क्या नई शिक्षा नीति से लौटेगा मातृभाषा माध्यम ?

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नई शिक्षा नीति में प्राथमिक स्तर तक शिक्षा का माध्यम मातृभाषा किए जाने के संबंध में वैश्विक हिंदी सम्मेलन द्वारा स्वतंत्रता दिवस 15 अगस्त 2020 को गूगल मीट पर वैश्विक संगोष्ठी का आयोजन किया गया। इस संगोष्ठी में देश के विभिन्न राज्यों की और विभिन्न भाषाओं के प्रतिनिधियों ने सहभागिता की। संगोष्ठी का विषय था क्या नई शिक्षा नीति से लौटेगा मातृभाषा का माध्यम ?

संगोष्ठी का संचालन करते हुए वैश्विक हिंदी सम्मेलन के निदेशक डॉ. एम. एल. गुप्ता ‘आदित्य’ ने राष्ट्र कवि मैथिली शरण गुप्त की पंक्तियों को उद्धृत किया, ‘हम कौन थे क्या हो गए, और क्या होगी अभी। आओ मिलकर विचारें, ये समस्याएं सभी। इन पंक्तियों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि अक्सर लोग यह सोचते हैं कि भारत का अंग्रेजीकरण अंग्रेजों ने किया जबकि सत्य यह है कि स्वतंत्रता के समय भी देश के 99% से भी बहुत अधिक लोग मातृभाषा में ही पढ़ते थे। भारत के संविधान में हमने हिंदी को राजभाषा बनाया और विभिन्न राज्यों की भाषाओं को वहां की राजभाषा बनाया और धीरे-धीरे अंग्रेजी को समाप्त करते हुए भारतीय भाषाओं को अपनाने का संकल्प लिया। लेकिन इसके ठीक विपरीत शासन-प्रशासन सहित जीवन के हर क्षेत्र में अंग्रेजी तेजी से बढ़ती गई और देश के छोटे-छोटे गांवों तक अंग्रेजी माध्यम पहुंच गया। अब नई शिक्षा नीति में सरकार ने प्राथमिक स्तर या उससे आगे की शिक्षा मातृभाषा में देने की बात कही है। लेकिन तस्वीर अभी भी बहुत साफ नहीं है आज देश के सामने यह प्रश्न खड़ा है कि क्या नई शिक्षा नीति से शिक्षा में मातृभाषा माध्यम लौटेगा ?

मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित इंदौर से श्री वैष्णव विद्यापीठ विश्वविद्यालय के कुलपति श्री उपेंद्र धर ने कहा कि यह अच्छी बात है कि नई शिक्षा नीति में सभ्यता, संस्कार, मातृभाषा और सभी भारतीय भाषाओं की बात हुई है। लेकिन मातृभाषा माध्यम लौटेगा कि नहीं यह कह नहीं सकते ? जिन महानगरों में विभिन्न मातृभाषाओं को बोलने वाले रहते हैं, वहाँ पर स्कूल कितनी भाषाओं के शिक्षकों को भर्ती कर सकेगा? कितनी भाषाओं में पढ़ा सकेगा? नवीं के बाद मातृभाषा के अभाव में क्या होगा, स्पष्ट नहीं है? जब विदेशी, अंतर्राष्ट्रीय संस्थान आएँगे, क्या तब उनमें मातृभाषा वाले जा सकेंगे, आगे क्या होगा ? अभिभावकों की दृष्टि से यह भी विचारणीय है कि क्या मातृभाषा के माध्यम से उनके बच्चों को उच्च शिक्षा मिल पाएगी ? क्या वे उससे उच्च पदों पर पहुंच सकेंगे ? नई शिक्षा नीति में शिक्षा के वैश्वीकरण की बात की जा रही है, तो प्रश्न यह उठता है कि क्या मातृभाषा से पढ़े हुए बच्चे इन विश्वविद्यालयों में पढ़ पाएंगे ? अभी शिक्षा नीति मैं व्यापक स्तर पर नीति निर्देश हैं। आगे चलकर इसका स्वरूप तैयार होगा। ‘वैश्विक हिंदी सम्मेलन’ ने पहल करते हुई इस दिशा में एक अच्छी शुरुआत की है। यह उचित होगा कि ‘वैश्विक हिंदी सम्मेलन’ द्वारा इस संबंध में विभिन्न शंकाओं और सुझावों को सरकार के सामने रखा जाए।

