महिला सुरक्षा से जुड़ा है रक्षाबंधन  का त्योहार

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भाई-बहन के पवित्र  प्रेम का प्रतीक पर्व रक्षाबंधन महिला सुरक्षा का प्रतीक है। मध्य युग में महिलाओं पर अत्याचार बहुत  होते थे,तब अपनी सुरक्षा  के लिए महिलाओं द्वारा भाई की कलाई  पर राखी बांधकर सुरक्षा का वचन ले लिया जाता था। इसका भाई-बहन के सगे होने-न होने से भी कोई  संबंध नहीं है। इस पर्व की शुरूआत ही उन बहनों ने की थी,जो अपने भाई की सगी नहीं, मुंहबोली बहनें थी। इतिहास के पन्नों पर रक्षाबंधन की शुरूआत को लेकर जितनी भी कहानियाँ दर्ज हैं,उनमें से एक भी सगे भाई-बहन की कहानी नहीं है। रानी कर्णावती-हुमायूं प्रसंग हो,या श्रीकृष्ण-द्रोपदी,अथवा राजा पुरू द्वारा अलेक्जेण्डर की पत्नी से राखी बंधवाना हो,या वामनावतार के बाद भक्ति बल से राजा बलि द्वारा भगवान विष्णु को बंधक बना लिए जाने पर विष्णु पत्नी लक्ष्मी द्वारा बलि को भाई बनाकर पति विष्णु को मुक्त कराने का प्रसंग,इन सभी में भाई की कलाई पर राखी बाँधने वाली बहनें सगी नहीं,मुंहबोली थी। इसका मतलब साफ है कि,रक्षाबंधन का त्योहार रक्त संबंध से कहीं अधिक सुरक्षा बंधन का पर्व है। बहन ने पवित्र मन से जिस किसी की कलाई पर रक्षा सूत्र बांध दिया,उस दिन से वह आजीवन उसका भाई अर्थात् अपनी बहन की रक्षा-सुरक्षा के प्रति कृत संकल्पित हो गया। परम्परागत रूप भी देखा जाए तो,जिस- जिससे हमें सुरक्षा के आसरे की उम्मीद होती है,उसे राखी बांधी जाती है।भगवान,पिता,जीजा,मामा,माता,बहन,
भाभी आदि सहित मुंहबोले भाई और बहन को राखी बांधने की परम्परा यही दर्शाती है कि,रक्षाबंधन को व्यापक रूप में लिया जाना चाहिए। जेल में बन्द कैदियों, अपंग आश्रम, निराश्रित तथा दिव्यांग गृहों में समाजसेवी बहनों द्वारा रक्षाबंधन मनाए जाने से भी यही सन्देश निकलकर आता है। सीमा पर देश की सुरक्षा के लिए डटे रहने वाले फौजी भाइयों के लिए भी इसी निमित्त राखी भेजी जाती है। कुल मिलाकर घर-घर में मनने वाला रक्षाबंधन पर्व उसी मूल उद्देश्य का सूक्ष्म प्रगटीकरण है,जो इस पर्व को महिला सुरक्षा से जोड़ता है। वैसे भी आज महानगरों में महिलाओं की सुरक्षा को लेकर उठती चिन्ताओं के मद्देनजर इस पर्व को महिला सुरक्षा दिवस के रूप में मनाना कहीं अधिक प्रासंगिक है,क्योंकि मध्य युग की तरह आज फिर महिलाएँ स्वयं को असुरक्षित महसूस कर रही हैं। जब-जब महिलाओं की सुरक्षा को लेकर सवाल खड़े होंगे,तब-तब रक्षाबंधन की प्रासंगिकता और अधिक बढ़ना स्वाभाविक ही है। चूँकि,महिला उत्पीड़न की घटनाएँ हर दिन हर शहर में हो रही है,इसलिए किसी एक स्थान पर नहीं,हर जगह-हर दिन रक्षाबंधन मनाए जाने की आवश्यकता है।

                                                              #डॉ. देवेन्द्र  जोशी

परिचय : डाॅ.देवेन्द्र जोशी गत 38 वर्षों से हिन्दी पत्रकार के साथ ही कविता, लेख,व्यंग्य और रिपोर्ताज आदि लिखने में सक्रिय हैं। कुछ पुस्तकें भी प्रकाशित हुई है। लोकप्रिय हिन्दी लेखन इनका प्रिय शौक है। आप उज्जैन(मध्यप्रदेश ) में रहते हैं।

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।