बाढ़ और प्यार

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कहते हैं ना प्यार अपने लिए तो सब चाहते पर जब बात दूसरों की आये तो कीचड़ उछालने से जरा भी नहीं चूकते। शायद ही इस धरती पर ऐसा कोई हो जिसने प्यार न महसूस किया हो। भला इत्र पर भी कोई पर्दा डाल सकता है। इत्र की शीशी रूपी दिल का ढक्कन जब खुलता है तो यकीनन इत्र दसों दिशाओं को मदहोश कर जाता है। इत्र से मतलब यानि इश्क़ जिसका काम है सबको प्रेम, आनंद सुख शांति और ऊर्जा से भर देना। इसके अलावा जो इश्क़ के नाम पर क्रूरता या जबर्दस्ती हो रही है वह इश्क़ नहीं बल्कि अपराध है। प्रेम, प्रेम ही देने के लिए इस दुनिया में उपस्थित है जिसे बहुत गालियाँ दी गयीं पर प्रेम अमरता का ही दूसरा नाम है जिसे मिटाया नहीं जा सकता। क्योंकि प्रेम मिटा तो ब्रह्मांड भी नहीं बचेगा। जीवन का एक मात्र आधार है प्रेम। प्रेम पर बहुतकुछ लिखा गया पर समझा कम गया और महसूस भी उससे कम किया गया तभी तो पूरी दुनिया में इतने विनाशकारी विध्वंसक युद्ध हुए। परमात्मा क्या सोचता होगा कि जिस मानव की उत्पत्ति प्रेम से होती है आखिर! उसमें इतनी नफरत आती कहां से हैं। तो इसका एक ही जवाब है जो मुझे सही मालूम पड़ता है कि जब हम, हमारा रिमोट कंट्रोल दूसरे के हाथ में दे देते हैं तो हमारा पतन होना शुरू हो जाता है। हमें हमारे बुद्धि विवेक से काम लेने की आवश्यकता है। आप सोच रहे होगें आकांक्षा यह क्या बोले जा रही है कहानी कब सुनायेगी तो सुनिये! यह कहानी है उस बाढ़ की विनाशलीला की जिसमें कई गांव बह चुके थे, हजारों जानवर काल के गाल में समा चुक थे। जहां तलक भी नज़र जाती थी दूूर-दूर तक पानी ही पानी दिखाई देता था। अपनों को खो जााने का भयंकर दुख और बहू बेटे को ढूढ़ती वो तरसतीं डर से सहमी सूजी आखें जहां तहां दिखाई दे रहीं थीं। हर कोई उस पानी में डूब कर जान देने को तैयार कि खाने को कुुछ नहीं और कपड़े भी बह गये उसपर तेज बहती हाड़ कँपाती ठंडी यह पवन, जायें तो जायें कहां। दूर रोती बिलखती नयी दुल्हन अपने नग्न पड़ेे पति को अपनी फड़ी साड़ी के पल्लू से ढ़ाकते हुई कहती है कि आपका शरीर बहुत ज्यादा ठंडा पड़ गया है। उधर दूर बैठी एक बूढ़ी औरत बोली तुम बैठो मैं सूखी लकड़ियों का इंतजाम करती हूँ पर कहां ढूंढ़ने जाऊं। लो बेटी मैरी साड़ी उतार देती हूं, इसे अच्छे से लपेट दो गर्माहट मिलेगी, मुझ बुढ़िया को भला इस हाल मेंं मुुझे कौन देखगा? चारों ओर लोग भागदौड़ रहे हैं। दुल्हन सोचने लगी कि शायद काकी को नहीं पता कि आजकल नरभक्षी दुरात्मा दरिंदे 90 साल की दादियों तक को अपनी वासना की भट्टी में झोंकने से बाज नहीं आते। काकी ने कहा बहू तुम मेरी साड़ी उतार लो। तो बहू बोली न काकी, आप नग्न मत हो। मैं ही…. कहते हुए अपने पति से लिपट गयी। काकी ने आंख बंद करते हुए कहा हे! भगवान रहम कर। दूसरी तरफ कई दिनों से भूखे बच्चे बाढ़ का गंदा पानी पिये जा रहे थे। कुछ बच्चे उसी पानी में मछली पकड़ रहे थे तो कुछ चूहों को ही मार कर खाने पर विवश थे। तभी बूढ़ी काकी बोली मौनी नहीं दीख रही। अगर होती तो सबकी मदद करती। यह कहते हुए काकी वहीं गिर गयीं और मौनी – मौनी कहते हुए