वरिष्ठ साहित्यकार का बीमार होना

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साहित्यकार रामलाल बीमार हैं, साहित्यकार बीमार होते हैं और नेता अस्वस्थ्य होते हैं । साहित्यकार, बीमारी को सुन्दर शब्दों में अस्वस्थ्य होना भले ही कह देते हों पर वे अस्वस्थ न होकर बीमार ही होते हैं । बीमार आम आदमी होता है खास आदमी तो अस्वस्थ्य ही होते है। साहित्यकार कभी खास आदमी नहीं होता वह आम आदमी की वेदना को भले ही चित्रित करता हो पर रहता आम आदमी ही है । रामलाल आम आदमी ही है । आम आदमी होने के अलावा वे साहित्यकार भी हैं । साहित्यकार आम आदमी के बीच से जन्म लेता है और बहुत प्रयत्न कर लेने के बाद बहुत सारी किताबें छपावा लेने के बाद भी वह खास आदमी नहीं बन पाता । नेतागिरी में यह सुविधा है कि आप थोड़ी सी दाढ़ी बढ़ा लो और लम्बा कुरता पायजामा पहिन लो आप नेता हो जाते हें और नेता होते ही आप खास हो जाते हैं । आम आदमी आपको कुरता पायजामा पहिने देखता है तो दूर से ही जयराम जी की करने लगता है । आम आदमी उस नवांकुर नेता में भविष्य का विधायक और फिर मंत्री देखने लगता है । नेतागिरी में ‘‘कूड़े के दिन फिरे’’ वाली कहावत कोई मायने नहीं रखती । जो एक बार कुरता-पायजामा पहिन लेता है उसके दिन फिरने तभी से प्रारंभ हो जाते हें । वह पैदल से दो पहिया वाहन से होता हुआ एक दिन चमचमाती चार पहियों वाली कार में गाॅगल लगाये घूमता नजर आने लगता है । आम आदमी 20 रू. देकर क्लीनसेव होकर, नहाधोकर साफ छकाछक कपड़े पहिन लेने के बाद भी गर्मीयों के मौसम में बिकने वाले देशी आम की तरह ही दिखाई देता है । लंगड़ा आम तक उससे अधिक दाम पर बिक जाता है पर देशी पका आम मूल्यहीन ही रहा आता है वो अचार का चक्कर है इस कारण से देशी कच्चा आम मंहगा बिक लेने में कामयाब हो जाता है वरना वह भी ‘छीः’’ की ही श्रेणी में बना रहता । कच्चा आम खट्टा होता है और खास व्यक्तियों को खटास बहुत पसंद होती है वे इतना मीठा खाने की आदत में उलझ जाते हैं कि उन्हें खट्टाई खाने के लिये उसी देशी आम के अचार पर निर्भर होना पड़ता है…..आम आदमी नेता के लिये खटाई खाने जैसी हैसियत रखता है । पांच साल भरपूर मेवा खाने के बाद उसे आम आदमी रूपी खटाई खाने को विवश होना पड़ता है ।