मुंबई विश्वविद्यालय के बोर्ड ऑफ स्टडीज के पूर्व अध्यक्ष एवं ‘महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी’ के पूर्व अध्यक्ष डॉ शीतला प्रसाद दुबे ने अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में कहा कि आज शिक्षा ज्ञान का माध्यम ही नहीं बल्कि उससे पहले आजीविका का माध्यम है। केंद्रीय विद्यालय, नवोदय विद्यालय, राज्य सरकारों के ओर महानगरपालिकाओं के विद्यालय, अनुदानित और गैर अनुदानित विद्यालयों द्वारा शिक्षा प्रदान की जाती है। मुंबई में सरकारी स्कूलों में जनसंख्या के अनुसार विभिन्न भाषा माध्यमों में शिक्षा दी जाती है, वहां सब कुछ निशुल्क होता है लेकिन इसके बावजूद भी वहां कोई जाना नहीं चाहता क्योंकि हर कोई उसमें स्टेटस नहीं पाता। ‌ दूसरी तरफ चकाचौंध वाले कॉर्पोरेट जैसे विद्यालय हैं। ऐसे में अभी बहुत से प्रश्न अनुत्तरित हैं, क्या होगा और कैसे होगा ? लेकिन शुभ संकेत यह है कि 34 वर्ष तक मातृभाषा पर कभी चर्चा नहीं हुई और अब नई शिक्षा नीति में भाषा, संस्कार और संस्कृति को लेकर बात हुई है। हो सकता है कि आगे चलकर राज्य सरकारों को निर्देश दिए जाएं कि वे भारतीय भाषाओं को ही शिक्षा के माध्यम के रूप में अपनाएँ और रोजगार की दृष्टि से भी इस पर विचार किया जाए। यह उचित समय है कि देश भर में इस समय व्यापक विचार-विमर्श करें । ‘वैश्विक हिंदी सम्मेलन’ द्वारा इस संबंध में की गई पहल सराहनीय है।

पटना से संगोष्ठी में जुड़े वरिष्ठ भाषासेवी, वीरेंद्र कुमार यादव, जो कि हिंदी सलाहकार समिति के सदस्य, और विश्व हिंदी दिवस के प्रस्तावक भी हैं, उन्होंने कहा कि नई शिक्षा नीति मैं मातृभाषा माध्यम से अंग्रेजीराज को समाप्त करने में मदद मिलेगी। देखना यह है कि इसे कितनी कड़ाई से और कैसे लागू किया जाता है ? क्योंकि अभी इन बातों को लेकर काफी असमंजस की स्थिति है। उन्होंने कहा कि देसी ज़बान और निजीकरण की योजना दोनों परस्पर विरोधाभासी हैं। इसमें अनेक व्यावहारिक कठिनाइयां हैं। उन्होंने कहा कि विदेशी विश्वविद्यालयों को आमंत्रित किया जाएगा तो क्या वे हमारी भाषाओं को उचित स्थान और सम्मान देंगे ? एक प्रश्न यह भी है कि अखिल भारतीय सेवाओं के कार्मिक जो जिनका स्थानांतरण होता रहता है, वे अपने बच्चों को किस माध्यम से पढ़ाएंगे? फिर यह कि राज्य सरकारें क्या केंद्र की नीति को स्वीकार करेंगी ? सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि जब शिक्षा-दीक्षा, रोजगार, प्रतिष्ठा और पद अंग्रेजी के पक्ष में रहेंगे तो माता-पिता अपने बच्चों को मातृभाषा माध्यम में कैसे पढ़ाएँगे? उनका कहना था कि इन तमाम बिंदुओं के आधार पर ही मातृभाषा माध्यम का भविष्य निर्भर करेगा। नीति तभी सफल होगी जब इसमें व्यावहारिकता होगी।