इस दुनिया से ही प्रस्थान कर गयीं। तभी दूर से एक लड़की भागते हुए आयी कि दादी मां – दादी मां, पास में देखा तो नयी दुल्हन यानि उसके भैया – भाभी भी भूख और संक्रमण से मर गये। यह देख वह सिर पीट-पीट कर रोने लगी तो कुछ लोग बोले, मौनी तू शांत हो जा। वहां उस तरफ तेरे छोटे भाई और पिता को देखा गया। जल्दी चल, सरकारी कैंप में जगह मिली तो खाना भी मिलेगा। मौनी चिल्लायी ये मेरी दादी.. भैया भाभी…! तो लोग उसे घसीटते हुए बोले जो जिंदा हैं उसे बचा लो। देखो! बादल कितने काले हैं भंयकर बारिश फिर हो सकती है। मौनी भीड़ में अपने पिता और भाई को ढूंढते-ढूंढते थक गयी। उसने देखा कि रात होने को है। अब क्या करूं? कोई नहीं बचा। वह फिर खड़ी होती है तो देखती कुछ लोग कुछ खा रहे होते हैं। वह दौड़ कर जाती है तो वह लोग अपना खाना लेकर और भी दूर भाग जाते हैं। वहीं कुछ लड़के बुरी नजर लिये मौनी की तरफ़ बढ़ते हैं तो मौनी दूसरी तरफ भागने लगती है। दौड़ते- दौड़ते अचानक ही मौनी के सामने पत्थर आ जाता है और वह गिरती कि एक सांवला मजबूत हाथ उसे गिरने से रोक लेता है। जैसे ही वह पलट कर देखती है कि वह दोनों ही एक दूसरे को कुछ पल देखते रह जाते हैं जबकि लड़का- लड़की दोनों ही साधारण है जिन्हें खूबसूरत नहीं कहा जा सकता। वह लड़का बोला, ‘पीटी ऊषा की तरह दौड़ रही थी गिर जाती तब। मौनी बोली,’ भूख लगी थी। वह लडका बोला भूखा तो मैं भी हूं दो दिन हो गये पर मैं किसी का खाना नहीं छीन रहा। चलो मेरे साथ, खाने का कोई इंतजाम करते हैं। वह कहती हैं तुम कौन हो? तुम्हारा नाम क्या? मैनें शायद सबकुछ खो दिया। यह कहते – कहतेे वह रो पड़ती है। यह देखकर वह लड़का कहता है,”मैं एक लड़का हूं।” मेरा नाम रानू है और याद रखो तुमने सबकुछ नहीं खोयाा, तुम्हारे साथ तुम स्वंय हो। मौनी कहती है तुम लड़के हो मुझे भी दिख रहा है। रानू कहता है जब तुम्हें पता है कि मैं लड़का हूं तो पूछा ही क्यों? मौनी ने कहा, ”मेरी लंबाई चार फुट और तुम्हारी करीब 5’10 होगी, ऐसा लग रहा है मेरे साथ जिराफ़ चल रहा है। वह बोला, ”मुझे जिराफ़ होने पर गर्व है और तुम भी अपने चार फुट होने पर गर्व करो। वह बोली क्यों? तभी वह बोला, ”देखो! सामने मोटे पानी की पाइप लाइन टूटी पडी है, कई बच्चे इसमें दबे हैं। लोगों की मदद करो, तुम इस पाइप में घुस जाओ पर ध्यान रखना कि हड़बड़ी मत मचाना वरना तुम्हारा शरीर फूलेगा और तुम पाईप में फंस भी सकती हो। मौनी को लगा मानो रानू सही कह रहा है और मौनी उस पाइप में घुस गयी। कुछ देर की मशक्कत के बाद दो छोटे बच्चों के शव निकालते – निकालते उसने देखा कि यह पांव किसका फंसा है यह तो मेरा छोटा भाई है। और वह सांस रोक कर धैर्य से आगें खिसकी और अपने भाई के पांव को खींचते हुए अपने बेहोश भाई को बाहर निकाल लायी। तभी उसने चारों तरफ़ देखा कि रानू कहां गया? वह लोगों से पूछती घूम रही थी कि डॉक्टर कहां बैठे हैं? मुझे मेरे भाई के लिए दवा चाहिए। पास मैं ही बच्चों के शव पर मातायें विलाप कर रही थीं। हर तरफ चीख पुकार मातम का वातावरण था। तभी मौनी को रानूू की बात याद आयी कि मेरे साथ मैं खुद हूं । बस यही सोच कर मौनी ने अपने छोटे भाई