`जरूरी’ और ‘मजबूरी’ के बीच झूलती हमारी भाषायी संवेदना

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गत दिवस राष्ट्रपति जी ने केरल उच्च न्यायालय के एक समारोह में न्याय को जनता की भाषा में लाने के पक्ष में आवाज बुलंद करते हुए कहा कि उच्च न्यायालय अंग्रेजी में निर्णय देते हैं लेकिन जो लोग अंग्रेजी को अच्छे से नहीं समझ पाते,उनके लिए न्यायालयों द्वारा स्थानीय भाषाओं में निर्णय की प्रमाणित अनुवादित प्रतियां २४ घण्टे में उपलब्ध कराई जानी चाहिए। जब महामहिम राष्ट्रपति जी भारतीय भाषाओं पर हावी अंग्रेजी के तिलिस्म को तोड़ने के पक्ष में आवाज उठा रहे थे,लगभग उसी समय दिल्ली नगर निगम द्वारा अगले सत्र से अपने विद्यालयों में पहली कक्षा से अंग्रेजी पढ़ाने का निर्णय सामने आया। प्रथम दृष्टया ये दोनों बातें परस्पर विरोधी प्रतीत होती हैं। कहा जा सकता है कि देश के सर्वाेच्च पद पर विराजमान व्यक्तित्व अंग्रेजी के स्थान पर भारतीय भाषाओं के पक्षधर हैं तो देश के सबसे बड़े दल के शासन वाले देश के राज्य में अबोध बच्चों पर अंग्रेजी लादी जा रही है। गंभीरता से विचार किया जाए,तो यह तथ्य हमारे सामने आता है कि राष्ट्रपति जी ने जो कहा वह ‘जरूरी’ है,जबकि सरकारी स्कूलों में अंग्रेजी पढ़ाने की बात ‘मजबूरी’ है।
दिल्ली सहित देश के महानगरों में पिछले कुछ दशकों में ‘पब्लिक स्कूल’ संस्कृति बहुत तेजी से फैली है। गली-गली में निजी स्कूल खुल गए हैं,जो ‘अंग्रेजी माध्यम’ होने का दावा करते हैं। यहां प्रवेश पाकर ‘गुड मार्निंग’ और एक-दो पोयम रटने वाले अपने छोटे-छोटे बच्चों को देख फूले नहीं समाते। इसे दुर्भाग्य कहें,या मजबूरी लेकिन सत्य यही है कि केवल मध्यम वर्ग ही नहीं,निम्न-मध्यम वर्ग,यहां तक कि किराए के मकान में रहकर किराए का रिक्शा चलाने वाले,पटरीवाले भी अपने बच्चे को बेशक दड़बेनुमा शाला ही क्यों न हो,लेकिन ‘अंग्रेजी’ माहौल से जोड़ना चाहते हैं,इसलिए यह कोई आश्चर्य नहीं कि,दिल्ली नगर निगम के प्राथमिक कक्षाओं के छात्रों की संख्या दिल्ली के कुल छात्रों का एक चौथाई भी नहीं है। इसका सीधा-सीधा अर्थ यह है कि तीन-चौथाई से अधिक प्राथमिक कक्षाओं के छात्र पहली कक्षा से अंग्रेजी पढ़ रहे हैं या झेल रहे हैं।
यह जानते हुए भी कि ‘मातृभाषा में विद्यार्थी को अपना विषय समझने में सरलता और सुगमता होती है,जबकि विदेशी भाषा में विषय काफी समय तक समझ में नहीं आते या आधे-अधूरे ही आते हैं। समय-समय पर विभिन्न आयोगों ने भी अपनी सिफारिशों में इसी बात पर बल दिया,लेकिन दुर्भाग्य की बात यह कि अपने-अपने समय में हर दल की सरकार ने इन सिफारिशों को ठण्डे बस्ते के हवाले करना ही उचित समझा।