कोलकाता विश्वविद्यालय के पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष प्रोफेसर अमरनाथ का कहना था कि यदि नई शिक्षा नीति में मातृभाषा के साथ अंग्रेजी भाषा का विकल्प रहेगा तो कुछ भी नहीं बदलेगा, यथास्थिति ही बनी रहेगी। शिक्षा नीति में ही दो जगह लिखा गया है कि यथासंभव। फिर जब नौकरियाँ अंग्रेजी से मिलेंगी तो कोई क्यों मातृभाषा में जाएगा। किसीको समझाने से कुछ नहीं होनेवाला, यह गलतफहमी है। उन्होंने यह माँग रखी कि सबके लिए एक समान शिक्षा, मुफ्त शिक्षा और केवल प्राथमिक स्तर तक नहीं बल्कि समूची शिक्षा मातृभाषा में दिए जाने की व्यवस्था होनी चाहिए ताकि गांवों की प्रतिभाएँ भी आगे बढ़ सकें। उन्होंने कहा जब तक हम मातृभाषा में पढ़ते थे भारत विश्व-गुरू रहा और ज्ञान-विज्ञान के सभी क्षेत्रों में भारत विश्व में अग्रणी रहा। हमारे बच्चे पढ़ते हैं अंग्रेजी में, सोचते हैं मातृभाषा में, फिर अनुवाद करके लिखते हैं अंग्रेजी में। उनकी आधी जिंदगी तो अंग्रेजी के चक्कर में ही निकल जाती है। कानपुर से राष्ट्रवादी लेखक संघ की राष्ट्रीय संयोजक यशोभान तोमर ने स्वतंत्रता पूर्व भारतीय भाषाओं की स्थिति को प्रस्तुत करते हुए कहा कि 1986 की शिक्षा नीति में कंप्यूटर और वैश्वीकरण की बात करते हुए अंग्रेजी को निरंतर बढ़ाया गया और योदनाबद्ध रूप से मातृभाषाओं के स्थान पर अंग्रेजी को स्थापित किया गया। उन्होंने आशा व्यक्त की कि नई शिक्षा नीति के माध्यम से 1986 से पहले की स्थिति लौटेगी और भारत में मातृभाषा में विद्यार्थियों की पढ़ाई होने लगेगी।

पटियाला से पंजाब विश्वविद्यालय के भाषा -विज्ञान के प्रोफ़ेसर व भारतीय भाषा सेनानी जोगा सिंह विर्क का कहना था मुझे लगता है कि नई शिक्षा नीति से अंग्रेजी और तेजी से आगे बढ़ेगी। अभी 12वीं कक्षा तक विज्ञान मातृभाषा में पढ़ने की व्यवस्था है। लेकिन नई शिक्षा के बाद छठी कक्षा से विज्ञान अंग्रेजी में अनिवार्य रूप से पढ़ाया जाएगा। पहले अंग्रेजी छठी के बाद अंग्रेजी आती थी लेकिन अब तो अंग्रेजी चौथे साल में ही जरूरी हो जाएगी। दूसरी बात यह है कि शिक्षा नीति में दो जगह लिखा है जहां तक संभव होगा। इसका मतलब यह है कि अंग्रेजी माध्यम का विकल्प भी मौजूद रहेगा। जाहिर है इसके कारण अंग्रेजी माध्यम के स्कूल मातृभाषा में नहीं आएँगे। उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय के एक निर्णय की ओर भी ध्यान आकर्षित किया जिसमें कर्नाटक सरकार के मातृभाषा में पढ़ाने के फैसले को उच्च न्यायालय में चुनौती दी गई थी। उच्च न्यायालय में कर्नाटक सरकार के पक्ष में निर्णय दिया लेकिन बाद में सर्वोच्च न्यायालय ने उस निर्णय को पलटते हुए यह कहा कि यह मां-बाप का अधिकार है, वे जिस माध्यम में चाहे बच्चों को पढ़ा सकते हैं। इन सब कारणों से अंग्रेजी का वर्चस्व और अधिक बढ़ेगा। शिक्षा नीति में यह कहा गया है कि बच्चा कम उम्र में ज्यादा भाषाएं सीख लेता है जबकि दुनिया में अंग्रेजी का प्रसार करने वाली संस्था का ऐसा मानना नहीं है, उनका यह मानना है कि 15 साल के बाद बच्चा विदेशी भाषा जल्दी सीखता है। जब भारत के शिक्षा नीतिकारों की भाषा सिखाने के संबंध में जानकारी का स्तर ऐसा होगा तो क्या किया जा सकता है। लेकिन जिस प्रकार अंग्रेजी माध्यम के विद्यालयों का स्तर गिर रहा है और वे लूट के अड्डे बनते जा रहे हैं इसके चलते अनेक लोग अंग्रेजी माध्यम को छोड़कर मातृभाषा माध्यम के स्कूलों की तरफ लौट रहे हैं।