को अपनी पीठ पर लाद कर दौड़ना शुरू किया कि मैं डॉक्टर के कैंप तक जरूर पहुंचूंगी। वह दौड़ते – दौड़ते हांफ कर एक जगह बैठ कर रोने लगी कि रानू दौड़ता हुआ आया और बोला। यह रिक्शा है चलो इस पर बैठो जल्दी। उन दोनों ने किसी तरह रिक्शे पर भाई को अपने दोनों की गोद में लिटाया और कैंप तक पहुंचने की यात्रा पर चल दिये। दोनों रिक्शे पर बिल्कुल खामोश बैठे थे कि रानू ने कहा, ”किसे याद कर रही हो?” तो मौनी ने कहा, ”कॉमन सैंस की बात है गॉड को याद कर रही हूँ और क्या करूं?” यह सुनकर रानू मुस्कुराया और बोला, ”माना यह प्राकृतिक आपदा है गॉड को याद करना बनता भी है पर मैं गॉड को गो ओन ड्यूटी की तरह देखता हूं। हमें कर्म कर्तव्य पर थोड़ा ज्यादा ध्यान देना चाहिए। यह सुनकर मौनी ने खीजते हुए कहा कि फिर तो तुम रोटी के बारे में भी कुछ अलग सोचते होगे? तो रानू ने कहा, ” रोटी से मेरा मतलब है रिटर्न ऑन टाईम इन्वेस्टिड, समय की बर्बादी हमारे फ्यूचर की बर्बादी है जो हमारी दाल रोटी सब बिगाड़ देती है। यह बातें सुनकर मौनी ने कहा, ”तुम काफी पढ़े लिखे लगते हो, लाईफ में क्या सपना देखते हो?” वह कहता है, ”हाँ, मैने इंजीनियरिंग में कई डिप्लोमें, कई बड़ी डिग्री हासिल की हैं और मैं मेरे गांव में एक बहुत मजबूत और मॉर्डन बोलता हुए पुल का निर्माण करना चाहता हूं पर मेरे शोध पर अभी सरकार ने कोई मुहर नहीं लगायी है क्योंकि सरकारी लोग चुनाव में बिजी ज्यादा रहते हैं पर देश की प्रतिभाओं के शोध व अविष्कार के प्रति उदासीन, इसीलिए यहां की प्रतिभायें विदेश कूच कर जाती हैं। यह सुनकर मौनी ने कहा, ”वर्तमान सरकार बदल जाना चाहिए जो अपने नागरिकों को बाढ़ में मदद नही कर पा रही। इसपर रानू ने कहा, ”हम सरकारें बदलने की बात करते हैं पर क्रांति तो उस दिन होगी जब हम सरकार नहीं खुद को बदलने की दिशा में गम्भीरता से काम करेगें पर हाँ सरकार को अपनी नीतियों पर विचार करने के लिए पढे लिखे युवाओं को अपने कैबीनेट नें शामिल करना चाहिए जब 60साल पर शिक्षक रिटायर्ड मान लेते हैं तो नेता लोग 80साल तक कुर्सी पर क्यों जमे रहते हैं। भारत युवाओं का देश है पर युवा ही सबसे ज्यादा परेशान भी है। तभी मौनी ने कहा, ”वैसे बोलता पुल से तुम्हारा क्या मतलब है, क्या पुल बोलेगा? इसके जवाब में रानू ने कहा, ” हाँ, मेरा बनाया हुआ पुल बोलेगा, उसमें बहुत प्रकार के सैंसर लगे होगें, जिसमें पुल पर किसी ने पान खाकर थूका या कचरा फेंका तो सायरन बजेगा, पुल पर सीमा से ज्यादा भीड़ होगी तो सायरन बज कर आगाह करेगा और तो और पुल से किसी की ड्रग्स और लाश ले जाते गुजरेगा तो सायरन बजेगा तथा अगर पुल खराब हुआ तो 6 महीने पहले सायरन बजेगा कि मैं जल्द खराब होने वाला हूं। मेरा पुल विश्व का पहला इस तरह का पुल होगा जिसपर अपराधी गुजरने से पहले डरेगा। यह सुनकर मौनी ने कहा, ” वॉव, क्या बात है? तुम्हारे पांव कहाँ हैं?” यह सुनकर रानू हंस पड़ा और बोला, ”पांव मेरे बिल्कुल सही जगह हैं पर तुम्हें यह कहना चाहिये था मेरा मन, मेरा दिल किधर है?” तो मौनी ने कहा, ”बताओ, आपका मन और दिल किधर है? तो रानू ने कहा, ”सिर्फ़ आपके पास।” मौनी ने कहा, ”तुम शब्द