मैं शब्द नहीं भाव गढ़ती हूँ- सुषमा व्यास राजनिधि

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● भावना शर्मा, दिल्ली

कविता मानव मन के मनोभावों को शब्दों के मोतियों के रूप में गढ़ने का कार्य है और उन कविताओं का पुस्तकबद्ध हो जाना यानी कि सैंकड़ो मोतियों को एक माला में गूँथकर सुंदर गलकंठिका बनाने जैसा कार्य है।
निश्चित तौर पर जैसे यह गलकंठिका रूपसी के यौवन को शृंगारित करती है, वैसे ही कविता पाठक मन को।

इन्दौर में रहने वाली लेखिका सुषमा व्यास ‘राजनिधि’ का पहला काव्य संग्रह ‘इक दीया देहरी पर’ मानव मन की अचित्त अवधारणाओं को समाहित करते हुए सरल शब्दों में सहजानुभूति प्रदान करने वाली पुस्तक है। आज मातृभाषा. कॉम की ख़ास प्रस्तुति में हम बात करेंगे सुषमा व्यास राजनिधि जी से।
लेखिका ने पुस्तक में ‘इश्क़’, समाज, त्यौहार इत्यादि विभिन्न विषयों पर परिपक्व क़लम चलाई है।

1.लेखन की प्रेरणा आपको कहाँ से मिलती है?

उत्तर 1—
साहित्य मुझे विरासत में मिला है, यूं समझिए कि घुट्टी की तरह साहित्य मुझे पिलाया गया है।
परिवार में बड़े बुज़ुर्गों से कहानी, कविता सुनती हुई बड़ी हुई| बचपन से ही हमारे घर में साहित्यिक माहौल था| मेरी माता जी भी बहुत अच्छे कवयित्री थीं| साहित्य लेखन तो मां सरस्वती का वरदान है और वह मुझे भी मिल गया| महादेवी वर्मा की कहानी ’सोना हिरणी’ और कविता ’नीर भरी दुख की बदली’ तथा शिवानी के उपन्यास ’कृष्ण कली’ ने हृदय को ऐसा छुआ कि मैं भी क़लम थाम बैठी।

2. कविताओं के अलावा साहित्य की और किस विधा में आपकी क़लम यात्रा करती है?

उत्तर 2—-
कविताओं के अलावा मैं लगभग सभी विधाओं में लिखती हूं। मैं शब्द नहीं भाव, भाव गढ़ती हूं और वह भाव मुझे जिस विधा में रुचिकर लगते हैं, मेरी क़लम भी उसी राह चल पड़ती है। मैं कहानी, लघु कथा, व्यंग्य, आलेख, आध्यात्मिक आलेख सभी पर समान रूप से लेखन करती हूं।

3. चूँकि आप कवयित्री हैं, अतः लेखन से जुड़े किसी यादगार वाकये की किस्सागोई साझा करें

उत्तर 3—
यादगार वाकये तो बहुत से हैं, परंतु सर्वप्रथम जब मुझे दिल्ली से मुक्तांगन संस्था से कविता पाठ का आमंत्रण आया तो मैं बेहद प्रसन्न हुई। कविता कोश द्वारा आयोजित कार्यक्रम में मुझे कविता पाठ का अवसर मिला। वहाँ पर अनेक सुप्रसिद्ध साहित्यकारों से परिचय हुआ और सुनने का मौका मिला तथा सबसे ख़ूबसूरत यादगार पल मेरे जीवन का वह रहा, जब मेरे प्रथम दो संग्रह का विमोचन हुआ, जो मेरे लिए सबसे अनमोल पल था। विमोचन के अवसर पर ऐसा प्रतीत हो रहा था, जैसे मेरा जीवन सार्थक और उद्देश्यपूर्ण हो गया हो।

4. ‘इक दीया देहरी पर’ क्यों लिखी? कोई विशेष कारण!

उत्तर 4 —-
इक दिया देहरी पर’ मेरा प्रथम काव्य संग्रह है। साहित्य हमारे समाज में ही समाहित है।ब्रह्मा जी के वेदों से कविता की धारा प्रवाहित हुई, अतः कविता की रचना बेहद पवित्र विधा है।
इक दिया देहरी पर’ काव्य रचना का मेरा उद्देश्य समाज में संदेशपरक साहित्य देना था तथा युवा और नारी शक्ति को जागृत करना था। साहित्य समाज का ही दर्पण है और लेखक वह कारीगर है, जो दर्पण में सही अक्स दिखाता है, अतः नारी शक्ति, जीवन दर्शन और प्रेम दर्शन पर कविताएँ रच कर समाज को सही दिशा दिखाना मैं अपना कर्त्तव्य समझती हूं, बस, इसी उद्देश्य से मैंने ’इक दीया देहरी पर’ की रचना की।