     साहित्यकार रामलाल बीमार हैं । वे बड़े साहित्यकार हैं । उनकी तूती बोलती है । बड़े साहित्यकार बीमार हैं तो उनसे छोटे साहित्यकारों का यह दायित्व बनता है कि वे उन्हें देखने जायें और उनका हालचाल पूछें । हालचाल पूछना भारत की सबसे खतरनाक परंपरा है । इस परंपरा के निर्वहन में बोझ बीमार के परिवार पर पड़ता है और बोझ डालने के लिये जिनको हालचाल पूछनें का प्रहसन करना होता है उन पर भी बोझ पड़ता है । दोनों के बोझ से बीमार अपने बीमार होने को ही कोसता रहता है । रामलाल बीमार है.....हालांकि उनसे ईष्र्या टाइप का स्नेह रचाने वालों के लिये यह सुखद खबर है । वे जानते हैं कि ‘‘ये निपटेगा तभी तो वो आगे आ पायेगें’’ पर ये निपट ही नहीं रहे हैं । जो अपने साहित्य से उन्हें नही निपटा सकते वे भगवान पर भरोसा रखते हैं । साहित्य हो या नेतागिरी दोनों जगह ‘‘निपटाने’’ के लिये भगवान का भरोसा ही अपेक्षित रहता है । जो नेता वर्षों से विधायक बनने के रूवप्न देख रहा होता है उसे सबसे पहिले अपने आगे खड़े नेता का निपटाने की प्रक्रिया से होकर गुजरना पड़ता है । जो स्वंष् नहीं निपटा सकता  उसे भगवन पर भरोसा कर ही लेना पड़ता है......पर बहुत दूर बैठे भगवान तक उनकी विलाप रूपी चीखें पहुंच ही नहीं पाती । इस कारण आगे वाला तो तब ही निपटता है जब उसके निपट जाने का नम्बर आता है और उससे पीछे लगा नेता निरंतर उसके निपट जाने के लिए म्ंात्र बुदबुदाता रहता है । अमूमन साहित्य में भी सही परंपरा है । साहित्य भी अब राजनीतिक षडयंत्रों का मंच बन चुका है । एक अच्छा साहित्यकार सतर्कता के साथ चलता हुआ अपनी नम्बर वन की पोजीशन पर अंगद जैसा पैर जमा लेता है और उसके पीछे लगे साहित्यकार ‘‘उनका अनुशरण कर रहे हैं’’ के मनोभावों को प्रदर्शित करता हुआ ‘‘निपट जायें’’ का मंत्रोच्चारण करता रहता है । आगे वाले की शुभकानाओं में छिपी पीड़ा में दूसरे के दर्द को गहराई से जान लेता है और अधिक सतर्क हो जाता है । देखो नम्बर एक के स्थान से बाहर कितना सुन्दर दृश्य नजर आ रहा है । वो देखों मैं हर साहित्यक कार्यक्रम के मंच पर प्रथम पंक्ति में आसीन होकर फूलमालाओं को ग्रहण करता हूं......अहा कितना अच्छा लगता है  सब । नम्बर दो वाला मंच के नीचे बैठे-बैठे कुलबुलाता रहता है । वह बड़ी हसरत भरी निगाहों से मंच को देखता है वह मंच पर अपने आपको बैठे हुए देखता है व अपने गले में फूल मालाओं को पड़े हुए देखता है । वह कितना सुन्दर दिखेगा.....वह पर यह तब ही होगा जब पहिले वाला निपटे ।

    पहिले वाला निपट नहीं रहा है भगवान उसकी पुकार को सुन नहीं रहे हैं । ऐसे आदर्श वातवरण के बीच एक दिन खबर मिलती है कि साहित्यकार रामलाल बीमार हैं । यह खबर पीछे वाले फिर उसके पीछे वाले और उसके पीछे वाले तक क्रमशः पहुंचती जाती है । सभी प्रसन्न हो जाते हैं । वे एक अच्छे साहित्यकार की तरह अपने मनोभावों को मुख पर दिखाई नहीं देने देते । हास्य पढ़ने वाला साहित्यकार कभी अपने पर हंसता नहीं है और विरह गीत पढ़ने वाली कवियत्री कभी गीत पढ़ते पढ़ते अश्रु प्रवहित नहीं करती  । जब वीर रस का कवि चिंखाड़-चिखांड कर कविता पढ़ता है तो भी वी अपने हाथ पैरों को मंच से जोर जमाये रखता है ताकि वह प्रहसन करते हुए गिर न पड़े । साहित्यकारों की यह अनुपम कलाकारी फिल्मी दुनिया से सीखी हुई नहीं होती वह तो करत करत अभ्यास की स्टाइल में स्वंय आ ही जाती है । नम्बर दो नम्बर तीन और ऐसे और बहुत सारे नम्बर वाले साहित्यकारों ने वरिष्ठ साहित्यकार रामलाल के अस्वस्थ्य हो जाने का समाचार प्रसन्नता से सुना और गंभीरता से प्रतिक्रिया दी ‘‘वो हमारे मार्गदर्शक है, ईश्वर उन्हें जल्दी ही स्वस्थ्य करे’’ । वे मन ही मन घबराये भी कि ईश्वर सच में उनकी बात न सुन ले और इन्हें स्वस्थ्य न कर दे। उन्होने सुन रखा है कि चैबीस घंटों में कोई ऐसा पल भी होता है जब आप जो प्रार्थना करते हैं वो फलीभूत हो जाती है......कहीं यह ही वह पल न हो......और भगवान प्रार्थना को सुन कर पूरी न कर दें बड़ी मुश्किल से तो वरिष्ठ साहित्यकार बीमार हुए हैं अब यह निपट ही जायें तो मेरा रास्ता खुले, वे फिर से भगवान जी से प्रार्थना करते हैं प्रभु अब ये बीमार हो ही गए हैं तो इन्हें नपटा ही दो और सीधे अपने पास बुला लो वहीं आप इनसे कवितायें सुनते रहना ।

