भारतीय युवाओं पर भारी कोरोना काल और बेरोजगारी

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कोरोना काल की इस वैश्विक महामारी ने एक पूरे वर्ष को ऐसे निगल लिया कि लगता ही नहीं, यह वर्ष कैलेंडर में कभी आया भी था। जैसा कि सबको पता है, सरकारी नौकरियों में सेवानिवृत्ति और पदग्रहण दोनों की एक समय सीमा होती है, ऐसे में उम्र के उस इन पड़ावों पर खड़े युवा व बुजुर्ग दोनों का एक वर्ष समाप्त हो जाए तो समझिए कितना बड़ा नुकसान हो गया। यह जिंदगी है! कोई डीजल-पेट्रोल की कीमत नहीं, जो आज बढ़ी कल घटा दी गई, जिंदगी एक किराया माफिक है, जो एक बार बढ़ गई तो बढ़ गई, यह घटने वाली नहीं! ऐसे में हमारा बेरोजगार युवा वर्ग, जिसकी पदग्रहण करने की एक निश्चित उम्र है, वह अपने एक साल ऐसे गवां दिया हो, उसमें आक्रोश आना स्वाभाविक सी बात है। बेरोजगारी के हिसाब से देश में रिक्तियों का विज्ञापन पहले तो आती नहीं, मगर जो आती भी हैं, उनका निस्तारण बहुत ही कम होता है, ऐसे में बेरोजगार युवा वर्ग गुहार ना लगाए तो आखिर करे क्या?
एक तरफ कोरोना का खौफ और दूसरी तरफ बेरोजगारी का दंश झेल रहा, देश का युवा वर्ग अपने उम्र का एक पूरा वर्ष गवां चुका है, जिनमें इन्हें कुछ उम्मीद भी हैं, वह भी तमाम रिक्तियां कोर्ट में निस्तारण की राह निहार रही हैं, ऐसे में यह बेरोजगार युवा वर्ग जाए तो आखिर कहां जाए? देश में बेरोजगारी के आंकड़ें पहले भी बहुत विकट स्थिति को इंगित करते थें, इस कोरोना काल में यह अपने चरम पर पहुंच चुकी है, अब इन युवाओं को उम्मीद की किरण केवल सरकार के फैसलों पर दिखाई दे रही है, इस स्थिति में उसकी अपनी सरकार से मांग न्यायोचित है। हालांकि बेरोजगारी के ग्राफ को एक दिन में कम कर पाना संभव नहीं है, मगर क्रमवार रोजगार के अवसर मुहैया कराते रहने से यह ग्राफ धीरे-धीरे जरूर कम किया जा सकता है। जैसा कि हम सभी जानते हैं, युवा वर्ग किसी भी राष्ट्र का कर्णधार होता है, ऐसे में जब वही रोजगार का मुद्दा लेकर सड़कों की धूल फांकने को मजबूर हो जाए, तो फिर राष्ट्र का भविष्य आखिर क्या होगा? यह आज का एक सबसे अहम व चिंतनशील मुद्दा है।
यदि सरकार के आदेशानुसार लॉकडाउन का पालन कर, हमारा युवा वर्ग अपना एक वर्ष त्याग सकता है, तो क्या? सरकार का फर्ज नहीं बनता कि इन बेरोजगार युवा वर्ग के लिए रोजगार का अवसर प्रदान करे! कोर्ट में लटकी हुई नौकरियों की बहाली का जिम्मा सरकार को आगे आकर तीव्र गति से निस्तारित करना चाहिए, ताकि आगे की रिक्तियों का मार्ग प्रशस्त हो सके। सरकारी और प्राइवेट लिमिटेड सभी सेक्टरों के रिक्त पदों के आंकड़ें मांग कर, इन पदों हेतु आवेदन भर्ती प्रक्रिया शुरू करना, सरकार की नैतिक जिम्मेदारी है, इससे बेरोजगारी का ग्राफ काफी हद तक कम और युवाओं के आक्रोश व ऊर्जा को देश के हित में उपयोग किया जा सकता है। अब यह फैसला तो सरकार के हाथ में है कि इन बेरोजगार युवाओं की ऊर्जावान सोच को किस सी दिशा में ले जाना चाहती है?

मिथलेश सिंह मिलिंद
मरहट पवई आजमगढ़ (उत्तर प्रदेश)

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।