*पाठक को तय करने दो आपके लेखन का कद*

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arpan jain
वो दौर भी जाता दिख रहा है जब अदद पाठक अपनी मानसिक खुराक की खोज में पुस्तकें टटोलता था, पुस्तकालय के खाक छानता था, दोस्तों से किताबें भी उधार मांगता था, कहीं सड़क किनारे लगी किताबों की दुकान पर ठहर कर वो अपने कद को खोजता था, पहचानता था वो अपना स्वाद, सृजक के सृजन में समाधान की गंध ढूंढता था, पुस्तक की अच्छाईयों को डायरी में उतारकर हमेशा के लिए अपना संदर्भ बना लेता था, रंग बुनता था, रस खोजता था और उससे भी बड़ी बात, जब वह पाठक अपने दोस्तों, रिश्तेदारों की महफिल में बैठता था तो उन्ही संदर्भों के आलोक में एक आत्मविश्वास से कहता था, फलाँ लेखक ने फलाँ किताब में यह लिखा है पढ़ना जरूर… मशहूर कवि हरिवंश रॉय बच्चन साहब की कविता मधुशाला जिसकी पंक्ति है ‘अब न रहे वो पीने वाले, अब न रही वो मधुशाला’ की तरह ही साहित्य में *’अब न रहे वो पढ़ने वाले अब न रहा वो लिखने वाला* सटीक बैठता है|
न तो अब किताबों में वो सृजन बहुतायात में आ रहा है जो पाठकों को आकर्षित कर सकें, न ही पाठक वैसे शेष है |
वैसे आधुनिकता की आपा-धापी में किताबों की वो आदतें अब बदल-सी गई है, जो कभी किताबों में मुहँ छुपा कर सो जाते थे, पढ़ते-पढ़ते कब किताबें तकिया और सपने पाठकों का ओढ़ना बन जाया करती थी, आज वो आदतें गुमनाम होती जा रही है।
खैर दौर तो बदला है, पर अब किताबों की जगह मोबाईल, लेपटॉप और कम्प्यूटर लेता जा रहा है। इंटरनेट क्रान्ति ने पाठकों की आदत को इंटरनेट का आदी बना दिया है। ईबुक और नेट पर उपलब्ध सामग्री की तरफ आकर्षित भी किया और कम खर्च में कई विषयों पर पारंगतता के सर्वमान्य विकल्प की तरफ अग्रसर भी किया है।
आज का पाठक इंटरनेट पर प्रकाशित सामग्रियों में अपना मसाला खोजने लगा है, गूगल पर विषय अनुसार पाठ्य सामग्री उपलब्ध हो जाने से मानसिक खुराक पाने का ठीया बदल गया है।
बदले हुए ठीये के अनुसार अब लेखकों को भी अपनी आदतें बदलना होगी, पाठकों के जमघट को पुस्तक मेलों में नहीं बल्कि इंटरनेट पर खोजना होगा, जहाँ लेखक का गंभीर, तथ्यपरक और समाधानमूलक सृजन ही इंटरनेट की चौपाल पर पाठकों को आकर्षित कर पाएगा।
इसी इंटरनेट की दुनिया में एक व्यवस्था है *की वर्ड* जिस पर इंटरनेट के मायाजाल की खोज टिकी हुई है | लेखक को नए तंत्र के साथ कदमताल करना है तो तंत्र की बारिकीयों को भी समझना होगा।
इंटरनेट पर आपका ब्लॉग, वेबसाईट या प्रसिद्ध वेबसाईट पर प्रकाशित आपके आलेख, कविता, किस्से-कहानीयाँ, लघुकथा, व्यंग्य और अन्य विधा पर रचे सृजन को उसी के अंदर छिपे #कीवर्ड से गूगल जैसे तमाम सर्च इंजन पर खोजा जाता है, उसे आधार बनाकर लेखन करना आपकी प्रसिद्धि में चार चाँद लगा सकता है ।
मानदेय मिलने का इंतजार समसामायिकता से कई बार उसी लेखक को विमुख भी कर देता है।
बात इतनी-सी है कि आप पाठक को कहाँ खोजे, और क्या लिखे जो पाठकों तक पहुँचे क्योंकि सोशल मीडिया के जाल में रोज हजारों रचनाएं आती है, सैकड़ों पढ़ी जाती है पर बीसीयों ही स्वीकारी जाती है और उनमें से इक्का-दुक्का ही याद रखी जाती है। उन इक्का-दुक्का में शामिल होना ही असल मायने में *बेस्ट सेलर किताब के लेखक* होने जैसा सम्मान है।
हर बार किसी विषय पर लिखने के लिए पर्याप्त संदर्भों का हवाला, भावनाओं की जुगलबंदी, काव्य में गेयता, लय और समानता होना, कथा में चरित्र का चित्र होना भी महत्वपूर्ण होता है, वर्ना तो है ही ढाक के तीन पात ।
आपके पाठक तय करते हैं आपके लेखन का कद, पर इसके लिए आपकों पाठकों की चौपाल तक पहुँचना तो पड़ेगा ही, वर्ना मौन की गूंज में सृजन गौण हो जाएगा।
इंटरनेट फ्रेन्डली रचनाकार होना आज के दौर में आपके सृजन को विश्वव्यापी बना सकता है, बशर्तें आपके लेखन में वो बात हो जो पाठकों को उसकी खुराक देने का माद्दा रखती हो, वर्ना इंटरनेट का पाठक खारिज भी बहुत जल्दी करता है जैसे स्वीकारता जल्दी है।
यकीनन पाठकों को तय करने दीजिए आपके लेखन का कद, वो आपके लिए किसी खिताब से कम नहीं होगा।
बने रहिए, सक्रिय रहिए और  संवाद की आत्मा को जीवंत रखिए…. यही वो बात है जो भविष्य के प्लाट पर आपकी ही कहानी को बेहतरीन तरीके से रच देगी और मिलेगा आपकों पाठक प्रेम….।

