रास्ते में मां

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छोटा बेटा जब लेने आया तो मां को यह समझ आ गया था कि बङ़े बेटे के यहां रहते हुए एक महीना बीत गया है।

शरीर में शक्ति नहीं थी,मन बैचैन हो रहा था, दिल बैठा जा रहा था, ऐसे में छोटे बेटे के घर सीढ़ियां चढ़ाना वश में नहीं लग रहा था उसे।”बेटा, दो दिन बाद ले जाना आज हिम्मत नहीं है” कहते हुए मां ने बेचारगी भाव से बेटे का हाथ पकड़ लिया।

“पर ये कैसे संभव है मां, मैं अॉफिस से आधे दिन की छुट्टी लेकर आया हूं। भैया-भाभी की भी बाहर जाने की प्लानिंग पहले से तय है।ये बैचैनी तो रोज रहती है तुम्हें” कहते हुए छोटे बेटे ने मां का हाथ पकड़ झटके से उठा लिया।

मां ने गीली आंखों को पोंछते हुए अपनी पोटली उठा ली।

अभी मां-बेटे के साथ रास्ते में ही थी कि बङ़े घर का बुलावा आ गया और मां एक हिचकी के साथ उधर ही मुङ़ गई।

तीये की बैठक में लोग पूछ रहे थे- मांजी कहां थी, बङ़े बेटे के पास या छोटे के पास।

दोनों बेटे एक-दूसरे का मूंह देख रहे थे। कैसे कहते- मां रास्ते में थी।

डॉ पूनम गुजरानी
सूरत

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’

29 अप्रैल, 1989 को मध्य प्रदेश के सेंधवा में पिता श्री सुरेश जैन व माता श्रीमती शोभा जैन के घर अर्पण का जन्म हुआ। उनकी एक छोटी बहन नेहल हैं। अर्पण जैन मध्यप्रदेश के धार जिले की तहसील कुक्षी में पले-बढ़े। आरंभिक शिक्षा कुक्षी के वर्धमान जैन हाईस्कूल और शा. बा. उ. मा. विद्यालय कुक्षी में हासिल की, तथा इंदौर में जाकर राजीव गाँधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के अंतर्गत एसएटीएम महाविद्यालय से संगणक विज्ञान (कम्प्यूटर साइंस) में बेचलर ऑफ़ इंजीनियरिंग (बीई-कंप्यूटर साइंस) में स्नातक की पढ़ाई के साथ ही 11 जनवरी, 2010 को ‘सेन्स टेक्नोलॉजीस की शुरुआत की। अर्पण ने फ़ॉरेन ट्रेड में एमबीए किया तथा एम.जे. की पढ़ाई भी की। उसके बाद ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियाँ’ विषय पर अपना शोध कार्य करके पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। उन्होंने सॉफ़्टवेयर के व्यापार के साथ ही ख़बर हलचल वेब मीडिया की स्थापना की। वर्ष 2015 में शिखा जैन जी से उनका विवाह हुआ। वे मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं और हिन्दी ग्राम के संस्थापक भी हैं। डॉ. अर्पण जैन ने 11 लाख से अधिक लोगों के हस्ताक्षर हिन्दी में परिवर्तित करवाए, जिसके कारण वर्ल्ड बुक ऑफ़ रिकॉर्डस, लन्दन द्वारा विश्व कीर्तिमान प्रदान किया गया।