अंग्रेज़ी भाषा का ज्ञान बौद्धिक क्षमता का निर्धारण नहीं करता

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भारतीय विधिज्ञ परिषद (बार काउंसिल) ने अंग्रेजी के अलावा, भारतीय भाषाओं में राष्ट्रीय विधि विद्यालयों में प्रवेश के लिए संयुक्त विधि प्रवेश परीक्षा (संविप्र परीक्षा या क्लैट) आयोजित करने की व्यावहारिकता का पता लगाने के लिए एक समिति का गठन किया है। भारतीय विधिज्ञ परिषद ने यह कदम दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा प्रथम कौशिक, नवीन कौशिक और अरुण भारद्वाज द्वारा भारतीय भाषाओं में संयुक्त विधि प्रवेश परीक्षा आयोजित करने की माँग पर विचार करने के निर्देश के बाद उठाया है।

याचिकाकर्ताओं को संबोधित एक पत्र में, भारतीय विधिज्ञ परिषद ने भारतीय भाषाओं में संयुक्त विधि प्रवेश परीक्षा आयोजित करने के लिए अपनी सहमति व्यक्त की है और कहा कि “अंग्रेजी भाषा का ज्ञान या अज्ञान बुद्धि, क्षमता, कौशल अथवा समर्पण आदि का निर्धारण नहीं करता है इसलिए, इस परीक्षा को भारतीय भाषाओं में भी आयोजित किया जाना चाहिए।”

वास्तव में बार काउंसिल अंग्रेजी सहित 11 भाषाओं में अखिल भारतीय विधिज्ञ परीक्षा आयोजित करती है। भारतीय विधिज्ञ परिषद ने एक 7 सदस्यीय समिति का गठन किया है जिसमें विधि विद्यालयों के प्रतिनिधि और अन्य हितधारकों को शामिल किया गया है। इस प्रकार देश में क़ानूनी शिक्षा के नियामक के रूप में अपनी भूमिका को स्वीकार करते हुए, भारतीय विधिज्ञ परिषद ने कहा कि वह यह सुनिश्चित करने के लिए कदम उठाएगी कि कोई भी योग्य उम्मीदवार संयुक्त विधि प्रवेश परीक्षा में सम्मिलित होने से वंचित न रहे।

परिषद ने विधि पेशे और विधि शिक्षा के नियामक होने के नाते आश्वासन दिया है कि “उसका सर्वप्रथम मत है कि किसी भी योग्य उम्मीदवार को अंग्रेजी के अज्ञान के कारण संयुक्त विधि प्रवेश परीक्षा देने से वंचित नहीं किया जाना चाहिए।” यह मुद्दा एक बहुआयामी है, जिसमें न केवल यह मुद्दा है कि परीक्षा कितनी भारतीय भाषाओं में आयोजित की जाए, बल्कि विधि विद्यालयों में पाठ्यक्रम की संरचना के बारे में भी विचार किया जाए।

परिषद ने पत्र में लिखा है “एक अन्य पहलू यह है कि देश भर में विधि विश्वविद्यालयों में कितनी भारतीय भाषाओं में सेमिस्टर की परीक्षाएँ आयोजित की जा रही हैं। संयुक्त विधि प्रवेश परीक्षा को उत्तीर्ण करने के बाद अगला अनुरोध हो सकता है कि राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालयों में भी भारतीय भाषाओं में सेमिस्टर परीक्षाएँ आयोजित की जाएँ। वर्तमान में कई विश्वविद्यालयों में अंग्रेजी और राज्य की संबंधित क्षेत्रीय भाषा में परीक्षा आयोजित की जाती है। हालांकि, राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालयों की तुलना अन्य सरकारी संस्थाओं से नहीं की जा सकती है इसलिए इस मुद्दे पर गहन विचार विमर्श आवश्यक है। ”

इसके अलावा, यह सूचित किया गया है कि परिषद द्वारा गठित समिति केवल उन आवेदकों को समायोजित करने के लिए इस वर्ष की संयुक्त विधि प्रवेश परीक्षा को पुनर्निर्धारित करने की व्यावहारिकता पर भी विचार करेगी, जो भारतीय भाषा में परीक्षा देने की इच्छा रखते हैं।

इस मुद्दे के बारे में आगे की योजना शीर्ष अदालत के पास एक शपथ पत्र के माध्यम से रखी जाएगी, क्योंकि संयुक्त विधि प्रवेश परीक्षा के संचालन से संबंधित मामला पहले से ही सर्वोच्च न्यायालय में लंबित है। भारतीय विधिज्ञ परिषद ने कहा है कि समिति में राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालयों के पूर्व और वर्तमान कुलपति, शिक्षाविद और भारतीय विधिज्ञ परिषद के दो सदस्य शामिल होंगे। इस समिति की अध्यक्षता उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश करेंगे।

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।