सपने पापा के

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pradeepmani
भाग-३………….
पत्नी की मृत्यु के बाद राकेश उस सदमे से बाहर नहीं आ पा रहा था। उसे लग रहा था कि उसकी जिंदगी भी अब खत्म हो गई है, परंतु छोटी-सी बच्ची का चेहरा देखकर वह अपने-आपको जीवित रखने का प्रयास कर रहा था।
आज वो उस दोराहे पर खड़ा था,जहां शरीर तो जीवित था परंतु आत्मा घुट-घुटकर मर रही थी।
राकेश के मन में  उठ रहे सवाल उसे झकझोर रहे थे कि,वह उस बच्ची का पालन कैसे करेगा!
अचानक उस नन्हीं-सी बच्ची की रोने की आवाज आने लगी। आवाज सुनते ही राकेश ने दौड़कर उस बच्ची को अपनी गोद में उठा लिया और उसे चुप कराने का प्रयास करने लगा।
वह उस बच्ची को चुप कराने के लिए कभी अपना मुंह बनाता,कभी अपने मुंह को टेढ़ा करता,तो कभी झुनझुना बजाता परन्तु वह नन्हीं-सी जान चुप नहीं हो रही थी। शायद उसे भूख लगी थी और राकेश यह नहीं जान पा रहा था। आखिरकार उस बच्ची को लेकर राकेश पास में रहने वाली बूढ़ी औरत के पास गया। उस औरत क़ो सब बात बताई तो औरत ने तुरंत घर में से दूध लाकर उस बच्ची को पिलाया। तब वह बच्ची कुछ देर में सो  गई।
उसके सोते ही रमेश बूढ़ी औरत के सामने रोने लगा कि मैं अपनी नन्हीं-सी जान को कैसे पालूं,मैं जब यह भी नहीं समझ पा रहा हूँ कि,उसे भूख लगी है या नहीं।
उसका इस तरह रोना देखकर बूढ़ी औरत ने कहा-तुम रो क्यों रहे हो,मेरी सलाह मानो तो तुम दूसरी शादी कर लो। शादी करने से उस बच्ची को माँ मिल जाएगी और तुम्हारी देखभाल करने को पत्नी.. और यदि घर में औरत हो तो लक्ष्मी होती है। इतना सुनते ही राकेश ने कहा-‘कि आपको पता ही है कि सौतेली माँ बच्चों के साथ किस तरह का व्यवहार करती है
जबकि मेरी बच्ची तो विकलांग भी है।  एक विकलांग बच्ची को कौन माँ का प्यार देगा,ज़माना बदल गया है। मैं नहीं चाहता कि,मेरी बच्ची से कोई सौतेला व्यवहार करे। यह मेरे प्यार और मेरी पत्नी की निशानी है।
बूढ़ी औरत ने कहा-‘ मेरी नजर में एक लड़की है जो मेरे दूर के रिश्तेदार की लड़की है। बहुत ही गुणवान है,साथ में उसने अच्छी पढ़ाई भी की है,पर दहेज़ न दे पाने के कारण उसकी शादी नहीं हो पा रही है।
राकेश ने कहा-मुझे विश्वास नहीं है।
इतना कहकर राकेश बच्ची को लेकर घर चला आया।
अब राकेश अपने सब काम छोड़ के बच्ची को पालने में लग गया और यही उसकी दिनचर्या बन गई,परंतु राकेश की परेशानियां धीरे धीरे बढ़ने लगी। समय बीतते-बीतते 3 महीने बीत गए और राकेश के पास जमा पूंजी ख़त्म हो गई।
अब नौकरी पर जाना राकेश की मज़बूरी हो गई,मगर नौकरी पर राकेश उस बच्ची को छोड़कर कैसे जा सकता है!