राजभाषा विभाग के पश्चिम क्षेत्र की बांग्ला भाषी उपनिदेशक (कार्ययान्वयन) और वैश्विक हिंदी सम्मेलन की मानद संयोजक डॉ सुस्मिता भट्टाचार्य का कहना था कि पहले हमें उन लोगों से भी बात करनी चाहिए जिन पर यह शिक्षा नीति लागू होनी है, उन्हें कैसी लग रही है ? ज्यादातर विद्यार्थियों ने तो इसका स्वागत ही किया है। कुछ पूर्व विद्यार्थियों ने यहांँ तक कहा है कि काश उनके समय में ऐसी शिक्षा नीति होती। जहाँ तक शिक्षा में मातृभाषा माध्यम लौटने की बात है इस मामले में तस्वीर साफ नहीं है। लेकिन इतना अवश्य है कि यदि अभी मातृभाषा माध्यम नहीं लौटा तो फिर कभी नहीं लौटेगा। इसलिए जन जागरण की आवश्यकता है। विद्यार्थियों के बौद्धिक विकास के लिए मातृभाषा के अलावा कोई अन्य विकल्प भी नहीं है। उन्होंने कहा कि जब मैं विद्यार्थी थी उस समय बंगाल में बांग्ला माध्यम के बहुत अच्छे स्कूल होते थे। ज्यादातर अभिभावक अपने बच्चों को गणित और विज्ञान के लिए मातृभाषा में ही भेजना चाहते थे ताकि उनका इस क्षेत्र में स्वाभाविक विकास हो सके। उन्होंने कहा कि हमारे देश में ज्यादातर राजनीतिक दल किसी मुद्दे को मेरिट के आधार पर नहीं बल्कि इस आधार पर स्वीकार या विरोध करते हैं कि वह किस दल ने रखा है और वे उनके साथ में है या उनके विरोध में। मैं तो यही कहना चाहूंगी कि विद्यार्थियों के हित में तो कम से कम हमें राजनीतिक विरोध की नीति छोड़ कर विद्यार्थी हित की नीति अपनानी चाहिए।

पुणे-महाराष्ट्र से भाषा सेवी अनिल गोरे (मराठी काका) ने महाराष्ट्र के विद्यालयों में मराठी को अपनाने के लिए किए जा रहे कार्यों की जानकारी देते हुए कहा कि नई शिक्षा नीति में विद्यालयों में अंग्रेज़ी अनिवार्य नहीं रहनी चाहिए। उनका कहना था कि उनके प्रयासों से लाखों विद्यार्थी अंग्रेजी माध्यम से मराठी माध्यम की तरफ लौटे हैं। उनका कहना था कि विद्यार्थियों को मातृभाषा की ओर ले जाने के लिए सरकारी नीति से भी ज्यादा माता- पिता को जागृत करने की आवश्यकता है।मल्लपुरम केरल के गणित के शिक्षक और भारतीय भाषा मंच के राष्ट्रीय न्यासी और दक्षिण भारत के संयोजक श्री ए. विनोद का कहना था कि नई शिक्षा नीति से मातृभाषा की अनिवार्यता समाप्त हो जाएगी और बच्चे अंग्रेजी माध्यम के डर से मुक्त हो कर आनन्द से मातृभाषा में पढ़ सकेंगे। नोकरी के क्षेत्र में भी अंग्रेजी की अनिवार्यता समाप्त होगी। भारत गुणवत्ता मातृभाषा की ओर जाएगा।

