कोई फर्क पड़े इसलिए दोहरी नीतियों को अपनाया जा रहा है ।एक तरफ पर्यावरण संरक्षण पर राग अलापना और दूसरी ओर उसी पर्यावरण को लगातार क्षति पहुंचाना।
दुनिया में भारत ही शायद एकमात्र देश होगा जो विकास के नाम पर अपने जल, जंगल, जमीन को लोगों से हथिया लेता होगा यह वादा करके की पुनः वृक्षारोपण या जल संरक्षण आदि किया जाएगा किंतु आज तक इतने सारे बांध बन गए ,मेगा निर्माण हो गए, सड़कों का चौड़ीकरण हो गया किंतु उनके लिए काटे गए वृक्षों को आज तक नहीं लगाया जा सका है और नदियों की निर्मल धारा को जीवित को नहींं किया जा चुका है जिससे पलायन ,बेरोजगारी, नक्सलवाद, माओवाद, आतंकवाद आदि जैसी गंभीर समस्याएं उत्पन्न हो गई है क्योंकि सरकारों के पास कोई भी ठोस नीतियां नहीं है ।वह सिर्फ पूंजीपतियों के इशारे पर ही कार्य करती आ रही है ।आज प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध दोहन ही विकास का नाम बनता जा रहा है प्रकृति हमारी प्राथमिक आवश्यकता हो तो पूरा कर सकते हैं किंतु हमारे लालच की पूर्ति कभी भी नहीं कर सकती हैं।
प्रकृति के साथ इतनी अधिक निर्ममता करने के बावजूद भी हम प्रकृति से अपने लिए सहज और सुलभ जीवन की ख्वाहिश करते हैं। क्या वह कर पाएगी ?
जब हम अपनी ही माॅं की आंखों में खून के आंसूओं को देते जाएंगे और माॅं के आंचल से दूध की इच्छा करते जाएंगे तो वह दुखी माॅं क्या हमें दूध दे पायेगी? आज हम सभी को अपनी प्रकृति माॅं को बचाने का हरसंभव छोटे से छोटा और बड़े से बड़ा प्रयत्न भी करना चाहिए क्योंकि जीवनपथ में जब सारे रिश्ते-नाते टूट जाते हैं तो यही प्रकृति रूपी भगवान हमारी रक्षा करते हैं और हमें जीवन जीने में मदद करती है। आइए हम सभी अपनी प्रकृति माॅं को सुरक्षित और संरक्षित करने का प्रयत्न करते हैं क्योंकि हमारे पूर्वजों ने हमें यही अनमोल खजाना सौंपा है और हम अपने आने वाली पीढ़ियों को भी यही अनमोल खजाना सौंपना चाहेंगे

स्मिता जैन

matruadmin

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’

29 अप्रैल, 1989 को मध्य प्रदेश के सेंधवा में पिता श्री सुरेश जैन व माता श्रीमती शोभा जैन के घर अर्पण का जन्म हुआ। उनकी एक छोटी बहन नेहल हैं। अर्पण जैन मध्यप्रदेश के धार जिले की तहसील कुक्षी में पले-बढ़े। आरंभिक शिक्षा कुक्षी के वर्धमान जैन हाईस्कूल और शा. बा. उ. मा. विद्यालय कुक्षी में हासिल की, तथा इंदौर में जाकर राजीव गाँधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के अंतर्गत एसएटीएम महाविद्यालय से संगणक विज्ञान (कम्प्यूटर साइंस) में बेचलर ऑफ़ इंजीनियरिंग (बीई-कंप्यूटर साइंस) में स्नातक की पढ़ाई के साथ ही 11 जनवरी, 2010 को ‘सेन्स टेक्नोलॉजीस की शुरुआत की। अर्पण ने फ़ॉरेन ट्रेड में एमबीए किया तथा एम.जे. की पढ़ाई भी की। उसके बाद ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियाँ’ विषय पर अपना शोध कार्य करके पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। उन्होंने सॉफ़्टवेयर के व्यापार के साथ ही ख़बर हलचल वेब मीडिया की स्थापना की। वर्ष 2015 में शिखा जैन जी से उनका विवाह हुआ। वे मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं और हिन्दी ग्राम के संस्थापक भी हैं। डॉ. अर्पण जैन ने 11 लाख से अधिक लोगों के हस्ताक्षर हिन्दी में परिवर्तित करवाए, जिसके कारण वर्ल्ड बुक ऑफ़ रिकॉर्डस, लन्दन द्वारा विश्व कीर्तिमान प्रदान किया गया।