मुझे राहत नहीं
निजात दिला दो
कोई तो सदा के लिए
बाढ का हल बता दो।
विज्ञान के इस युग में
कैसी यह नीति है
अचानक बाढ़ आ जाती
सिस्टम सोती रहती है।
सबकुछ बहा ले गया
जो तिनका-तिनका जोड़ा
प्रलंयकारी बाढ में अबतक
न जाने कितनों ने दम तोड़ा।
हर वर्ष दावे लाख मगर
नहीं होता कोई असर
बारिस आते ही सिर्फ
बाढ़ ढाती कहर-बस-कहर।
क्या क्या न सहना पड़ता
हर वक्त मौत के आगोश में रहना पड़ता
भोजन पानी और आवास के अभाव में
साँप विच्छु के संग भी रहना पड़ता।
वारिस आती भींगा जाती
धूप निकलती सूखा जाती
बाढ़ के इस दंश में
निर्दयी की भी आँसू निकल आती।
भूख प्यास से व्याकुल
टकटकी लगाये रहते है
पहले जान फिर पेट का ध्यान
में कितने रोज भूखे सो जाते हैं
कई सालो की कमाई
अन्न कपडे बह ले जाती
पानी खिसकने के बाद
अनेक रोग और मुसीबत दे जाती।
“आशुतोष”
नाम। – आशुतोष कुमार
साहित्यक उपनाम – आशुतोष
जन्मतिथि – 30/101973
वर्तमान पता – 113/77बी
शास्त्रीनगर
पटना 23 बिहार
कार्यक्षेत्र – जाॅब
शिक्षा – ऑनर्स अर्थशास्त्र
मोबाइलव्हाट्स एप – 9852842667
प्रकाशन – नगण्य
सम्मान। – नगण्य
अन्य उलब्धि – कभ्प्यूटर आपरेटर
टीवी टेक्नीशियन
लेखन का उद्द्श्य – सामाजिक जागृति