एक विशेष बात यह कि,अपनी मातृभाषा में शिक्षा प्राप्त करते हुए बच्चा अपनी संस्कृति और मानवीय मूल्यों के संस्कार संग देशभक्ति सहजता से ग्रहण कर लेता है। हम केवल उपरी मन से अपनी भाषाओं की बात करते हैं,परंतु अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम के विद्यालयों में भेजते हैं। उस पर तर्क यह कि ‘केवल मेरे बच्चे थोड़े ही पब्लिक स्कूल जाते हैं।’ या ‘केवल मेरे करने से क्या फर्क पड़ने वाला है।’
यह सर्वविदित है कि आचार्य विनोबा भावे ने देवनागरी के माध्यम से अनेक विदेशी भाषाएं सीखी। विदेशी माध्यम से बालमन पर नकारात्मक प्रभाव ही पड़ता है। ऐसे में बच्चा ‘आधा तीतर,आधा बटेर’ होकर न तो ढंग से मातृभाषा सीखा पाता है और न ही विदेशी भाषा। जहां तक राजकीय विद्यालयों का प्रश्न है,वहां प्रतिदिन,मध्यान्ह भोजन,मुफ्त पुस्तकें,मुफ्त बस्ता,सर्दी में मुफ्त स्वेटर,कुछ वर्गों को आर्थिक अनुदान,वजीफा सहित बहुत कुछ दिया जाता है। इसके बावजूद दिल्ली नगर निगम के विद्यालयों से मध्यम वर्ग पहले ही दूरी बना चुका है,अतः वहां किस वर्ग के बच्चे हाजिरी लगाते हैं,यह कोई पहेली नहीं है। आरोप यह भी है कि कुछ लोग यहां अंग्रेजी लाने के इसलिए विरोधी हैं,ताकि अंतर बना रहे। वास्तविकता यह है कि,जो लोग इन चन्द अंग्रेजी रहित विद्यालयों में अंग्रेजी लादने का विरोध कर रहे हैं,वे समस्या का केवल एक पक्ष देख अथवा दिखा रहे हैं। क्या मात्र इनको अंग्रेजी से दूर रखना समस्या का समाधान है ? वे यह क्यों नहीं जानना चाहते कि,इनमें छात्रों का प्रतिशत लगातार क्यों गिर रहा है ? क्या इसका कारण इनमें पढ़ाई के स्तर के साथ-साथ अंग्रेजी का न होना नहीं है ? अधिसंख्यक लोगों के व्यवहार और वातावरण के साथ चलना आम आदमी की मजबूरी है। एक रिक्शा चालक,घर-घर जाकर बर्तन साफ करने वाली,सफाई करने वाले,कपड़े धोने वाले,सब्जी बेचने वाले का वास्ता हर क्षण ऐसे लोगों से पड़ता है जो ‘सड़सठ’ नहीं समझते। उनके लिए `सिक्सटीऐट` जानना जरूरी है। सच तो यह है कि वे ग्यारह,बारह क्या..दो,तीन,चार भी नहीं जानते। उनके साथ संवाद,व्यवहार,व्यापार,लेन-देन करने के लिए उन्हें भी गलत या सही अंग्रेजी सीखने की आवश्कता महसूस होती है। जो स्वयं अंग्रेजी नहीं सीख सके,वे अपने बच्चों को सिखाना चाहते हैं। अतः उनका सरकार पर दबाव है कि उन विद्यालयों में भी अधिकांश शालाओं की तरह अंग्रेजी होनी चाहिए। ऐसी मांग करने वालों की मजबूरी को अनदेखा नहीं किया जा सकता।
यह कहना अपनी जगह सही हो सकता है कि नगर निगम के विद्यालयों को निजी से मुक़ाबला करने के लिए अंग्रेज़ी का सहारा लेने की कोई जरूरत नहीं है। पढ़ाई का स्तर सुधार कर वे उन विद्यालयों से बेहतर परिणाम दे सकते है। दरअसल इस तर्क में आवाज जरूर है,परंतु लड़खड़ाती हुई कमजोर आवाज। वास्तव में केवल शिक्षा में ही नहीं,जीवन के हर स्तर पर तुलना का दौर है। लगभग सभी सरकारी विद्यालय,निजी विद्यालयों से तुलना करते हुए अपने छात्रों के गले में `टाई` तो बंधवा ही चुके हैं। वेशभूषा से परिवेश तक हर जगह तुलना की परिपाटी के बीच आप अंग्रेजी सीखने की मजबूरी को नजरअंदाज कैसे कर सकते हैं ?