में ज्यादा अपनापन है और आप शब्द में भारीपन।” यह सुनकर रानू हंस पड़ा फिर रानू और मौनी बातें करते रहे और रास्ता कब बीत गया पता नहीं चला। दोनों कैंप पहुंचे जहां डाक्टर उसके इलाज में जुट गये। तभी डॉक्टर ने रानू से कहा कि पेशेंट को यहीं रहने दो। तुम अपने परिवारजनों को ढूढों। मौनी ने कहा रिक्शा, दोनों रिक्शे पर बैठ गये तो रानू और मौनी एक दूसरे को थकी आखों से देख रहे थे कि कोई जान पहचान नहीं फिर भी यह क्यों अपना सा लग रहा है? तभी रानू ने पूरी हिम्मत जोड़ मौनी की हथेली को अपनी हथेली पर रखते हुए कहा चिंता न करो। मैं सब ठीक कर दूंगा ।रोना मत। मौनी को जिंदगी में पहली बार लगा कि किसी ने हथेली ही नहीं आत्मा तक को छू लिया था। दोनों कुछ कहते कि ठंडी हवा आंधी की तरह चलने लगी और तेज बारिश शुरू हो गयी थी। मौनी के ठंड से हाथ पांव कांप रहे थे कि रानू ने उसे अपने सीने से लगा लिया और कहा, ” माफ करना, हम दोनों के पास कोई दूसरा चारा नहीं है। मौनी ने सीने से लगे लगे, मुस्कुरा कर कहा, ”ब्याह करोगे मुझसे?” तो रानू ने मौनी के होठों के करीब अपने होठों को लाकर कुछ कहना चाहा तो मोनी ने अपनी हथेली से अपना मुंह ढ़क लिया और तब रानू ने मौनी के कान में कहा, बिल्कुल ब्याह करूंगा और हां तुम्हारे लिए चांद तारे तोड़ कर नहीं ला सकता पर रात के झूठे बर्तन खुशी-खुशी धुल दिया करूंगा। यह सुनकर रिक्शा वाला पीछे देखते हुए बोला, तुम दोनों की जोड़ी सलामत रहे। वैसे, भैया मैनें सबकुछ खो दिया। क्या आप लोग भाग्यशाली हैं? रानू ने कहा ,” मैं भी भैया तुम्हारी ही तरह ही लुटा बैठा हूं।” बस इस लड़की की मदद कर रहा हूं। मौनी ने कांपते हुए कहा कि मेरे पिताजी नहीं मिल रहे। रिक्शावाला बोला, मिल जायेगें बेटी । चलो मैं अब तुम्हें यहीं छोड़ता हूं। अरे! चलो वहां भीड़ ज्यादा है लगता है खाना बंट रहा है। यह सुनते ही रानू और रिक्शावाला दोनों उतर कर खाने की तरफ़ भागे और मौनी से बोले कि तुम रिक्शा पकड़ कर मुंह बांध कर यहीं रूको। कुछ देर की जद्दोजहद के बाद खाने के पैकिट लेकर रानू लौटा तो मौनी ने कहा रिक्शावाला कहाँ है? तो रानू ने कहा भीड़ में वह गिरा और भीड़ उसके ऊपर सेेे उसे रौंदते हुए गुजर गयी, वह नही बचा। यह सुनकर मौनी रो पड़ी तो रानू उसे जबर्दस्ती सब्जी पूड़ी खिलाते हुए बोला, रोने के लिये भी ताकत चाहिए इसलिए खाना लो। क्या पता कल मेरा क्या हो? यह सुनकर मौनी ने रानू के मुंह पर हाथ रख दिया कि ऐसे मत बोलो। मौनी ने कहा तुम भी खा लो तो वह बोला हां थोडा खा लूंगा। थोडा तुम्हारे भाई के लिए भी रख लेता हूं। क्या पता कल क्या हो। मौनी ने कहा, ”तुम यह खाना छीन कर ही लाये होगे क्योंकि इतनी भीड़ में तुम्हें कोई हाथ में तो देने से रहा। इस पर रानू ने कहा, ”नहीं, मैंने छीना नहीं, एक आदमी पांच पैकिट लिये भाग रहा था मैनें उसे रोका और कहा कि क्या इतना सब खाने के बाद तुम्हें पीने के लिए साफ पानी मिलेगा तो वह बोला, ”पानी की तो साफ बात ही न करो, बस पी रहे हैं गंदला।” तो रानू ने कहा, ” मेरे पास साफ पानी है तुम एक बोतल पानी ले लो मुझे दो पैकेट खाना दे दो, इस पर वह मान गया। ” जिंदगी में जल्दबाज़ी