5. इक दीया देहरी पर’ के अलावा आपकी अन्य प्रकाशित रचनाओं के बारे में बताएँ।

उत्तर 5 —-
‘इक दिया देहरी’ पर के अलावा मेरी लघु कथा ’कृष्ण की सीख’ और ’गलता एसिड’ बेहद प्रसिद्ध हुई। साथ ही, व्यंग्य में भी ’व्यंग्यकार का जन्म’, ’मक्खन मीट’ और ’बॉडी का आंदोलन’ यह बेहद पसंद किए गए।
कहानी में थर्ड जेंडर पर लिखी हुई कहानी, ’तीसरे कदमों की आहट’ और अंगदान पर ‘दिव्य अमृत कलश’ कहानियाँ पसंद की गईं, ये सारी रचनाएँ पत्र-पत्रिकाओं और साझा संग्रह में प्रकाशित हो चुकी हैं।

6. आपके लेखन के मूल में समाज है, आपके अनुसार समाज को कैसे बदला जा सकता है?

उत्तर 6 —-
रचनाकार जब बेहतरीन रचना का निर्माण करता है और समाज के हित में लेखन करता है तो निश्चित ही समाज उससे प्रभावित होता है| समसामयिक विषय, विसंगतियों पर प्रहार, असामाजिक तत्व हटाना तथा सामाजिक परिवर्तन से तालमेल करके ऐसे साहित्य का निर्माण किया जाए, जो पाठक के हृदय और मानस को अच्छे विचारों और स्वस्थ सोच से ओतप्रोत करके समाज को बदला जा सके।साहित्य में बहुत शक्ति होती है। क़लम में बहुत ताक़त होती है। वह समाज को बदलने की क्षमता रखती है।

7. साहित्य को आप अपने तरीके से कैसे परिभाषित करती हैं?

उत्तर 7 —–
ब्रह्मांड में 25 मूल तत्व है और पांच प्रमुख तत्व हैं। इन सभी तत्वों से अंतरात्मा से तादात्म्य स्थापित करके बेहतरीन रचना का निर्माण लेखक करता है, वही तो साहित्य कहलाता है। अपने लेखन से समाज को सही दिशा दिखाना ही सच्चा साहित्य है। साहित्य कोई भारी-भरकम शब्द नहीं वरन् सरल और सहज भाव और विचार है, जो एक हृदय से होकर दूसरे के हृदय तक पहुँचकर आह्लादित और समृद्ध करता है।

8. हिंदी साहित्य का भविष्य आप कैसा देखती हैं?

उत्तर 8—-
हिंदी साहित्य समृद्ध और विस्तृत साहित्य है। हिंदी विश्व प्रसिद्ध भाषा है। अनेक देशों में बोली और पढ़ी जाती है। अब हिंदी अंतरराष्ट्रीय पहचान भी बना चुकी है। युवा वर्ग भी इसकी तरफ़ आकर्षित हो रहा है। युवा पाठक भी हैं और लेखक भी हैं, जो बेहतरीन रचनाएं रच रहे हैं। हिंदी साहित्य का भविष्य अत्यंत उज्ज्वल है| युवा वर्ग रीझ तो रहे हैं परंतु फिर भी इसकी गुणवत्ता और रुचिकर बनाने के प्रयास पूरे मन से करने होंगे, तभी हिंदी साहित्य विश्व में अग्रणी होकर विश्व पटल पर ध्रुव तारे की तरह चमकेगा।

9. लेखन के अलावा आपके शौक़ में और क्या-क्या शुमार है?

उत्तर 9 —-
सवाल रुचिकर है। कम पूछा जाता है। मैं बहुत बातूनी हूँ।
किस्सागोई करना मुझे बहुत पसंद है और तरह-तरह के व्यंजन बना कर खिलाना भी मुझे बहुत पसंद है। यात्रा करना, तरह-तरह के लोगों से मिलना भी बहुत पसंद है। ऐतिहासिक स्थल पर कहानी और कविता की कल्पना करना मन को बहुत भाता है और मुझे मेरी ही दुनिया का निर्माण करवा देता है।

10. कुछ ख़ास बातें अपनी पुस्तक ’इक दीया देहरी पर’ के बारे में बताएँ।

उत्तर 10 —-
‘इक दिया देहरी पर’ मेरी कल्पना ही नहीं, मेरे जीवन की नई दिशा दर्शाती लेखनी है। इसमें नारी सशक्तिकरण और मेरे मन के भाव दर्शाती कविताएं हैं, जो आगे चलकर प्रेम, दर्शन और प्रेम की महत्ता बताती हैं और यही लेखनी अंत में जीवन दर्शन तक आती है। ‘इक दीया देहरी पर’ लिखने का मेरा उद्देश्य युवा पीढ़ी को हिंदी साहित्य से जोड़ने का रहा है इसीलिए मैंने बेहद सरल और सहज भाषा में कविताएं लिखी हैं, जिसमें ‘माई का पल्लू’, ‘घर से जाती बेटियाँ’, ‘निवाड कसते दाऊजी’ युवाओं द्वारा बेहद पसंद भी की गई है।

11. आपने पुस्तक प्रकाशन के लिए संस्मय प्रकाशन ही क्यों चुना?

