नहीं सुने वो सब गुने

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sandeep srajan

सुख से सम्बन्धित बातें तो बहुत सारी की जा सकती हैं लेकिन कुछ बातें अनुभव की करी जाए तो उसका आनंद अलग है । लोग कहते है कि आंखों देखी और कानों सुनी बात में ज़मीन और आसमान का अंतर आ जाता है, लेकिन आज जो बात है वो अनुभव की बात है । वो ज़मीन और आसमान के बीच की बात है, इसमें आंख और कान दोनों गवाह है पर मुंह कुछ कहने की स्थिती में नहीं है । विद्ववानों ने इस संसार के लिए सात सुख बताएं हैं । ये वे सात सुख है जो रहे तो मनुष्य के जीवन में जीने के लिए उत्साह बना रहता है। लेकिन सात को छोड़ दे तो आठवां सुख सब पर भारी हैं, जिसे लाख दुखों की एक दवा भी कह दो तो कोई आश्चर्य नहीं होगा। इस सुख का आनंद व्यक्ति खुद ले सकता है और दूसरे को जी भरके चिढ़ा सकता है । वो सुख है बहरा होने का सुख ! जी हॉ बहरा होने का सुख !!

आप अभी अच्छे से सुन रहे है तो आपको बहरा होना सुख नहीं समस्या लगता है, एक बार जानबूझ कर बहरा हो जाएँ, फिर देखिए ,क्या मजा आता है । बरसात के दिनों में ठंडी हवा के साथ सर्दी के कारण कानों में बहरापन आना कईं लोगों के साथ होता है । जब आदमी बहरा हो जाता है तो सबसे पहली चिंता पत्नी को होती है, जो आपकी उपस्थिती में दिन रात नॉनस्टाप बोलती रहती है,और आप सुनते रहते है, आपके बहरे होने पर वो बोलने से पहले सौ बार सोचेंगी कि अब उसकी सुनेगा कौन? घर में शांति का वातावरण । पत्नी और बच्चों की फरमाइश बंद । कहेंगे ये सुनते तो है नहीं , इनसे सिर खपाने की बजाए खुद ही अपनी जरुरत की चीज ले आओ । आपका टेंशन खत्म ।

ऑफिस में पहुंचों और बॉस कुछ बोले और न सुनाई दे तो एक -दो बार वो खीज़ कर बोलेगा लेकिन जब पता चलेगा की आप बहरे हो गये है तो केवल जरुरी काम पर्ची पर लिख कर देगा, आवाज लगाकर नहीं बुलाएगा, सोचेगा इस बहरे को काम बताने के बजाए किसी दूसरे को काम दे दूँ ताकि दिमाग का दही नहीं हो।

बाज़ार में जाओ तो लोग पहले तो सामान्य स्वर में आपके प्रश्न का उत्तर देंगे जब आप हे..हे करेंगे तो जोर से बोलेगें आप ने कहॉ ठीक तो ठीक वरना चीखते हुए बोलेंगे और अड़ोस-पड़ोस के लोग उसे देखेंगे आपको नहीं और कहेंगे इतनी जोर से क्यों बोल रहे है ।फिर वो इशारे में आपको समझाने की कोशिश करेगा और समझा भी देगा ।

राजनीति करने वाले हमारे आदरणीय नेतागण तो बहरे हो कर ही राजनीति में प्रवेश करते है ।वे केवल बोलते हैँ, सुनने की क्षमता तो वे पुरी तरह खो चुके है । चुनाव के पहले और चुनाव के बाद कितने ही आरोप-प्रत्यारोप लगे वे सब कुछ अगल-बगल से निकाल देते है। जब पानी सिर से उपर निकलने लगता है तो कोई चमचा बंद कमरें में कुछ इशारों में नेताजी को समझाता है और नेताजी समझ जाते है । लेकिन वे बहरे ही रहना पसंद करते है। उनको पता है जो बात वे सुनेंगें उसका जवाब देना होगा। याने जो नहीं सुने वो सब गुने। अगर आप भी गुणवान बनना चाहते तो बहरे बन कर जीवन में आठवें सुख का आनंद लिजिए।

#संदीप सृजन

उज्जैन

 

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।