#डॉ.अर्पण जैन ‘अविचल’

परिचय : डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर  साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।

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संस्थापक एवं सम्पादक

डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’

29 अप्रैल, 1989 को मध्य प्रदेश के सेंधवा में पिता श्री सुरेश जैन व माता श्रीमती शोभा जैन के घर अर्पण का जन्म हुआ। उनकी एक छोटी बहन नेहल हैं। अर्पण जैन मध्यप्रदेश के धार जिले की तहसील कुक्षी में पले-बढ़े। आरंभिक शिक्षा कुक्षी के वर्धमान जैन हाईस्कूल और शा. बा. उ. मा. विद्यालय कुक्षी में हासिल की, तथा इंदौर में जाकर राजीव गाँधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के अंतर्गत एसएटीएम महाविद्यालय से संगणक विज्ञान (कम्प्यूटर साइंस) में बेचलर ऑफ़ इंजीनियरिंग (बीई-कंप्यूटर साइंस) में स्नातक की पढ़ाई के साथ ही 11 जनवरी, 2010 को ‘सेन्स टेक्नोलॉजीस की शुरुआत की। अर्पण ने फ़ॉरेन ट्रेड में एमबीए किया तथा एम.जे. की पढ़ाई भी की। उसके बाद ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियाँ’ विषय पर अपना शोध कार्य करके पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। उन्होंने सॉफ़्टवेयर के व्यापार के साथ ही ख़बर हलचल वेब मीडिया की स्थापना की। वर्ष 2015 में शिखा जैन जी से उनका विवाह हुआ। वे मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं और हिन्दी ग्राम के संस्थापक भी हैं। डॉ. अर्पण जैन ने 11 लाख से अधिक लोगों के हस्ताक्षर हिन्दी में परिवर्तित करवाए, जिसके कारण वर्ल्ड बुक ऑफ़ रिकॉर्डस, लन्दन द्वारा विश्व कीर्तिमान प्रदान किया गया।