उत्तर 11 —
संस्मय प्रकाशन मातृभाषा से जुड़ा हिंदी भाषा को समर्पित प्रकाशन है। संस्मय प्रकाशन साहित्य में व्यवसाय की दृष्टि से नहीं बल्कि हिंदी भाषा की सेवा के लिए पूर्ण रूप से समर्पित प्रकाशन है। उनका अपने लेखकों से एक आत्मीय संबंध बन जाता है और जब प्रकाशक और लेखक में आत्मिक तादात्म्य हो तो वहाँ तो उच्चस्तरीय और सुंदर संग्रह रूपी पुस्तकें पाठक को पढ़ने को मिलेंगी ही, इसीलिए मैंने संस्मय प्रकाशन को चुना। संस्मय के डॉ. अर्पण जैन, भावना शर्मा और शिखा जैन से मेरा स्नेहिल संबंध बना, जो मेरी लेखनी को भी उत्साहित कर रहा है।

12. मातृभाषा के रचनाकारों को आप क्या सन्देश देना चाहेंगी?

उत्तर–12
मातृभाषा से जुड़े सभी रचनाकारों और पाठकों को कहना चाहूंगी कि हिंदी साहित्य को विशाल आकाश की तरह विस्तारित करें। युवा रचनाकार ख़ूब लिखें, पठन और मनन करें। मातृभाषा उन्नयन संस्थान अनेक कार्यक्रम करें, गली, मुख्य चौराहों पर कार्यक्रम करें। मातृभाषा में कविता, कहानी, लेख प्रतियोगिता करें। स्कूल और कॉलेज में भी कार्यक्रम करें और हमारी हिंदी भाषा को मातृभाषा बनाने का प्रयास जारी रखें। एक न एक दिन यह मेहनत ज़रूर रंग लाएगी।

13. पाठकों के लिए कुछ ख़ास, जो आप कहना चाहें?

उत्तर 13 – संस्कृत में एक श्लोक है जिसका अर्थ है-“जीवित तो पशु–पक्षी और पेड़–पौधे भी रहते हैं परंतु मानव का जीवित रहना तभी सार्थक है, जब वह विचारपूर्वक देता है।”
जी हां, पाठकों को कहूँगी, हिंदी भाषा के साहित्य को ज़रूर पढ़ें, यह बेहद समृद्ध साहित्य है। धरती पर साहित्य का पदार्पण। ऋषि-मुनियों द्वारा आया है, अतः यह बेहद पवित्र और पूजनीय है। हिंदी साहित्य में अध्यात्म है, धर्म है, दर्शन है, अर्थ है, पवित्र विचार और सोच है, उन्नति का पथ है, संस्कार है, परंपरा है, अतः अगर इस परिवर्तनशील जीवन में प्रसन्नता और सच्चे सुख का अनुभव करना है तो हिंदी साहित्य पढ़ें और आने वाली पीढ़ी को भी पठन-पाठन लेखन का संस्कार दें।
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सुषमा व्यास राजनिधि की पुस्तक ‘इक दीया देहरी पर’ अमेज़न व फ़्लिपकार्ट पर उपलब्ध है।

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’

29 अप्रैल, 1989 को मध्य प्रदेश के सेंधवा में पिता श्री सुरेश जैन व माता श्रीमती शोभा जैन के घर अर्पण का जन्म हुआ। उनकी एक छोटी बहन नेहल हैं। अर्पण जैन मध्यप्रदेश के धार जिले की तहसील कुक्षी में पले-बढ़े। आरंभिक शिक्षा कुक्षी के वर्धमान जैन हाईस्कूल और शा. बा. उ. मा. विद्यालय कुक्षी में हासिल की, तथा इंदौर में जाकर राजीव गाँधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के अंतर्गत एसएटीएम महाविद्यालय से संगणक विज्ञान (कम्प्यूटर साइंस) में बेचलर ऑफ़ इंजीनियरिंग (बीई-कंप्यूटर साइंस) में स्नातक की पढ़ाई के साथ ही 11 जनवरी, 2010 को ‘सेन्स टेक्नोलॉजीस की शुरुआत की। अर्पण ने फ़ॉरेन ट्रेड में एमबीए किया तथा एम.जे. की पढ़ाई भी की। उसके बाद ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियाँ’ विषय पर अपना शोध कार्य करके पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। उन्होंने सॉफ़्टवेयर के व्यापार के साथ ही ख़बर हलचल वेब मीडिया की स्थापना की। वर्ष 2015 में शिखा जैन जी से उनका विवाह हुआ। वे मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं और हिन्दी ग्राम के संस्थापक भी हैं। डॉ. अर्पण जैन ने 11 लाख से अधिक लोगों के हस्ताक्षर हिन्दी में परिवर्तित करवाए, जिसके कारण वर्ल्ड बुक ऑफ़ रिकॉर्डस, लन्दन द्वारा विश्व कीर्तिमान प्रदान किया गया।