एक बार फिर उसे चिंता होने लगी अब उसे दूसरी शादी के सिवा कोई और रास्ता नहीं दिख रहा था।
आखिरकार मजबूर होकर राकेश उस बूढ़ी औरत के पास गया और बोला- अपनी बच्ची के लिए वह दूसरी शादी करने क़ो तैयार है,परंतु उस लड़की से एक बार मिलना चाहता हूँ।
बूढ़ी औरत ने कहा-बेटा मैं बात करुँगी।अब तू जा घर जाकर सो जा।
अगली सुबह वह बूढ़ी औरत राकेश के घर आई और बोली-बेटा,परसों उनके गांव से १० किलोमीटर दूर एक दुर्गा मन्दिर है,वहीं मिलने जाना है। राकेश ने कहा-ठीक है। राकेश ने बूढ़ी औरत से कहा-दादी,आप भी मेरे साथ चलिएगा।
बूढ़ी औरत ने कहा-ठीक है।
और फिर वो दिन अ गया,जिस दिन राकेश को लड़की देखने जाना था। राकेश उस बूढ़ी औरत के साथ अपने निजी साधन से उस मंदिर पहुँच गया जहां लड़की वाले पहले से इन्तजार कर रहा रहे थे।
राकेश के पहुँचते ही नाश्ते की व्यवस्था की गई और फिर बात आगे बढ़ी। कुछ देर बाद बूढ़ी औरत ने कहा कि,अब इन दोनों को अकेला छोड़ दो। अतः सभी उन दोनों को अकेला छोड़कर घूमने लगे।
     इधर राकेश और वह लड़की आधे घंटे तक कुछ भी नहीं बोले। फिर अचानक राकेश रोने लगा और उस लड़की के सामने हाथ जोड़ते हुए कहा- मैं बस इतना चाहता हूँ कि,आप उस बच्ची को माँ का प्यार देना और कुछ नहीं। इतना सुनते ही लड़की ने अपने रुमाल से उसके आँसू पोंछते हुए कहा-आप चिंता न करें,मैं उसे सगी माँ जैसा प्यार दूंगी।
इतना कहते ही राकेश की खुशी का  कोई ठिकाना नहीं रहा। आखिरकर दोनों ने एक-दूसरे को पसन्द कर किया और अगले महीने की शादी तय हो गई। अतः घर आकर राकेश ने उस बूढ़ी औरत को धन्यवाद बोला।
अब वह शादी की तैयारी में लग गया और आखिरकर वो दिन आ गया जिस दिन राकेश के चेहरे पर पुनः सेहरा बंधने  वाला था।
शाम होते होते बारात लड़की के घर पहुँची। लड़की वालों ने बड़ी धूमधाम से उनका स्वागत किया और फिर धीरे-धीरे शादी की रस्में भी पूरी हो गई और राकेश बंध गया शादी की डोर से। फिर विदाई कराकर राकेश लड़की को लेकर घर  पहुँचा। (क्रमशः …शीघ्र ही)

                                                                                               #प्रदीपमणि तिवारी ‘ध्रुवभोपाली’
परिचय: भोपाल निवासी प्रदीपमणि तिवारी लेखन क्षेत्र में ‘ध्रुवभोपाली’ के नाम से पहचाने जाते हैं। वैसे आप मूल निवासी-चुरहट(जिला सीधी,म.प्र.) के हैं,पर वर्तमान में कोलार सिंचाई कालोनी,लिंक रोड क्र.3 पर बसे हुए हैं।आपकी शिक्षा कला स्नातक है तथा आजीविका के तौर पर मध्यप्रदेश राज्य मंत्रालय(सचिवालय) में कार्यरत हैं। गद्य व पद्य में समान अधिकार से लेखन दक्षता है तो अनेक पत्र-पत्रिकाओं में समय-समय पर प्रकाशित होते हैं। साथ ही आकाशवाणी/दूरदर्शन के अनुबंधित कलाकार हैं,तथा रचनाओं का नियमित प्रसारण होता है। अब तक चार पुस्तकें जयपुर से प्रकाशित(आदिवासी सभ्यता पर एक,बाल साहित्य/(अध्ययन व परीक्षा पर तीन) हो गई है।  यात्रा एवं सम्मान देखें तो,अनेक साहित्यिक यात्रा देश भर में की हैं।विभिन्न अंतरराज्यीय संस्थाओं ने आपको सम्मानित किया है। इसके अतिरिक्त इंडो नेपाल साहित्यकार सम्मेलन खटीमा में भागीदारी,दसवें विश्व हिन्दी सम्मेलन में भी भागीदारी की है। आप मध्यप्रदेश में कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं।साहित्य-कला के लिए अनेक संस्थाओं द्वारा अभिनंदन किया गया है।
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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।