अनेक विद्वान,शिक्षाविद इन विद्यालयों में प्रथम कक्षा से अंग्रेजी लागू करने की कड़ी आलोचना कर रहे हैं। विश्व के अनेक देशों के उदाहरण प्रस्तुत करते हैं,लेकिन वे जरा अपने मन को टटोल कर उत्तर जानने की कोशिश करें कि क्या यहां शेष परिस्थितियां उन देशों जैसी है ? अपनी शासन प्रणाली, संविधान,अपनेे नेताओं का आचरण,संसाधन,परिवेश, अपरिपक्वता तथा वर्गों में बंटे समाज और सबसे बड़ी बात नैतिकता के बड़े-बड़े दावे करने वालों के खोखले चरित्र को बदले बिना इस भाषायी पाखंड को कैसे दूर किया जा सकता है ?
यह भी विचारणीय है कि क्या मात्र इन विद्यालयों में प्राथमिक स्तर पर अंग्रेजी रोकना पर्याप्त है ? अगर अंग्रेजी को इस स्तर पर रोकना है तो देश के सभी विद्यालयों में,चाहे वे राजकीय हों अथवा निजी प्राथमिक शिक्षा का माध्यम केवल स्थानीय भाषा और छठी से स्थानीय भाषा के साथ हिंदी को किया जाना चाहिए। बेशक जर्मन,जापान,चीन आदि अधिकांश देश अंग्रेजी के बिना आसमान छू सकते हों,लेकिन भारत में अंग्रेजी नहीं रही तो प्रलय हो जाएगा। शिक्षा का माध्यम चुनने की स्वतंत्रता को मौलिक अधिकार बताने वाले अपनी करनी से बाज नहीं आएंगे तो क्यों न लोकतंत्र में बहुमत के बल पर भारतीय भाषाओं के पक्षधर सभी राजनीतिक दलों पर सरकारी नौकरियों में केवल उन सरकारी विद्यालयों में पढ़ने वालों के लिए आरक्षित करने का कानून बनाने का दबाव बनाएं। यदि यह संवैधानिक प्रावधान कर दिया जाए तो अंग्रेजी की मजबूरी से काफी हद तक छुटकारा पाया जा सकता है।
हम इस बात से इंकार नहीं कर सकते कि बेशक भाषा संवाद का माध्यम है,लेकिन उसका रोजी-रोटी से भी संबंध होता है। जिस भाषा की जानकारी का रोजगार से कोई संबंध होगा,आप लाख चाहकर भी उसे आगे बढ़ने से नहीं रोक सकते। शायद राष्ट्रपति जी के मन में भी जरूर यह विचार रहा होगा कि अपनी भाषाओं का रक्षण जरूरी है। उन्होंने अपने जीवन में कठिनाईयों को बहुत करीब से देखा है,अतः उनकी अभिव्यक्ति साधारण से साधारण भारतीय के प्रतिनिधि की आवाज है। वे अच्छी तरह से जानते हैं कि अगर अपनी भाषाओं की अनदेखी करते हुए विदेशी भाषा को तरजीह दी गई तो सामान्यजन के मन में विदेशी भाषा के प्रति आकर्षण रोका नहीं जा सकता। निश्चित रूप से आरंभिक शिक्षा का माध्यम विदेशी भाषा नहीं होना चाहिए।(साभार-वैश्विक हिंदी सम्मेलन,मुंबई)

                                                  #डॉ. विनोद बब्बर 

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।