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ऐ मानव सुनो
प्रकृति को न छेड़ो
स्वतंत्र बहने दो नदियों को
न बाँधों इनको और न कैद करो
स्वतंत्र रहने दो और मस्त रहो।
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स्वतंत्रता सबको है प्यारी
भला कबतक कैद रहेंगे
मजबूत से मजबूत बाँध बनेंगे
अपने वेग से ये जरूर तोडेंगे।
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आजाद मुल्क में कर दो
आजाद वन पहाड़ नदियों को
वरना जलजला बनकर टूटती रहेगी
और ऐसे ही निगलती रहेगी जिंदगी को।
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आजादी से पहले भी नदियाँ थी
कहाँ होता था इतना नुकसान
मौज में बहते थे सारे
मस्ती में रहता था इन्सान।
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जितने इनपर रिर्सच हुए
उतनी जिंदगानी नर्क हुए
जितने मजबूत दिवार बन रहे
उतने ही ये टूट रहे
हरवर्ष गाँव के गाँव निगल रहे
इसलिए हे मानव सुधर जाओ ।
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बाँध किनारे गाँव था
धनी आबादी और घर था
आज देखता हूँ उस तरफ तो
कलेजा मुँह को आता है।
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बाँध टूटी और पूरी वस्ती
निगल गया
पता ही नही चला
गाँव का वजूद कैसे
पल भर में मिट गया।
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न वो जिंदगानी रही
ना वो पुरखो की निशानी रही
अब पुनः इतनी हिम्मत कैसे लाऊँ
अपनो को कैसे भुलाऊँ
इसलिए हे मानव संभल जाओ।
“आशुतोष”
नाम। – आशुतोष कुमार
साहित्यक उपनाम – आशुतोष
जन्मतिथि – 30/101973
वर्तमान पता – 113/77बी
शास्त्रीनगर
पटना 23 बिहार
कार्यक्षेत्र – जाॅब
शिक्षा – ऑनर्स अर्थशास्त्र
मोबाइलव्हाट्स एप – 9852842667
प्रकाशन – नगण्य
सम्मान। – नगण्य
अन्य उलब्धि – कभ्प्यूटर आपरेटर
टीवी टेक्नीशियन
लेखन का उद्द्श्य – सामाजिक जागृति
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