से नहीं सही समय, सही इंसान से डील करने पर और पूंछने में कभी न हिचकने से, विपरीत परिस्थितियों को भी अनुकूल बनाया जा सकता है।” यह सुनकर मौनी ने कहा, ”बहुत बड़ी बड़ी बातें करते हो, ओशो बनना है क्या? तो रानू ने कहा, ”ओशो नहीं मुझे रानू ही बना रहना है। मेरे कहने का मतलब है कि पहले किसी से कनेक्ट हो फिर उसे करेक्ट करो तो डील अपने फेवर में जाती है। इस पर मौनी ने कहा, ”अगर मन ही दुखी हो तब कैसे डील की जाये?” तो रानू ने कहा, ”अपसेट मन को रिसैट करो।” तो मौनी ने कहा, ” वो कैसे?” तो रानू ने कहा, ” वो देखो सरदार जी खाना बांट शायद दवायें भी चलो हम दोनों चलकर उनकी मदद कर सकते हैं, मदद करने से मन शांत होता है। फिर कुछ देर पीड़ितों को खाना और दवायें बांटने के बाद रानू और मौनी दोनों आगें चलकर भीड़ में मौनी के पिताजी को ढूंढते रहे और तीन दिन बाद जैसे ही मौनी को उसके पिता जी मिले। तो उसकी खुशी का ठिकाना न था। मौनी के पिताजी अपने पास मेंं बैठी एक अनजान महिला की तरफ़ इशारा करते हुए बोलेे कि इन्होनेें मेरी बड़ी मदद की है बेटा। इस महिला का अपना कोई नहीं बचा है इसलिए इसे अपने साथ ही रखूंगा। मौनी ने सोचा कि आज पिताजी बहुत खुश हैं तो वह भी कुछ बोले तो मौनी ने कहा, पिताजी यह रानू है। इसने मेरी और गोलू भैया की बहुत मदद की है। यह सुनते ही मौनी के बाप की त्यौरियां चढ़ गयीं और वह आंखें लाल करकेे बोले, रात इसी के साथ रही क्या? वह कुछ कहती कि उन्होंने रानू से कहा, चल भाग यहां से। दूर रहना मेरी बेटी सी। तभी मौनी का छोटा भाई भी तन कर बोला, बड़े बेशर्म हो अभी तक यहीं खड़े हो। मौनी ने कहा, उसने मेरे साथ कुछ नहीं किया है बल्कि मदद की है तभी मौनी के पिताजी के पास बैठी एक अनजान औरत बोली, अरी! बिटिया तुम नहीं जानती आज कल के लरका लोग को। जान दे। हम तेहरे लिये नीक लरका ढूढ़वा। रानू यह सुनकर वहां से चला गया। इधर मौनी के पिताजी उस औरत को लेकर टूटे घर को फिर से ठीक-ठाक करने में लग गये। कई दिनों की मेहनत के बाद घर भी रहने लायक कर लिया और आराम से रहने लगे। मौनी ने कई बार देखा कि वह औरत सिर्फ़ नौकरानी नहीं बल्कि पिताजी की पत्नी की तरह… ।फिर क्या कुछ दिन बाद उसके पिताजी ने उस औरत से मंदिर में शादी कर ली। यह सब मौनी के छोटे भाई को बहुत बुरा लगा तो वह कहने लगा कि अब पहले मौनी दीदी की शादी कर दूं तब मैं दूर जाकर रहूंगा। लगभग एक महीना बीता और मौनी का छोटा भाई गोलू किसी रिश्तेदार के जरिये एक परिवार को घर ले आया और किसी तरह मौनी की शादी हो गयी। मौनी ससुराल में आकर हर पल सोच रही थी कि काश! मुझे मौत आ जाये। मैं इस लड़के के साथ नहीं…! तभी मौनी के कमरे में उसका पति अशोक आया और वह बोला कि मौनी अगर तुम पढ़ना चाहो तो मैं तुम्हें पढ़ाऊंगा। मौनी ने कहा, मुझे ज्यादा नहीं पढ़ना। मौनी का पति बोला पर क्यों? तो मौनी ने कहा, ”हमारे राज्य में हर साल इतनी भंयकर बाढ़ आती है। मैं चाहती हूं, मैं वो बनू जो बाढ़ मैं घिरे लोगों की मदद करें, उन्हें दवा और खाना दें। मैं सोसलवर्क करना चाहती हूं। यह सुनकर मौनी के पति ने कहा, ”वैरी गुड। तुम मेरे ही तरह सोचती हो। मैं भगवान का शुक्रगुज़ार हूँ कि मुझे तुम मिली हो। मौनी ने कहा मैं काफी थकी हूं सोना चाहती हूं कहकर दूर बैड के कोने में खिसक कर सो गयी।