ग्रामीण पत्रकारिता के स्तंभ का ढह जाने जैसा है डॉ एन आर गोयल का निधन

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जिस समय ग्रामीण पत्रकारिता का कहीं नामोनिशान नहीं था, उस समय सहकारिता
विभाग की नौकरी छोड़कर डॉ एन आर गोयल ने ग्रामीण पत्रकारिता का चुनौती
भरा मार्ग अपनाया और ‘ग्रामीण जनता ‘समाचार पत्र के माध्यम से उत्तर
प्रदेश व उत्तराखंड में गरीबों ,किसानों , मजदूरों और शोषितों की आवाज
बनने का काम किया। वह ऐसा समय था, जब गांव तक पहुंचना एक पत्रकार के लिए
आसान नहीं होता था । ग्रामीण क्षेत्र की खबरों को खोजकर लाने के लिए बड़ी
बड़ी चुनौतियां और संघर्ष करने पड़ते थे । गांव की राजनीतिक पार्टी बाजी
, विकास के नाम पर भ्रष्टाचार और संसाधनों की कमी के कारण ग्रामीण
पत्रकारिता शहरी पत्रकारिता से कहीं अधिक कठिन रही है लेकिन इस चुनौती को
डॉक्टर गोयल ने खुले रूप में स्वीकार किया और सन 1973 के दौर में ग्रामीण
जनता साप्ताहिक समाचार पत्र का रुड़की से प्रकाशन करके उसको तत्कालीन
उत्तर प्रदेश के 22 जनपदों चक प्रसारित किया आज वही पत्र उत्तराखंड में
भी अपना खास स्थान रखता है। ग्रामीण जनता की शासन प्रशासन और राजनीतिक
गलियारों में कभी तूती बोलती थी। मुझे इस समाचार पत्र में डॉ एन आर गोयल
के सानिध्य में लंबे समय तक काम करने का अवसर मिला।मैंने देखा है,
ग्रामीण जनता समाचार कार्यालय पर उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री
हेमवती नंदन बहुगुणा से लेकर उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव , बड़े-बड़े
दिग्गज पत्रकार , मंत्री ,सांसद,विधायक और बड़ी-बड़ी हस्तियां दस्तक देती
रही ।डॉक्टर गोयल ने अपने पत्रकारिता के जीवन में कभी मूल्यों से समझौता
नहीं किया मिशनरी पत्रकारिता उनका धैय रही। मैंने पत्रकारिता के क्षेत्र
में उनकी उंगली पकड़कर चलना सीखा है । सच पूछिए तो कई बार ऐसे अवसर आए जब
उन पर सच छपी खबरों को खंडित करने के लिए बड़े-बड़े दबाव आए ,उन्हें
प्रलोभन भी मिले लेकिन उन्होंने कभी ग्रामीण जनता समाचार पत्र में ऐसी
खबरों का खंडन नहीं किया और बड़े से बड़े लोगों प्रलोभन को ठुकरा दिया
था।बतौर ग्रामीण जनता के समाचार संपादक वे मुझे मानदेय भी देते थे लेकिन
उतना जिससे मेरा खर्च पूरा हो जाये, यही कारण है कि उन्होंने हमेशा मुझे
बगैर धनराशि भरे ही चैक दिया और बोलते थे,बेटे तुम्हे जितने पैसों की
जरूरत हो भर लेना।एक बार एक जिलाधिकारी ने उन्हें एक कार खरीद कर देने की
ऑफर दी थी,गोयल साहब बोले,कार तो आप दे देंगे लेकिन तेल कौन दिलवाएगा।इस
पर जिलाधिकारी ने तेल की व्यवस्था करने की भी हामी भरी परन्तु गोयल साहब
बोले डीएम साहब आप रहने दो,मैं अपने स्कूटर पर ही ठीक हूं।डॉ एन आर गोयल
की आध्यात्मिक सोच बहुत ऊंची थी,उनके शंकराचार्य, महामंडलेश्वर, महंतो,
सन्तो,महात्माओ से निकट सम्बंध रहे।स्मामी कल्याण देव तो उनके खासे मुरीद
थे,स्वामी सत्यमित्रानंद, पथिक जी महाराज का सानिध्य उन्हें और पूरे
परिवार को मिलता रहा है।उनके घर लम्बे समय तक रामायण का पाठ होता
रहा,धर्मालयो में जाना और उनकी गतिविधियों की खबर देना उन्हें अच्छा लगता
था।उनके जीवन मे उनके कई एक्सीडेंट हुए,कई बार गम्भीर रूप से बीमार पड़े
लेकिन हर मुसीबत को उन्होंने सहजता, धैर्य ओर कर्मठता से किया।वे तीखा भी
बहुत लिखते थे,लेकिन दिल से बहुत विन्रम,संवेदनशील, रहमदिल इंसान रहे।86
वर्ष की आयु होने पर भी पत्रकारिता में सक्रिय बने रहना कोई उनसे सीख
सकता था।उनके जाने से जहां मैंने अपना अभिभावक खो दिया है वही यह ग्रामीण
पत्रकारिता के एक बड़े स्तंभ के ढह जाने जैसा भी है जिसकी पूर्ति नही की
जा सकती।उन्हें मेरा शत शत नमन।
# डॉ श्रीगोपाल नारसन एडवोकेट

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