
सोचता हूँ आज मौत से दोस्ती कर लूँ
जिस्म को रख गिरवी रूह का व्यपार कर लूँ
बहुत टूटे हैं मेरे सपने इस बाजार में
उस संसार में सबको साकार कर लूँ
धोखे के जखमों का दर्द अब सहा नहीं जाता
अनदेखे लोक के मरहम को लगा के देख लूँ
नहीं दिखता शीशे में अक्स का सच अब
त्याग काया को निर्मल अपनी आत्मा कर लूँ
रोक लेती है फर्ज की जजीरें मुझको
मुख मोड़ इनसे “हर्ष’ कैसे ये कारोबार कर लूँ
कायर संबोधन को ‘हर्ष” कैसे स्वीकार कर लूँ
#प्रमोद कुमार हर्ष