लगभग दो महीने बीत चुके थे। मौनी छत के कौने में बैठी हुई चुपचाप उस स्पर्श को महसूस कर रही थी जिसके कारण वह अभी तक जिंदा थी। उसे लगता था कि अगर उसका प्रेम सच्चा है तो एक न एक दिन उसे जरूर मिलेगा। वह यह सोच ही रही थी कि अशोक उसके कान में आकर बोला कि आखिर! क्या बात है जो तुम मेरे साथ होकर भी मेरे साथ नहीं हो। मुझे लगता है मैं किसी निर्जीव वस्तु के साथ सोता हूं जागता हूं खाता हूं पीता हूं। तुम किस गम में हो। क्या बाढ़ तुम्हें इतना अंदर तक हिला गयी जो तुम भूल नहीं पा रही हो। वह आगें बोला कि राम करें अब बाढ़ न आये। तो वह रो पड़ती है और कहती है पिछली साल की बाढ़ ने मेरी बड़ी दादी मां, मेरी माँ को और आज बडे़ भाई – भाभी, दादी मां सब को छीन लिया पर उसके बदले में एक मददगार से मिलाया बाद में उसे भी छीन लिया। यह सुनकर मौनी के पति ने कहा, कौन मददगार? कौन था वह? वह बोली लड़का था। मौनी के पति ने कहा, लड़का था पर कौन लड़का था जिसने तुम्हारी मदद की। मैं मिलवाने चलूंगा। मैं भी धन्यवाद बोलूंगा। गांव बताओ? वह बोली, मुझे कुछ नहीं पता, वह कौन था, किस गांव से था। यह सुनकर मौनी के पति ने कहा, ‘जिसके बारे में तुम कुछ नहीं जानती, उसे इतना क्यों सोचती हो? अपनी गृहस्थी पर ध्यान दो।मौनी सोचने लगी कि मैं उसे आखिर! क्यों नहीं भुला पा रही? मैं क्यों उसका स्पर्श महसूस करती हूं? मैं क्यूं उसे ही पाना चाहती हूं? मैं उसके बिना कैसे जियूं? यही सब सोचते – सोचते कब साल बीत गयी पता ही नहीं चला। आज मौनी की शादी की सालगिरह थी। इस शुभअवसर पर मौनी के पति ने कहा, ”तुम कहती थी न बाढ़ पीड़ितों के लिए कुछ काम करना चाहती हो, मैं फाऊंडेशन रजिस्टर्ड करवा दूंगा।” यह शब्द कमरे के बाहर खड़े अशोक के पिता और मौनी के ससुर के कान मेंं जैसे ही पहुंचेे कि वह जोर से चिल्लाये मेरे जीते जी फालतू काम नहीं होगें। ज्यादा कमा लिया हो तो मुझे दे। मैं बैंक में डाल दूं। कल की आयी महरारू के तलवे चाटेगें, आखें चार हो गयी ज्यादा। यह सब सुनकर अशोक कुछ बोलता कि मौनी ने कहा, चुप रहिये आप। तो अशोक ने कहा, तुम तैयार हो जाओ, आज बाहर तुम्हारी मनपसंंद आलू टिक्की खाकर आयेगें। पहले पिताजी का नाश्ता बना दो और वह खेत पर निकल जायें। उन दोनों ने महसूस किया कि पिताजी तो आज घर पर ही हैं तो दोनों ने शाम तक का इंतजार किया और रात मैं पीछे के गेट से दोनों बाईक से निकल गये। देखा कि टिक्की के सारे ठेले जा चुके थे सिर्फ़ एक ठेला खड़ा था। दोनों ने ठेले के पास पहुंचे तो ठेले वाले ने अपना मुंह गमझे से बांध लिया और बड़े उत्साह से टिक्की बनाने में लग गया। तभी अचानक पानी बरसने लगा और अशोक अपनी बाईक पेड़ की ओट में किनारे लगाने लगा तभी मौनी ने टिक्की वाले से कहा, देखो! पानी बरस रहा है। आपका सब सामान भींग रहा है। आप सुनते क्यों नहीं। तभी टिक्की वाले ने छटपट गर्मागर्म टिक्की मीठी खट्ठी चटनी डाल कर जैसे ही उस प्लैट के नीचे दूसरी प्लैट लगाकर मौनी की हथेली पर रखी कि गर्म टिक्की से मौनी का हाथ कहीं जल न जाये। तो वह समय मानों वही रूक गया। दोनों एक दूसरे को देखने लगे क्योंकि मौनी उस छुअन को पहचान गयी थी कि यह टिक्कीवाला कोई और नहीं उसका रानू ही है पर वह हैरान थी कि आखिर! क्या हुआ है कि एक इतना पढ़ा लिखा इंजीनियर लड़का यूं मुंह बांधे टिक्की का ठैला लगा रहा है। अब टिक्की तो खानी ही थी क्योंकि रानू ने जो बनायी थी। वह सोच के भंवर में उलझी रोने लगी और टप टप आंसू टिक्की में गिरने लगे। तभी पीछे से अशोक ने आकर कहा, अरे! मौनी तुम पेड़ की ओट में आ जाओ वरना पूरी भीग जाओगी। मौनी आंसू को पोछते हुए चुपचाप टिक्की खाती जा रही थी। उसने महसूस किया कि इस टिक्की में वही स्वाद था जो सालभर पहले उस कैंप की सब्जी पूड़ी पैकेट में था जिसे रानू ने मौनी को अपने हाथ से खिलाया था। तभी पीछे से अशोक ने रानू से कहा, एक और टिक्की बना दो। तो टिक्कीवाला ने इशारा किया कि यही लास्ट टिक्की थी। अब कुछ नहीं बचा, बाकि सब सामान बरसात में भीग गया। यह देखकर रानू ने दस का नोट दिया तो उसने बदले में दस के ही पूरे सिक्के उसे वापस लौटा दिए और वह मौनी की प्लैट को धोकर अपने गमझे से पोंछता हुआ, अपना टिक्की का ठेला आगेें बढ़ा ले गया। इधर मौनी और अशोक बाईक पर बैठ गये तो मौनी वापस पलट-पलट कर रानू को जाता देखती रही। आज इस पल उसे याद आया कि उस दिन रानू ने कहा था कि चांद तारे तो नहीं ला सकता परन्तु तुम्हारे रात के बर्तन धुल दिया करूंगा तो ओह! तो इसलिए वह मेरी झूठी प्लैट भी कितने प्यार से धुल रहा था। बस कुछ देर में दोनों घर पहुंच गये। घर आकर अशोक ने कपड़े उतारे तो बोला, अरे! गरीब टिक्कीवाले ने भूलवश पूरे ही दस रूपये मुझे सिक्के के रूप में वापस लौटा दिया है। मैं जाकर उसे उसकी मेहनत देकर आता हूं। यह सुनकर मौनी चुपचाप वॉसरूम में जाकर भीगे कपड़े बदलने लगी और आज उसका मन कर रहा था कि वह और भीगे, और भीगे। तभी उसने नल खोला और जीभर कर नहाना शुरू कर दिया। उसेे याद ही नहीं था कि वह कितनी देर नहाती रही। फिर वह चुपचाप रूम में आयी तो रूम की लाईट ऑफ थी वह बैड का किनारा पकड़कर सो गयी। धीरे-धीरे समय बीतता गया और रॉनू उस कहीं नहीं मिला। सब ठीक ही चल रहा था कि बारिश का मौसम शुरू हुआ और कुछ दिन रिकार्ड तोड़ भारी बारिश के कारण सरकार ने बाढ़ का अल्टीमेटम दे दिया। यह सुनकर मौनी अंदर तक कांप गयी क्योंकि वह बाढ़ की वीभत्सता से परिचित थी। कुछ ही दिन बीते कि धीरेे-धीर बाढ़ का पानी घर में घुसा और पूरा घर पानी – पानी हो गया तो सब लोग घर से निकल कर ऊंची जगह को भागने लगे। चारों तरफ अफरा-तफरी मची हुई थी कि एक औरत भागते हुए आयी और बोली, नहर में तुम्हारे ससुर बह गये हैं और उन्हें बचाने तुम्हारे मालिक तुम्हारे पति नहर में कूद गये हैं। तुम तैरना जानती हो तो बचाा लो जाकर। मौनी यह सुनकर उस औरत के पीछे-पीछ दौड़ने लगी और ऊफनती नहर के किनारे हजारों की भीड़ में घुसते हुए डायरेक्ट उस नहर में कूद गयी। उसी भीड़ में खड़े रानू ने जब मौनी को कूदते हुए देखा तो उसने भी बिना सेकेंड गँवायें उसी नहर में छलांग लगा दी और किसी तरह मौनी की टांग पकड़ते हुए उसे डूबने से बचाने की कोशिश करते हुए नहर में बहते हुए काफी दूर निकल आये तब मौनी ने कहा, ”मेरे पति और ससुर को बचा लो।” यह सुनकर रॉनूू हैरानी सेे इशारा करनेे लगा। रानू को बार बार इशारा करते देख मौनी गुस्से से बोली, ”गूंगे हो क्या?” रानू ने हाँ में सिर हिलाया और अपनी कटी हुई जीभ दिखा दी। यह देखकर मौनी ने कहा, ”तुमको मेरी कसम सच सच बताओ यह सब किसने किया?”