भुवनेश्वर यात्रा संस्मरण (भाग 7) इंफोसिस कैंपस

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भुवनेश्वर यात्रा के दौरान एक पूरा दिन इंफोसिस के नाम रहा।

चमचमाती सड़क और करीने से सजे हरे भरे पेड़ों के बीच पानी के जहाज की आकृति का शानदार भवन, भव्य प्रवेश द्वार, खूबसूरत स्वीमिंग पुल, इंडोर स्टेडियम, फूड कोर्ट और लाइब्रेरी… सब कुछ सुंदर और व्यवस्थित…

देश की यह अग्रणी आईटी कंपनी जहां अपने भव्य इंफ्रास्ट्रक्चर और विश्वस्तरीय तकनीकी सेवाओं के लिए जानी जाती है वहीं पर्यावरण संरक्षण के इसके मौलिक सिद्धांत भी बेहद प्रभावित करते हैं।

देश में तकनीकी विकास जितना जरूरी है पर्यावरण के बारे में चिंता किया जाना भी उतना ही जरूरी है। इंफोसिस के केंद्र देश में तकनीकी विकास के साथ पर्यावरण संरक्षण का बेहतरीन उदाहरण हैं।

इस मामले में वर्तमान और भविष्य की चुनौतियों की चिंता करते हुए इंफोसिस के संस्थापक श्री एन आर नारायणमूर्ति ने पर्यावरण संरक्षण को इंफोसिस के मूल उद्देश्य के साथ जोड़ा। आगे पूरे देश में जहां भी इसके केंद्र स्थापित हुए पर्यावरण को ध्यान में रखा गया और इसके लिए हर संभव उपाय किये गए।

मंगलुरु कैंपस भी एक सुंदर उदाहरण है जहां रेन वॉटर हार्वेस्टिंग के जरिये बारिश का पानी इकट्ठा कर आसपास के 360 एकड़ में फैले विशाल परिसर की बंजर जमीन को एक हरे भरे जंगल में बदल दिया गया।

कंपनी ने बस पेड़ लगाये और प्रकृति को अपना काम करने के लिए छोड़ दिया जिसका नतीजा वहां हरे भरे जंगल के रूप में देखा जा सकता है।

यह वाकई एक शानदार मिसाल है जिससे हम सब को सीख लेनी चाहिए और कोशिश करनी चाहिए कि हम सिर्फ पर्यावरण समस्या पर अफसोस न जताएं बल्कि इसके लिए कुछ काम करें… ज्यादा से ज्यादा पेड़ लगाएं।

श्री नारायणमूर्ति की पत्नी श्रीमती सुधा मूर्ति भी इंजीनियर होने के साथ साथ एक सामाजिक कार्यकर्ता, एक संवेदनशील शिक्षक तथा एक कुशल लेखिका हैं। पद्मश्री से सम्मानित हैं। इंफोसिस फाउंडेशन का चैरिटी फंड संभालती हैं और उनकी पूरी कोशिश होती है कि फंड का सही जगह पर इस्तेमाल हो और जरूरतमंद को मिले। हाल ही में ‘कौन बनेगा करोड़पति’ में सुधा मूर्ति जी आई थीं। उनके कार्य इस पीढ़ी के लिए प्रेरणादायक हैं।

पिछले वर्ष मई में मैसूर यात्रा के दौरान वहां के इंफोसिस कैंपस में कुछ दिन रुकने और उसकी कार्य संस्कृति को जानने समझने का मौका मिला था। वहां के ‘स्टेट-ऑफ-द-आर्ट लाइब्रेरी’ ने मेरी पाँचवी किताब ‘कोई एक आशियाँ’ को अपने संग्रह में शामिल किया था…

क्रमशः

#डा. स्वयंभू शलभ

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।