       वरिष्ठ साहित्यकार रामलाल बीमार हैं.......वे उन्हें देखने जाना अपना कर्तत्वय समझते हैं ‘‘काय वाहे देख आये का’’ वे अपने से नीचे वाले साहित्यकार से पूछते हैं । उनके सामने रामलाल को सम्मान दिये जाने के प्रदर्शन करने का कोई मतलब नहीं है क्योंकि वे अनेकों बार रामलाल को भला बुरा कह चुके हैं साथ में ‘‘क्या पता भैया वो काला कौआ खाके आया है क्या निपट ही नहीं रहा’’ के उद्गार भी व्यक्त कर चुके हैं । ऐसे में बुरा मुंह बनाकर कहे गये शब्दों को दूसरे ने महसूस कर लिया क्योंकि बातें माबोइल पर हो रहीं थीं जिसमें वे एक दूसरे के चेहरे को देख नहीं पा रहे थे । पर साहित्यकार तो कल्पनाओं में जीता है वह गणित जैसी जबकि जमा लेता है और भर गर्मी में बरसात की फुहारों पर कविता लिख देता है । वह बसंत ऋतु आते तक मई की दुपहरिया का चित्रण कर चुका होता है । कवि कल्पनाओं में जीता है और भविष्य को गणित की ‘‘जबकि’’ में समेट लेता है । दूसरे साहित्यकार ने पहिले साहित्यकार द्वारा कहे शब्दों की जबकि जमा ली थी ‘‘अभे नहीं गये पर चल हैं.......चल हैं का, जाने ही पड़ है.....वे वरिष्ठ साहित्यकार जो ठहरे....’’ खी खी हंसने की आवाज दूसरे छोर पर बैठे साहित्यकार के कानों तक तरंगों के माध्यम से पहुंचती है तो वो भी खी खी कर अपनी आवाज तरंगों के माध्यम से ही वापिस लौटा देता है । दोनों की तंरगें मिलकर रामलाल को देखने जाने की योजना को अंतिम रूप देती हैं ।

