है कोई नीलकंठ! जो दे स्त्री को सम्मान

1
vijaylakshmi
आखिर भारतीय सेना में महिलाओं को युद्ध में कंधे से कंधा मिलाकर लड़ने की अनुमति मिल गई,ये खबर जब पढ़ी तो उन महिलाओं का जीवन और संघर्ष याद आ गया, जो अपनी चुनी राह पर चलने के लिए आज भी अपने घर परिवार और समाज से संघर्ष कर रही है। इतना ही नहीं,हजारों- हजार कुर्बानियां दे रही हैं।
क्या इतना आसान रहा होगा उनका सफर ?बड़ा कठिन है स्त्री होना, क्योंकि स्त्री के साथ जुड़ी अवधारणाएं आधुनिकीकरण के बावजूद नहीं बदली हैं।आज भी लोग कहते दिखते हैं कि,’औरत की अक्ल घुटनों में होती है’ या ‘औरत में ही बुद्धि हो तो बरात में न ले जाए।’
पर ये तो सिद्ध है कि,इन परिस्तिथियों में खुद को साबित करने के लिए महिलाओं का संघर्ष बढ़ता ही जा रहा है।
खैर कुछ हद तक लोग इन जुमलों को कहने से डरने तो लगे हैं,मगर ये डर सिर्फ कानून का है।विचारों में परिवर्तन की दरकार आज भी है।
तब प्रश्न आज भी वही है कि क्यों हर युग में कसौटियां स्त्री के लिए ही रही हैं?
आज हर क्षेत्र में खुद को कहीं आगे बढ़कर साबित करने के बावजूद घर और समाज में यह आधी आबादी अपने लिए न जगह बना पाई,न ही इस सोच को बदल पाई है।
   राष्ट्रीय,अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर बेबाकी से बोलने वाली वही स्त्री घर में ‘सब्जी क्या बनानी है?’ जैसे छोटे प्रश्नों पर अपनी राय नहीं रख पाती है।
   देश-दुनिया में अपनी पहचान बनाने वाली ‘सुपर वुमन’ घर में छोटे- छोटे आर्थिक निर्णय और अधिकारों में हाशिए पर रख दी जाती है।
   कटु सत्य है मगर,यह  विडम्बना तो और भी दर्दनाक है कि,पुरुष प्रधान समाज में महिला घर में आर्थिक सहायता करें। ये वर्तमान की आवश्यकताओं के चलते स्वीकार कर लिया गया और शिक्षा,नौकरी जैसी आजादी महिलाओं को मिल गई ,मग़र उसके लिए वर्जनाएं और सीमाएं भी निर्धारित कर दी गई। आजादी की सीमा केवल वहीं तक,जहां तक घर परिवार में दिक्कत न हो। अगर नौकरी में स्वयं की उन्नति या प्रतिभा निखार के अवसर मिले तो,उन्हें इसलिए छोड़ना पड़ता है कि पहली प्राथमिकता परिवार तथा बच्चे हैं। यहां उसका संघर्ष और बढ़ जाता है,जिसे सब उसका चुना हुआ मान लेते हैं।
समाज के दोहरे दांत यहां भी दिखते हैं। आज भी कई तथाकथित पढ़े-लिखे समझदार लोग ये कहते हुए सुने जाते हैं कि,औरत की कमाई से घर नहीं चलता है। अगर कोई पुरुष उसे घर  के कामों में मदद करे तो उसे जोरू का गुलाम कह कर उसके हौंसले तोड़ने की कोशिश की जाती है,और तो और लोग तो यहाँ तक कहते हैं कि ‘ढोर ग्वार शुद्र पशु नारी,ये सब ताड़न के अधिकारी’ । ये सब रुढ़िवादी विचार धारणाएं बदली नहीं है, बस लोग अब कानून के डर से खुले आम नहीं बोलते हैं।
इसमें कोई संदेह नहीं कि, आज आधी आबादी को जो आजादी मिली है वो भी उनके व्यक्तित्व विकास के लिए नहीं, सिर्फ आर्थिक सहायता मिले घर में,इस उद्देश्य से है।
हम अगर इतिहास में देखें तो एक बात देखने को मिलती है कि ‘हर सफल पुरुष के पीछे कोई महिला होती है’, मग़र किसी सफल महिला के साथ कोई पुरुष कब होगा ?
ऐसी बहुत-सी महिलाएं हैं,जो सिर्फ अपनी प्रतिभाओं को बंद बक्से में मूंद देती हैं,ताकि उनके पति,बच्चे अपना नाम और पहचान बना सकें।जिम्मेदारियां पूरी करते- करते अपना चेहरा संवारना भूल जाती है।आखिर हम कब तक उनसे ये कुर्बानियां लेते रहेंगे ?
ये प्रश्न हमें क्यों नहीं  झकझोरता कि,अपने अस्तित्व को खोकर कोई स्त्री समाज का अस्तित्व कैसे बना पाएगी ?और अपने चेहरे को अंधकार में रखकर वो कैसे परिवार का चेहरा चमकाएगी ?
कानून से मिली स्वतंत्रता के कोई मायने नहीं,अगर उसे घर-परिवार का साथ न मिले।
घर-बाहर दोनों जगह संतुलन बनाना आज उसका संघर्ष बन गया है। उस पर सब कुछ आदर्श रहने की उम्मीद ही कहर बरपा रही है।
आधुनिक कपड़े पहनने,घर से बाहर जाकर शिक्षा पाने और नौकरी करने जैसी आज़ादी तब तक अधूरी है,जब तक महिलाओं को स्वयं के व्यक्तित्व एवं  अस्तित्व के निखार के लिए निष्पक्ष अवसर न मिलें,उनको निर्णय का अधिकार न मिले उनको प्रतिभाओं और योग्यताओं को पहचान दिलाने में घर-परिवार और समाज का सकारात्मक सहयोग न मिले। यकीनन तब तक सब स्वतंत्रताएं बेकार हैं।
दो पाटों के बीच क्या कोई पुरूष किला बन कर उसे सहेज पाएगा ?
है कोई नीलकंठ,जो स्त्री के संघर्ष को अपना सके,सम्मान दे सके,उसे कह सके-‘तुम आगे बढ़ो, मैं तुम्हारे साथ हूँ हर कदम।’