तब रानू ने इशारे में बताया कि जिस दिन तुम बाईक से टिक्की खाने आयी थी, उसी रात तुम्हारा पति और ससुर उसी बाईक पर आये थे और वह बोला कि तुझे मेरी वाईफ मुड़कर देखती ही रही बता बाढ़ का मददगार तू ही है। मैनें कहा, ”हाँ, बाढ़ में उसकी मदद की थी मैनें, बस इतना सुनकर दोनों ने मुझे बहुत पीटा और बाद में मेरी जीभ भी काट दी और इसी नहर में फेंक दिया था। बड़ी मुश्किल से मैंने अपनी जान बचायी। इशारे में पूरी बात सुनकर मौनी का दिल बैठ गया और वह बोली कि मैं इन दोनों को जेल पहुंचाऊंगी। यह कहते हुए वह रो पड़ी तो रानू ने उसे अपनी बाहों में कसते हुए कहा कि मैं हूँ ना। तभी दोनों एक दूसरे को साधते हुए किसी तरह नहर से बाहर आने ही वाले थे कि पुल पर सामने खड़ा अशोक और उसका बाप तथा मौनी की सौतेली मां सबको एक साथ खड़े देखकर मौनी हैरान रह गयी तभी मौनी कुछ कह पाती कि उसकी सौतेली मां ने देशी कट्टा निकाल कर मौनी और रॉनू पर गोली चला दी और यह देखकर भीड़ में अफरा-तफरी मच गयी। फिर क्या था दोनों के रक्तरंजित शरीर को मौनी के पति और सौतेली मां और ससुर ने मिलकर उसी उफनती नदी में फेंक दिया और आपस में आसपास खड़े लोगों से बोले कि कोई पूछे तो कहना बाढ़ में बह गये दोनों। बाढ़ में रानू ने तैर कर मौनी का हाथ पकड़ लिया और दोनों ने एक दूसरे से बिन कहे ही सबकुछ कह दिया था। दोनों एक दूसरे का हाथ थामे बहते चले जा रहे थे कि मौनी ने देखा कि दूसरी तरफ़ से उसके पिता और भाई समेत कई लोगों की लाशें बहती चलीं आ रही हैं। यह देखकर मौनी की बंद होतीं आखें यह सब देखतीं रहीं और रानू यह नजारा देख कर सोचने लगा कि लोग बाढ़ में बाढ़ से ज्यादा नहीं मरते जितनी बाढ़ की आड़ लेकर मरवा दिये जाते हैं। अब दोनों के शरीर से इतना खून बह चुका था कि दोनों सिर्फ देख सकते थे पर कर कुछ नहीं सकते थे। मौनी के अंदर की आग सुलग सुलग कर इतनी जली कि वह पूरी शक्ति बटौर कर चिल्ला कर बोली हे भगवान् हमें थोड़ी जिंदगी और दे दे जिससे हम दोनों मिलकर इस खूनी बाढ़ के पीछे के गुनहगारों का पर्दाफाश कर सकूं। दूसरे दिन बाढ़ के उस कहर में गांव के लोगों ने रानू और मौनी दोनों की लाशों को बहुत ढूंढा पर वह कहीं नहीं मिलीं। कुछ प्रेमियों ने सुना तो उन्होंने कहा कि उन दोनों के तन इतने पवित्र थे कि मौत के बाद भी नफरत उन्हें तलाश ना सकी। कुछ साहित्यकारों ने लिखा कि वह बाढ़ में डूबते तो यकीनन मिल जाते पर वह पोर – पोर भीगे हुए प्रेम में डूबे कि एक दूसरे में विलीन हो गये। इसके अलावा कुछ खोजी पत्रकारों ने कहा कि वह जिंदा होगें और अपने गुनाहगारों से बदला लेने के लिए फिर लौटेंगे….पता नहीं वह दिन – तारीख कौन सी होगी पर यकीनन मौसम यही बाढ़ का ही होगा।

#आकांक्षा सक्सेना

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।