सफरनामा

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swayambhu 

भाग ४…………….
मुंबई प्रवास के दौरान कितने ही कलाकारों से रूबरू होने का मौका मिला…बी.आर.स्टूडियो में हर रोज तमाम फिल्मी हस्तियों का आना-जाना लगा रहता था…उनके साथ जुड़े अनगिनत यादगार लम्हे हैं,जो स्मृतियों में आज भी ताजा हैं…उन्हें इकठ्ठा करने की कोशिश करूं तो एक खूबसूरत गुलदस्ता बन जाए…l
हमेशा परदे पर दिखने वाले अभिनेता या अभिनेत्री को एकाएक सामने देखकर कभी-कभी यकीन करना मुश्किल हो जाता था…एकाध बार भ्रम की स्थिति भी बनी…एक शख्स को मशहूर चरित्र अभिनेता ओमप्रकाश समझकर देर तक बातचीत करता रहा। चलते वक्त जब वे मुझसे एक किताब खरीदने की जिद करने लगे,तब समझ में आया कि महाशय केवल शक्ल-सूरत से ओमप्रकाश जी जैसे दिखते हैं,असल में उन्होंने पूरी जिंदगी इस उद्द्योग में वैसे कलाकार के रूप में काम किया है,जिसे केवल भीड़ के दृश्य में बुलाया जाता है दिहाड़ी पर। इस उद्द्योग में सबका अपना-अपना दर्द है…l
जूही चावला बड़ी खुशमिजाज लगीं…फिल्म सिटी के अंदर एक शूटिंग में उनसे मुलाकात हुई थी…ऋषि कपूर भी साथ थे…स्टूडियो के बगीचे में हम एक बेंच पर साथ बैठे थे…एक स्टाफ ने हमारी तस्वीर ली,तो कहने लगीं-`ये भी कोई पोज है फोटोशूट का…मुझे जरा स्टाइल में तो आने दो…l`
कई बार फिल्म सिटी और दूसरे स्टूडियो में भी जाने का मौका मिला। कुछ वक्त डेविड धवन की ‘स्वर्ग’ और राजकुमार संतोषी की ‘घायल’ की शूटिंग में भी गुजरा।
किसी फ़िल्म या किसी सीन को खारिज करने में दर्शक एक पल की देरी नहीं करता,लेकिन उसे बनाने में पूरी टीम को कितनी मशक्कत करनी पड़ती है,इसका अनुभव भी हुआ…l
कमालिस्तान स्टूडियो में राजकुमार संतोषी की फ़िल्म ‘घायल’ की शूटिंग चल रही थी…सीन कुछ ऐसा था…भागती हुई कार में बलवंत राय की भूमिका में अमरीशपुरी अपने-आप को बचाने की कोशिश कर रहे थे…एक तरफ से सनी देओल अपने साथियों के साथ गोली दागते हुए उन्हें मारने की कोशिश कर रहे थे…दूसरी तरफ से एसीपी डिसूजा की भूमिका में ओमपुरी उन्हें पकड़ने की कोशिश कर रहे थे। दृश्य बार-बार रि-टेक हो रहा था। बार-बार ओमपुरी अपना यूनिफार्म और अमरीशपुरी अपना सूट बदल रहे थे। इसी दौरान दोनों दिग्गज कलाकारों के साथ मिलने का मौका मिला था। उस मुलाकात में उनकी यह बात बार-बार याद आती है-`इस सीन के लिए जो हम चार घण्टे से पसीना बहा रहे हैं,तीन बार यूनिफार्म बदल चुके,आप फ़िल्म में देखना दो मिनट से ज्यादा का सीन नहीं होगा…`,और सच में ऐसा ही था। फ़िल्म प्रदर्शित होने पर मैं पूरी फ़िल्म में उस दृश्य को ढूंढता रहा। वह कब आया और चला गया,पता भी नहीं चला।
ये तमाम यादें किसी फिल्म के सीन जैसी ही हैं…स्मृतियों के परदे पर चमकती हैं,दमकती हैं…फिर कुछ मीठा-सा अहसास छोड़कर अचानक गायब हो जाती हैं…वैसे तो हम सब भी यहां अपना किरदार ही निभा रहे हैं… वे रील की जिन्दगी में अपना किरदार निभा रहे हैं और हम सब वास्तविक जिन्दगी में…लेकिन एक विरोधाभास वहां भी है और यहां भी…किरदार को निभाना और किरदार को जीने में फर्क होता है…कुछ वैसा ही फर्क जो कल्पना के सच और हकीकत के सच के बीच होता है…हम एक सुनहरे ख्वाब के अंदर जिंदगी तलाशने की जद्दोजहद करते रह जाते हैं और उम्र रेत की तरह मुट्ठी से फिसल जाती है…l
(क्रमश…इंतज़ार कीजिए पांचवे भाग का)

#डॉ. स्वयंभू शलभ

परिचय : डॉ. स्वयंभू शलभ का निवास बिहार राज्य के रक्सौल शहर में हैl आपकी जन्मतिथि-२ नवम्बर १९६३ तथा जन्म स्थान-रक्सौल (बिहार)है l शिक्षा एमएससी(फिजिक्स) तथा पीएच-डी. है l कार्यक्षेत्र-प्राध्यापक (भौतिक विज्ञान) हैं l शहर-रक्सौल राज्य-बिहार है l सामाजिक क्षेत्र में भारत नेपाल के इस सीमा क्षेत्र के सर्वांगीण विकास के लिए कई मुद्दे सरकार के सामने रखे,जिन पर प्रधानमंत्री एवं मुख्यमंत्री कार्यालय सहित विभिन्न मंत्रालयों ने संज्ञान लिया,संबंधित विभागों ने आवश्यक कदम उठाए हैं। आपकी विधा-कविता,गीत,ग़ज़ल,कहानी,लेख और संस्मरण है। ब्लॉग पर भी सक्रिय हैं l ‘प्राणों के साज पर’, ‘अंतर्बोध’, ‘श्रृंखला के खंड’ (कविता संग्रह) एवं ‘अनुभूति दंश’ (गजल संग्रह) प्रकाशित तथा ‘डॉ.हरिवंशराय बच्चन के 38 पत्र डॉ. शलभ के नाम’ (पत्र संग्रह) एवं ‘कोई एक आशियां’ (कहानी संग्रह) प्रकाशनाधीन हैं l कुछ पत्रिकाओं का संपादन भी किया है l भूटान में अखिल भारतीय ब्याहुत महासभा के अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में विज्ञान और साहित्य की उपलब्धियों के लिए सम्मानित किए गए हैं। वार्षिक पत्रिका के प्रधान संपादक के रूप में उत्कृष्ट सेवा कार्य के लिए दिसम्बर में जगतगुरु वामाचार्य‘पीठाधीश पुरस्कार’ और सामाजिक क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए अखिल भारतीय वियाहुत कलवार महासभा द्वारा भी सम्मानित किए गए हैं तो नेपाल में दीर्घ सेवा पदक से भी सम्मानित हुए हैं l साहित्य के प्रभाव से सामाजिक परिवर्तन की दिशा में कई उल्लेखनीय कार्य किए हैं। आपके लेखन का उद्देश्य-जीवन का अध्ययन है। यह जिंदगी के दर्द,कड़वाहट और विषमताओं को समझने के साथ प्रेम,सौंदर्य और संवेदना है वहां तक पहुंचने का एक जरिया है।

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।