माँ नाम तभी तो भारी है

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जिस दर्द से तू अनभिज्ञ रहा,
हर माह सहन वह करती है।
गर्भ से बाहर लाने तक,
अक्षम्य पीड़ा को सहती है।।

माहवारी जिसे नापाक कहा,
नींव अस्तित्व की रखती है।
सुख-दुःख में एक समान रहे,
हर सुख तुझमे ही भरती है।।

सौंदर्य का त्याग सदा करती,
नौ माह पेट मे रखती है।
दुःख को पतझड़ वह मान सदा,
बसंत तुझमे ही भरती है।।

त्याग उसी से शुरू हुआ,
प्यार उसी से जारी है।
कदमों में स्वर्ग बसा उसके,
माँ नाम तभी तो भारी है।।

क्यों कहता है वह नारी है,
पितृ सत्ता की अधिकारी है।
भूल गया तू जननी को,
दूध के कर्ज़ की बारी है।।

ज़हीर अली सिद्दीक़ी
मुम्बई-महाराष्ट्र

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।