sunil jain
देश साहित्यकारों से अटा पड़ा है। हर गली-मुहल्ले, शहर सब स्थानों पर `शादी ही शादी` के बैनर जैसे साहित्यकार ही साहित्यकार के बैनर अटे पड़े हैं। मंच पर श्रोता और मंच के सामने साहित्यकार बैठे पाए जाते हैं। ये कुछ भी नया नहीं है। साहित्यकार तो पहले भी होते रहे हैं, लेकिन `चातक साहित्यकार` अब पैदा होने लगे हैं। 
आदमी जैसे ही आदमी बनता है,वैसे ही उसमें साहित्यिक गुण नजर आने लगते हैं। आदमी का आदमी बनना यानी उसमें महिलाओं के प्रति आकर्षण या महिलाओं का पुरूषों के प्रति आकर्षण..,यहीं से साहित्य सृजन शुरू हो जाता है। यह आकर्षण ही है,जो कविता,कहानी,व्यंग्य का जन्मदाता होता है,लेकिन यह परिपक्व तभी माना जाता है, जब वह लेखक इसके एवज में मंच की चाह पैदा कर लेता है। अगर एक बार मंच मिल जाए,तो वह मंच पर बैठे या मंच के पीछे अथवा मंच के आगे दर्शक दीर्घा में,उसे बड़ी आत्मसंतुष्टि मिलती है। जब मंच से उसका नाम पुकारा जाता है,वह `सावन के अंधे` के समान हो जाता है,उसकी बांछें खिल जाती हैl उसे प्रधानमंत्री होने के अहसास में ५६ इंची सीना लगने लगता,मैक्स अस्‍पताल के फिर से जिन्दा को लाश बनाने का कारोबार मिलने की अनुभूति होने लगती है। फिर घोषणा होती है-
झम्मन अपनी सड़ी-गली कविताएं प्रस्तुत करेंगे। आप चाहें या न चाहें,आपको ताली जरूर बजाना है। इनका इस कार्यक्रम के संयोजन में जबरदस्त आर्थिक योगदान रहा है। जब एक बार मंच मिल जाता है,तो हर मंच की चाह में आदमी भटकता है। उसकी कविताएं प्रेयसी से शुरू होकर सरकार पर समाप्त हो जाती हैं। अंत में उसे जीवन का सार नजर आता है। प्रेयसी,सरकार जैसी निकम्मी होती है। जहां उसे शादी रूपी पुरस्कार का प्रस्ताव आया नहीं,कि वह विपक्ष की तरह बहिर्गमन कर जाती है। बात कुछ भी हो,उसे तो बहिर्गमन करना ही था। 
  एक और अन्य प्रकार के साहित्यकार इस समय पैदा हो रहे हैं-वे हैं `चातक साहित्यकार`। दूसरे शब्दों में `याचक साहित्यकार`। जो याचना करते हैं कि,उसे कोई अच्छा पुरस्कार हत्थे चढ़ जाए। जिनको पुरस्कार मिलते हैं,उन्हें बड़े ही दीन-हीन भाव से ये चातक साहित्यकार देखते हैं। सोचते हैं इस साले टुच्चे को कैसे पुरस्कार मिला,हम मर गए थे क्या? अंतरआत्मा की आवाज आती है-तुम मर नहीं गए थे, तुम्हारी उस जैसी पहुंच (जरिया-सिफारिश)नहीं थी। जैसे ही पुरस्कारों की घोषणा होनी होती है,ये साहित्यकार पुरस्कार प्रदाता मंडलों के चक्कर लगाने लगते हैं। अगर खुदा-न-खास्ता राशि भारी-भरकम है,तो फिर नेताओं के चक्कर भी लगा लेते हैं,वैसे ही जैसे शाम को एक पैग। 
साहित्य सृजन का औचित्य परिवर्तन की दिशा में एक बड़ा कदम है,कि जितना बड़ा साहित्यकार,उतना बड़ा पुरस्कार। न जाने कितने ऐसे साहित्यकार दबकर खप जाते हैं,जो गांवों की मेड़ों पर बैठकर लिखते हैं। उनकी कोयल भी गाती है,शहर वाले कौए से अच्छा गाती है,लेकिन शहर वाले कौए की पहुंच विधायक तक होती है और गांव वाली कोयल को सरपंच पहचानता है,लेकिन सरपंच को गीत नहीं,चाटुकारिता पसंद है। 
साहित्यकार अब दुख-वेदना-विरह-खुशी के लिए नहीं लिखता,वह केवल पुरस्कार के लिए लिखता है। `स्वांत सुखाय` के लिए लिखना तुलसी के साथ ही चला गया। साहित्य दर्शन पतुरिया दर्शन जैसा हो गया। ऊपर से चकाचौंध और भीतर वही बचा-खुचा रईसों का छोड़ा मांस का लोथड़ा…। साहित्यकार का मूल्यांकन रचना से नहीं,उसके पुरस्कार से होता है। 
साहित्य पुरस्कार की घोषणा हो चुकी है,कई चातक साहित्यकार आत्महत्या की कगार पर खड़े हैं। अभी भी आशा की किरण बाकी है,कुछ छोटे साहित्य के पुरस्कार आने बाकी हैं। फिर उसके बाद चातक साहित्यकारों का रुदन शुरू हो जाएगा-हर कमीने को पुरस्कार मिल जाता है और मेरे जैसे अनूठे-अजूबे-विरल-अज्ञात साहित्यकार को कोई पुरस्कार के लिए नहीं चुनता है। आप ऐसे साहित्यकारों को चातक साहित्यकार भी कह सकते हैं,जो ऊंट की तरह ऊपर मुंह उठाए पुरस्कार को इस आशा से घूरते रहते हैं कि,कभी तो पुरस्कार की बारिश होगी और चातक के कंठ में भी दो- चार बूंदें अवश्य गिरेंगी..ओम श्री पुरस्काराय नम:..l
                                  #सुनील जैन ‘राही'
परिचय : सुनील जैन `राही` का जन्म स्थान पाढ़म (जिला-मैनपुरी,फिरोजाबाद ) है| आप हिन्दी,मराठी,गुजराती (कार्यसाधक ज्ञान) भाषा जानते हैंl आपने बी.कामॅ. की शिक्षा मध्यप्रदेश के खरगोन से तथा एम.ए.(हिन्दी)मुंबई विश्वविद्यालय) से करने के साथ ही बीटीसी भी किया हैl  पालम गांव(नई दिल्ली) निवासी श्री जैन के प्रकाशन देखें तो,व्यंग्य संग्रह-झम्मन सरकार,व्यंग्य चालीसा सहित सम्पादन भी आपके नाम हैl कुछ रचनाएं अभी प्रकाशन में हैं तो कई दैनिक समाचार पत्रों में आपकी लेखनी का प्रकाशन होने के साथ ही आकाशवाणी(मुंबई-दिल्ली)से कविताओं का सीधा और दूरदर्शन से भी कविताओं का प्रसारण हुआ हैl आपने बाबा साहेब आंबेडकर के मराठी भाषणों का हिन्दी अनुवाद भी किया हैl मराठी के दो धारावाहिकों सहित 12 आलेखों का अनुवाद भी कर चुके हैंl रेडियो सहित विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में 45 से अधिक पुस्तकों की समीक्षाएं प्रसारित-प्रकाशित हो चुकी हैं। आप मुंबई विश्वद्यालय में नामी रचनाओं पर पर्चा पठन भी कर चुके हैंl कई अखबार में नियमित व्यंग्य लेखन जारी हैl

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