इंदौर के भाषा-सेवी व ‘वैश्विक हिंदी सम्मेलन’ के उपाध्यक्ष निर्मलकुमार पाटोदी ने कहा कि नई शिक्षा नीति में प्रस्तावित सुधार एक सीमा तक सराहनीय है। किंतु भारतीय भाषाओं को सभी स्तर महत्व देने पर जानबूझकर छोड़ दिया गया है। संविधान के अनुसार शिक्षा नीति लागू करने के अधिकार राज्यों की सरकारों के पास हैं। नीति में स्पष्ट नहीं किया गया है कि यदि राज्यों की सरकारें नीति का पालन नहीं करेंगी, क्या स्थिति बनेगी ? नई शिक्षा नीति को अंतिम रूप देते समय सरकार के मन में भय रहा है कि शिक्षा में भारतीय भाषाओं को समुचित रूप से महत्व दिया गया, तो विपक्षी दल और राज्यों में उनकी सरकारें बड़ी बाधा खड़ी कर देंगे, इसलिए पाँचवीं और आठवीं कक्षा तक मातृभाषा और राज्यों की भाषाओं के लिए ठोस निर्णय न लेते हुए अधकचरापन अपना लिया गया है। संसद में नई शिक्षा नीति प्रस्तुत करने से पहले भारतीय भाषाओं को अपनाने से पहले सभी दलों की सहमति लेने के लिए अविलंब उनके साथ बैठक बुलानी चाहिए। शिक्षा नीति में एक प्रावधान यह किया जाना चाहिए कि शिक्षा का माध्यम उच्चतम स्तर तक देश की सभी मान्यता प्राप्त भाषाओं को बनाया जाए। शिक्षा में भारतीय भाषाओं को महत्व देने के साथ केन्द्र सरकार और राज्यों में भी न्याय और प्रशासन में भारतीय भाषाओं को अपनाने का निर्णय लिया जाए। अंबाला, से सम्मिलित भाषा-सेवी प्रेमचंद अग्रवाल का कहना था कि जब तक रोजगार के क्षेत्र में भारतीय भाषाओं को उचित स्थान नहीं मिलेगा तब तक मातृभाषा में शिक्षा का लाभ नहीं होगा, इसमें सफलता नहीं मिल पाएगी।

पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय की हिंदी विभागाध्यक्ष श्रीमती मंगला रानी ने यह सवाल उठाया कि अन्य राज्यों में रहने वाली विद्यार्थी जिन की भाषा अलग है वे किस प्रकार अपने बच्चों को अपनी मातृभाषा में पढ़ा सकेंगे? बोलियों को मातृभाषा के रूप में अपनाए जाने के संबंध में उन्होंने बताया कि बिहार में उनकी अनेक लोगों से बात हुई है। सबका यही कहना है कि वह बोलियों में नहीं बल्कि हिंदी में पढ़ाना पसंद करेंगे। नासिक से भारतीय स्टेट बैंक में कार्यरत एवं हिंदी सेवी राहुल खट्टी ने इस बात पर चिंता व्यक्त की कि जब गरीब से गरीब अभिभावक भी रोजगार और उच्च शिक्षा के अवसरों को देखते हुए अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम में भेजना चाहते हैं तो ऐसी में मातृभाषा माध्यम से शिक्षा कैसे संभव हो सकेगी ?

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