                                                                        #विजयलक्ष्मी जांगिड़

परिचय : विजयलक्ष्मी जांगिड़  जयपुर(राजस्थान)में रहती हैं और पेशे से हिन्दी भाषा की शिक्षिका हैं। कैनवास पर बिखरे रंग आपकी प्रकाशित पुस्तक है। राजस्थान के अनेक समाचार पत्रों में आपके आलेख प्रकाशित होते रहते हैं। गत ४ वर्ष से आपकी कहानियां भी प्रकाशित हो रही है। एक प्रकाशन की दो पुस्तकों में ४ कविताओं को सचित्र स्थान मिलना आपकी उपलब्धि है। आपकी यही अभिलाषा है कि,लेखनी से हिन्दी को और बढ़ावा मिले।

matruadmin

One thought on “है कोई नीलकंठ! जो दे स्त्री को सम्मान”

  1. पग पग पर यहाँ नीलकण्ठ हैं, करते नारी का सम्मान,
    कुछ दुष्टों के कारण मत करो, सब पुरूषों का अपमान।
    अ कीर्तिवर्धन8265821800

Comments are closed.

Next Post

इंसानियत का दीया

Fri Jun 16 , 2017
क्या तेरी फितरत में जलना और जलाना है, क्या तेरे दिल में आग में जलना और आग लगाना है। क्या तेरे उसूलों में नफरत रखना औऱ नफरत करना है तू क्यों इंसान होकर शैतान बनकर बैठा है। क्या तेरा दिल पत्थर-सा है, ऐसा लगता नहीं कहीं किसी कौने में जरूर […]

संस्थापक एवं सम्पादक

डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’

मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष, ख़बर हलचल न्यूज़, मातृभाषा डॉट कॉम व साहित्यग्राम समाचार पत्र के संपादक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मध्य प्रदेश ही नहीं अपितु देशभर में हिन्दी भाषा के प्रचार, प्रसार और विस्तार के लिए निरंतर कार्यरत हैं। लगभग दो दशकों से हिन्दी पत्रकारिता में सक्रिय डॉ. जैन के नेतृत्व में पत्रकारिता के उन्नयन के लिए भी कई अभियान चलाए गए। आप 29 अप्रैल को जन्मे तथा कम्प्यूटर साइंस विषय से बैचलर ऑफ़ इंजीनियरिंग (बीई-कम्प्यूटर साइंस) में स्नातक होने के साथ आपने एमबीए किया तथा एम.जे. एम सी की पढ़ाई भी की। उसके बाद ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियाँ’ विषय पर अपना शोध कार्य करके पीएच.डी की उपाधि प्राप्त की। डॉ. अर्पण ने 35 लाख से अधिक लोगों के हस्ताक्षर हिन्दी में परिवर्तित करवाए, जिसके कारण आपको विश्व कीर्तिमान प्रदान किया गया। अब तक आप 15 पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं। इसके अलावा साहित्य अकादमी, मध्य प्रदेश शासन द्वारा वर्ष 2020 के अखिल भारतीय नारद मुनि पुरस्कार से पुरस्कृत हुए हैं। साथ ही, आपको वर्ष 2023 में जम्मू कश्मीर साहित्य एवं कला अकादमी व वादीज़ हिन्दी शिक्षा समिति ने अक्षर सम्मान, वर्ष 2024 में प्रभासाक्षी द्वारा हिन्दी सेवा सम्मान, वर्ष 2025 में लघुकथा शोध केन्द्र भोपाल द्वारा विशिष्ट हिंदी सेवा सम्मान तथा वर्ष 2026 में वर्ल्ड रिकॉर्ड ऑफ़ एक्सीलेंस, इंग्लैंड द्वारा सम्मानित किया गया है। इसके अलावा आप सॉफ़्टवेयर कम्पनी सेन्स टेक्नोलॉजीस के सीईओ हैं, साथ ही, लगातार समाज सेवा कार्यों में भी सक्रिय सहभागिता रखते हैं। कई दैनिक, साप्ताहिक समाचार पत्रों व न्यूज़ चैनल में आपने सेवाएँ दी हैं। भारतभर में आपने हज़ारों पत्रकारों को संगठित कर पत्रकार सुरक्षा कानून की माँग को लेकर आंदोलन भी चलाया है। वर्तमान में आप देशभर में हिन्दी आन्दोलन का नेतृत्व करने के कारण हिन्दी योद्धा के रूप में पहचाने जाते हैं।