     रामलाल को यह ज्ञात है कि वे बीमार हैं । वे सच में बीमार ही हैं । साहित्यकार जो सच है उसे स्वीकार कर लेता है पर नेतागिरी में यह सुविधा रहती है कि आप चाहें तो सच को स्वीकार न करें या असच को सच मानकर स्वीकार कर लें । नेता कई बार बीमार नहीं होता पर वह बीमार हूॅ ऐसा असच प्रसारित कर अपने शुभचिंतकों की लिस्ट को दुरूस्त कर लेता है  ‘‘ इस बार वो कमल नहीं आये काटो उनका नाम अपनी लिस्ट से अब देखते हें उसे’’ के भाव उनके माथे पर अंकित दिखाई देने लगते हैं । साहित्यकार जानता है कि उसे कोई देखने नहीं आयेगा । देशी आम के बगीचों की रखवाली चैकीदार इस चक्कर में कर लेता है कि उसे अचार का आम बचाना है अन्यथा वह यूं अपना समय नष्ट नहीं करता । आम आदमी और आम साहित्यकार समाज के लिये गैर जरूरी तबके में गिने जाते हेंै । वह बीमार हो तो कोई उसे देखने आये के मन्सूबे वह नहीं पालता । वह कराह कराह कर स्वंय का मन शांत कर लेता है । बीमारी में कराहना बहुत आवश्यक है जो कराहता है वह ही बीमार समझा जाता है । एक अच्छा बीमारू अपने कराहने की आवाज से सामने वाले को यह बता देता है कि वह कम बीमार है या कम से थोड़ा अधिक बीमार है या बहुत ही ज्यादा बीमार है । आम आदमी को इसके लिये कोई तैयारी नहीं करनी होती वह स्वविवेक से इसे आत्मसात कर लेता है । रामलाल भी कराह कर अपना समय काट रहे थे ऐसे में उसे कुछ साहित्यकार जिनमें नवोदित से लेकर नम्बर एक पर आने की चाह रखने वाले भी शामिल थे आते दिखे । वे सकपका गये । सकपकाना साहित्यकारों के लिए आवश्यक होता है । वे छोटे साहित्यकार थे तब वे जिस ढंग से सकपकाते थे कि सकपकाना भी इस अदा में मर मिटता था पर जबसे वे बड़े साहित्यकार बने हैं तब से सकपकाना छोड़ दिया है । जिसके सामने वरिष्ठ का लेवल लग जाता है वह लजाना, सकपकाना, हड़बड़ाना, खिलखिलाना जैसे शब्दों से उपर उठ जाता है । नेतागिरी में तो और भी कई विशेषण लगाये जा सकते हैं पर साहित्यगिरी में  अमूमन इतने से ही काम चल जाता है । एक अच्छा साहित्यकार अपने साहित्य में भले ही उपमा अलंकार लगाये पर अपने जीवन को इस व्याकरण से दूर रखता है । छोटे, बड़े या मझोल कोष्टकों में ही उसका जीवन प्रश्नवाचक और विस्मयबोधक चिन्हों के साथ गुजर जाता है । साहित्यकार कभी अलंकृत नहीं होता उसकी कभी उपमा नहीं दी जाती वह केवल प्रश्नवाचक और विस्मयबोधक चिन्हों में महसूस किया जाता है । जो साहित्यकार के बहुत निकट होते हैं और जो साहित्यकार से बहुत दूर होते हैं उनमें से कोई भी साहित्यकार की किसी भी पुस्तक को या रचना को पढ़ लेने का जोखिम नहीं उठाते । वे सामाजिक परंपराओं का निर्वहन करते हुए यह मान लेते हैं कि फलां व्यक्ति अब वरिष्ठ साहित्यकार हो चुका है । वह क्या लिखता है इससे किसी को काई मतलब नहीं । अक्सर साहित्यकारों के परिवार के भी यही हालात होते हैं । पती-पत्नी में इस कारण से भी अच्छे संबंध अजीवन बने रहते हैं कि पत्नी कभी उनके लिखे को नहीं पढ़ती और साहित्यकार इसलिये खुलकर लिख लेते हैं कि वे जानते हैं कि उनकी पत्नी को तो पढ़ना नहीं है सो विरह गीत लिख लो या प्रेम गीत सच्ची घटना पर आधारित लिख लो या कल्पना के आधार पर । जिस कवि ने अपने छात्र जीवन में जितनी विरह वेदना झेली हैं वह उतना ही जीवंत चित्रण करता हुआ गीत सुनाता है उसकी आंखे बंद रहती हैं जिनमें कालेज के दिनों के एक एक चित्र आते जाते हैं और उसके स्वर में दर्द झलकता दिखाई देने लगता है । लोग कहते हैं उनकी आवाज में कितना दर्द है जो वाकई होता भी है वे अपने कालेज के दिनों को कहां भूल पाते हैं तो गीत गजल में वह दर्द बयां करने लगते हैं ।

   रामलाल बीमार है । कई बार वह सोचता है कि काश वह कभी अस्वस्थ्य हो लेता । पर वह बीमार ही रहा आता है । उसके शहर के कुछ औपचारू गैंग के लोग औपचारिकता निभाने आते रहे हैं और उसका हालचाल पूछकर अदरक वाली चाय पीकर हंसते हुए औपचारिकता निभा चुके हैं ‘‘भाभी जी चाय बहुत अच्छा बनाती हैं’’ । उन्हें बीमार रामलाल की बीमारी से कोई मतलब नहीं पर भाभी जी की चाय पसंद आ गई ।  पर आज तो शहर के साहित्यकारों का समूह उनके हालचाल पूछने आया हुआ था । रामलाल ने कराहने की भीषण आवाज निकाल कर यह घोषित कर दिया कि वे वाकई बीमार हैं और कुछ ज्यादा ही बीमार हें । उनकी इस स्थिति को देखकर देखने आने वाले कुछ लोगों के मुख पर मुस्कान फैल गई, आनंद वाली मुस्कान उन्होने ईश्वर को धन्यवाद भी दिया होगा जो किसी को दिखाई नहीं दिया । कराहने के बाद उन्होने आये हुए लोगों से बातचीत शुरू की । आये हुए लोगों ने उनके स्वास्थ्य को लेकर अपनी ढेर सारी चिन्ता उड़ेली और मन ही मन ईश्वर से क्षमा मांगते हुए उनके शीघ्र स्वास्थ्य हो जाने की कामना की ‘‘अभी तो आपको हम जैसे साहित्यकारों का मार्गदर्शन वर्षंो तक करना है’’ कहते हुए अपनी भावनायें प्रकट कीं । रामलाल को अच्छा लगा ‘‘अगर आप लोगों की शुभकामनायें रहीं तो मैं शीघ्र ही स्वस्थ्य हो जाउंगा’’ कह कर अपना आभार प्रकट किया । ‘‘प्रभु ऐसा नहीं करना’’ की कुछ प्रार्थनाऐं भगवान तक पहुंची भी हुई होंगीं । एक नवोदित कवि कुछ ज्यादा ही भावुक हो गया । दरअसल नवोदितों को नम्बर एक पर अपनी पारी आती हुई नजर ही नहीं आती इस कारण वे भावुक हो जाते हैं । ये ही नवोदित जब वरिष्ठ हो जाते हैं तो उनकी भावुकता गुम हो जाती है और वे पंक्तिबद्ध होने फड़फड़ाने लगते हैं ।

