गर फ़िरोज़ गांधी न होते तो….?

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अटल जी का विरोधियों पर संसद में गुर्राना, सुषमा का हिंदी प्रेम व्यक्त करना, मोदी का संसद की देहरी पर झुक जाना, स्मृति का आक्रोश व्यक्त कर जाना, राहुल का आँख मारना, अमित शाह का पीओके पर भौहें तानना, गुलाम नबी आजाद का कश्मीर पर चीखना, मनीष तिवारी और अखिलेश का विरोध प्रकट करना, जामयांग सेरिंग नामग्याल का लद्दाक का दर्द बयाँ करना सब के सब सब धता रह जाता, न देश देख पाता न सोशल मीडिया में आता, गर फिरोज़ न होते तो…
जी हाँ, यह सच है। इसकी कहानी शुरू होती है आज़ादी के बाद अभिव्यक्ति की आज़ादी से।
उस दौर में संसद के भीतर कुछ भी कहा जा सकता था लेकिन अगर किसी पत्रकार ने इसके बारे में कुछ कहा या लिखा तो उन्हें इसकी सज़ा दी जा सकती थी। संसद के भीतर का कुछ भी बाहर आया तो समझो जान जोखिम में और जिल्लत अलग।
किन्तु उस दौर में भी नेहरू-गांधी के विरुद्ध यदि कोई लड़ा तो वह केवल फ़िरोज़ गांधी थे। इन्दु व फ़िरोज़ दोनों के बीच तनाव तब शुरू हुआ जब इंदिरा अपने दोनों बच्चों को लेकर लखनऊ स्थित अपना घर छोड़ कर पिता के घर आनंद भवन आ गईं। शायद ये संयोग नहीं था लेकिन इसी साल यानी 1955 में फिरोज़ ने कांग्रेस पार्टी के भीतर भ्रष्टाचार विरोधी अभियान शुरू किया। इंदिरा गांधी इसी साल पार्टी की वर्किंग कमेटी और केन्द्रीय चुनाव समिति सदस्य बनी थीं। उन दिनों लोकतंत्र के मंदिर संसद में अजीब-सा खालीपन था।
केवल कांग्रेस ही सर्वस्व वर्चस्व वाली पार्टी थी, विपक्षी तो न के बराबर थे और कमजोर भी थे। इस कारण नए बने भारतीय गणतंत्र में एक तरह का खालीपन था।
हालांकि फ़िरोज़ सत्तारूढ़ पार्टी से जुड़े परिवार के करीब थे, वो विपक्ष के अनौपचारिक नेता और इस युवा देश के पहले व्हिसलब्लोअर बन गए थे।#अर्पणजैनअविचल
उन्होंने बड़ी सावधानी से भ्रष्ट लोगों का पर्दाफ़ाश किया जिस कारण कईयों को जेल जाना पड़ा, बीमा उद्योग का राष्ट्रीयकरण किया गया और वित्त मंत्री को इस्तीफ़ा तक देना पड़ा।
इसी के साथ फ़िरोज़ गांधी अभिव्यक्ति की आज़ादी के बड़े समर्थक थे।
उस समय संसद के भीतर का किसी पत्रकार ने कुछ लिखा तो समझो शामत आ गई। इस मुश्किल को ख़त्म करने के लिए फिरोज़ ने एक प्राइवेट बिल पेश किया। ये बिल बाद में कानून बना जिसे फिरोज़ गांधी प्रेस लॉ के नाम से जाना जाता है। इस कानून के बनने की कहानी भी बेहद दिलचस्प है।
फिरोज़ गांधी की मौत के पंद्रह साल बाद इंदिरा ने आपातकाल की घोषणा की और अपने पति के बनाए प्रेस लॉ को एक तरह से कचरे के डिब्बे में फेंक दिया।
बाद में जनता सरकार ने इस कानून को फिर से लागू किया और आज हम दो टेलीवज़न चैनल के ज़रिए भारतीय संसद की पूरी कार्यवाही देख सकते हैं। इसके साथ फिरोज़ गांधी की कोशिश हमेशा के लिए अमर हो गई। #अर्पणजैनअविचल
यदि फ़िरोज़ गाँधी नेहरू-इंदिरा की सम्प्रभुता का विरोध नहीं करते तो आज यह देश लोकसभा व राज्यसभा चैनल से परिचित भी नहीं हो पाता न ही संसद की प्रक्रिया और कही हुई बातों से।

[आज फ़िरोज़ गाँधी की पुण्यतिथि है, भाव पूर्ण नमन]

डॉ अर्पण जैन ‘अविचल’
हिन्दीग्राम, इंदौर

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।