मेरी बहना

कभी वो दोस्त जैसी है, वो दादी मां भी बनती है
बचाने की मुझे खातिर, वो डांटे मां की सुनती है
अभी सर्दी नहीं आया, वो रखती ख्याल है मेरा
वो मेरी बहना है मेरे लिए स्वेटर जो बुनती है।

कभी लड़ती झगड़ती प्यार भी करती वो कितनी है
जो रखती हाथ सिर पे मां के आशीर्वाद जितनी है
वो बचपन में जो खेला करते थे हम घर के आंगन में
मेरी बहना जो हंसती मिलती मुझको खुशी उतनी है

कभी वो कान खींचें सारी बोले जेब से पैसे निकाले वो
मुझे खुद में छिपाकर डांट से मां की बचा ले जो
वो उसका चीखना चिल्लाना और मुझको चिढ़ाना भी
मेरी बहना फुलाकर गाल पर थप्पड़ जो मारे वो।

चमकती तारों से ज्यादा वो रानी परियों की सी है
चहकती रहती जुगनू सी बगिया की उड़ती तितली है
बजे जब पांव में घुंघरू तो गाने लगता घर आंगन
मेरी बहना के चलने से ये सुर घर में पली सी है।

छुपाकर अम्मा से देती मुझे खुद पास से पैसे
नहीं दुनिया में कोई भी है मेरी बहन के जैसे
कभी नादान बन जाती कभी अन्जान हो जाती
मेरी बहना की गलती पे बचाता उसको मैं वैसे ।

थी सुख में खूब वो हंसती और दुख में आंसू पोंछे है
दिये जो उसने थे पैसे मेरे पाकेट में खोजें है
मेरे रब्बा रहम कुछ करने लायक तो बना दे अब
मेरी बहना पे वारूं दौलतें दुनिया की सोचें हैं।

जो बाहर से कभी आऊं वो पानी ग्लास का लेकर
लो भैया पी लो पानी कहती मीठा हाथ में देकर
वो रखती ख्याल कितना रह ना पाऊंगा बिना उसके
मेरी बहना गई ससुराल जो हमसे जुदा होकर।

हैं तेरा शुक्रिया पल पल नहीं भूलेंगे तुझको हम
रहे तू दूर भी चाहें ये अपना प्यार ना हो कम
हुआ ‘एहसास’ जाने से तेरे सब खो गया जैसे
मेरी बहना न भूलेंगे तेरा अहसान जब तक दम।

  - 

अजय एहसास
अम्बेडकर नगर (उ०प्र०)

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