‘‘अभी तो आप बिस्तर पर ही पड़े हैं इसलिये मेरी डायरी को पढ़ ही लेगें फिर आपको समय नहीं मिलता । आप मुझे मार्गदर्शन देने का कष्ट करें ।’’ कहते हुए कविताओं से लबालब भर अपनी डायरी उनके समक्ष परोस देते हैं । अपनी तबीयत का हालचाल पूछने आने के अहसान से दबे रामलाल उसे मुस्कुराते हुए ग्रहण करते हैं । नवोदित कवि एक ही सांस में दर्जनों रचनायें लिख लेने की क्षमता को अपने अंदर समेटे रहते हैं । वे कभी भी कहीं भी किसी भी विषय पर कविता लिख लेते हैं और उसे जबरन सुनाने की अपनी बालहठ को प्राप्त हो जाते हैं । अब तो वैसे वाटसप, फेसबुक बगैरह आ गये हें तो बहुत सारे लोगों को राहत मिल गई है । वे प्रतिदिन नियमित सोशल मीडिया का उपयोग करते हैं और अधिक से अधिक लाइक मिलें इसका प्रयास करते हैं, वे फोेन कर पोस्ट को लाइक कर देने का अनुरोध करते हैं, वे आपकी कैसी भी पोस्ट को लाइक कर आपसे भी उम्मीद करते हैं कि आप भी उनकी कैसी भी पोस्ट को लाइक कर दें । जो उन्हें लाइक नहीं करता वो उनकी दृष्टि में नालायक की श्रेणी में सम्मलित हो जाता है । नवोदितों का अपना संसार होता है उनका अपना गुट होता है । वे वरिष्ठों के साथ मिलकर उनकी गेंग का हिस्सा बनकर अपने आपको आगे लाने का प्रयास करते रहते हैं फिर इन्ही में से कोई एक दिन वरिष्ठता की सूची में स्थान प्राप्त कर ईष्यालु गैंग का प्रतिनिधि बन जाता हैं । रामलाल ने भी अपने पायदानों का सफर ऐसे ही तय किया था पर अब वे गंभीर हो गये थे । वरिष्ठ का गंभीर रहना आवश्यक हेै वे हंसते हुए भी गंभीर बने रहते हैं और मन ही मन कुड़बुड़ाते हुए भी गंभीर बने रहते हें । वे गंभीरता के कचरादान बन जाते हैं । रामलाल बीमार हैं और साहित्यकार अपना फर्ज अदा करते हुए उसे देखकर उसका हालचाल जानकर चाय के साथ बिस्कुट का लुत्फ उठाते हुए प्रस्थान कर जाते हैं ।

लौटते हुए कुछ साहित्यकारों के मस्तक पर भविष्य की रूपरेखा नजर आने लगती है और कुछेक के चेहरे पर गंभीर होने की संभावना की हवा निकली हुई दिखाई देती है ‘‘अभी नहीं कुछ होने वाला इसका’’ के भाव माथे पर साफ छलकते हैं । रामलाल धीरे धीरे ठीक हो जाता है और एक दिन वह फिर से मंचों की शोभा बढ़ाता पजर आता है ‘‘भगवान ने हमारी प्रार्थना नहीं सुनी’’ वे भगवान पर नाराज होते हैं और ‘‘एक न एक दिन सभी को जाना है’’ की संभावाना की औषधि ग्रहण कर अपने काम में लग जाते हैं ।

कुशलेन्द्र श्रीवास्तव

जिला-नरसिंहपुर म.प्र.

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।