शांतिनिकेतन यात्रा संस्मरण (भाग 6)

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पश्चिम बंगाल लोक कला और संस्कृति के मामले में एक समृद्ध राज्य है…शांतिनिकेतन यात्रा संस्मरण की कड़ी में पश्चिम बंगाल के ‘बाउल संगीत’ का जिक्र भी जरूरी है…यह संगीत यहां की विरासत है…इस संगीत ने यहां के सांस्कृतिक जगत में बहुत कुछ जोड़ा है…

बाउल संगीत ऐसा है कि सीधे रूह में उतर जाय… काफी हद तक सूफी संगीत जैसा…कविगुरु रवींद्रनाथ टैगोर भी बाउल संगीत के प्रशंसक थे…वे शांतिनिकेतन के कार्यक्रमों में बाउल कलाकारों को जरूर बुलाते थे…

कविगुरु ने अपने एक गीत में लिखा भी है…’बादल बाउल बजाए रे इकतारा… झर झर झरती है बस जलधारा…’ मतलब जैसे बादल आकाश में विचरते रहे हैं वैसे ही बाउल विचरते रहे हैं बंगाल की भूमि पर अपनी रसधार के साथ… यहां के गांव कस्बों में, खेत खलिहानों में, वनांचलों और मैदानी इलाकों में… हर जगह बाउल गूंजते रहे हैं…

बंगाल के लगभग हर हिस्से में बसते हैं बाउल अपने कुनबे के साथ…शांतिनिकेतन के आसपास भी इनका एक कुनबा नजर आया…बीरभूम जिले में इन घुम्मकड़ कलाकारों की तादात अधिक है…

हाथ में इकतारा लिए हुए ये बंसी भी बजाते हैं… ढोलक भी…पैरों में घुंघरू भी बांधते हैं… सिर पर पगड़ी भी…कपड़े ज्यादातर गेरुआ रंग के होते हैं… उनकी अपनी ही वेशभूषा अपनी ही चालढाल है.. दूर से ही पहचान में आ जाते हैं… चलते हैं तो नूपुर की झंकार सुनाई देती है… गाते हुए नाचते भी हैं अपनी शैली में…उनकी पूरी देह लय में डूब जाती है… अपने सुर ताल और भंगिमा से वे अपनी बात को सुननेवाले के हृदय में उतार देने का गुर जानते हैं…

उनका गान दरअसल एक आकुल पुकार है सृष्टिकर्ता के लिए…अज्ञात के लिए…जो कदाचित आत्मरूप में कैद है…बंधन में है… और खुले में उड़ना चाह रहा है… बाउल उसे ही मुक्त करना चाहता है…

बाउल गीतों के ज्यादातर बिम्ब प्रकृति से जुड़े हैं…उनमें धान के खेत, ताल सरोवर, मेघ से भरे आकाश, वनांचल, फूल, पौधे, वृक्ष, वनस्पति ही गुंजायमान होते हैं…यह गायन मनुष्य को प्रकृति से जोड़ने की एक जीवंत कला है…

बंगाल की इस अनोखी परंपरा को प्रत्यक्ष रूप में देखना मेरे लिए आनंद का विषय था पर इन कलाकारों की अवस्था को देखकर थोड़ा दुःख भी हुआ… मैं सोचता रहा कि सरकार को इनके जीवन स्तर को सुधारने की दिशा में जरूर कुछ करना चाहिए…

इस लोक कला और इस विरासत को बचाये रखना बेहद जरूरी है…

क्रमशः….

डा. स्वयंभू शलभ

रक्सौल (बिहार)

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’

29 अप्रैल, 1989 को मध्य प्रदेश के सेंधवा में पिता श्री सुरेश जैन व माता श्रीमती शोभा जैन के घर अर्पण का जन्म हुआ। उनकी एक छोटी बहन नेहल हैं। अर्पण जैन मध्यप्रदेश के धार जिले की तहसील कुक्षी में पले-बढ़े। आरंभिक शिक्षा कुक्षी के वर्धमान जैन हाईस्कूल और शा. बा. उ. मा. विद्यालय कुक्षी में हासिल की, तथा इंदौर में जाकर राजीव गाँधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के अंतर्गत एसएटीएम महाविद्यालय से संगणक विज्ञान (कम्प्यूटर साइंस) में बेचलर ऑफ़ इंजीनियरिंग (बीई-कंप्यूटर साइंस) में स्नातक की पढ़ाई के साथ ही 11 जनवरी, 2010 को ‘सेन्स टेक्नोलॉजीस की शुरुआत की। अर्पण ने फ़ॉरेन ट्रेड में एमबीए किया तथा एम.जे. की पढ़ाई भी की। उसके बाद ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियाँ’ विषय पर अपना शोध कार्य करके पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। उन्होंने सॉफ़्टवेयर के व्यापार के साथ ही ख़बर हलचल वेब मीडिया की स्थापना की। वर्ष 2015 में शिखा जैन जी से उनका विवाह हुआ। वे मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं और हिन्दी ग्राम के संस्थापक भी हैं। डॉ. अर्पण जैन ने 11 लाख से अधिक लोगों के हस्ताक्षर हिन्दी में परिवर्तित करवाए, जिसके कारण वर्ल्ड बुक ऑफ़ रिकॉर्डस, लन्दन द्वारा विश्व कीर्तिमान प्रदान किया गया।