हिंदी भाषा के प्रचार में भारतीय मीडिया की भूमिका

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” गुलदस्ता फूलों का बंधन है
तो भाषा भावों   का”
किंतु पत्रकारिता पत्र-पत्रिकाओं के लिए समाचार लेख आदि एकत्रित तथा संपादित करने प्रकाशन आदेश आदि देने का कार्य करने हेतु है,
डॉ बद्रीनाथ कपूर
तो पत्रकारिता का इतिहास यही कहता है की पत्रकारिता का प्रारंभ सरकारी नीतियों को आम जनता तक पहुंचाने व समसामयिक घटनाओं की जानकारी पहुंचाने हेतु हुआ।
नेपोलियन ने माना था कि चार विरोधी अखबारों की मारक क्षमता हजारों बंदूकों की क्षमता से ज्यादा होती है।
माखनलाल चतुर्वेदी ने कर्मवीर के संपादकीय में लिखा था अन्य उपकरणों की अपेक्षा राष्ट्र संगठन के पत्र ज्यादा उपयोगी होते हैं।
सर्वप्रथम प्रेस को जनता के प्रतिबिंब स्वरूप में प्रस्तुत करने वाला बर्किंघम ही था इसीलिए बर्किंघम का और हिक्की का पत्रकारिता के इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान है। महात्मा गांधी ने भी लोकतंत्र के स्थायित्व हेतु पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ मानने में अपनी स्वीकृति दी थी।
वर्तमान युग पूरी तरह संचार और सूचनाओं पर आधारित है यह भी दुर्भाग्यपूर्ण है कि कुछ पूंजीपति इनकी कला को खरीदने में कामयाब रहे हैं और लोग बिकने में जिसके कारण आज भी प्रभाव शुरू प्रिंट मीडिया व पत्रों में सत्ता लोलुप राजनीति दायित्व हीनता व अनर्गल प्रचार व नकारात्मक छवि समाज और देश के सामने पेश हो जाती है यह ठीक नहीं है जातिगत क्षेत्रवाद या धर्म बात की विदेश की भावना को जागृत करना तो पत्रकारिता का लक्ष्य हरगिज़ नहीं होना चाहिए।
किंतु जहां तक प्रश्न है हिंदी के प्रचार प्रसार में मीडिया की भूमिका का तो एक प्रकार से देखा जाए तो आज के युग को हिंदी मीडिया के युग के रूप में परिभाषित करना अनुचित ना होगा क्योंकि हिंदी की सर्वो परिता व 50 करोड़ लोगों से ज्यादा बोली जाने वाली विश्व की तीसरी भाषा की ताकत को भापकर मीडिया वालों ने इसका सम्मान किया और ज्यों-ज्यों इंटरनेट और मोबाइल ने हिंदी को अपनाया तिथियों हिंदी यूनिकोड हुई और ब्लॉगिंग फल फूल उठा लिखने वालों की संख्या बढ़ने लगी और सोशल साइट पर हिंदी को छाने से कोई रोकना सका।
अंग्रेजी का गुणगान करने वाले गूगल के हिंदी सपोर्ट को देख बगले झांकने लगे आज भारतीयों में हिंदी में इंटरनेट के उपयोग की संख्या में उत्तरोत्तर वृद्धि हो रही है और हिंदी राजभाषा के बाद अब वैश्विक भाषा बनने की ओर तीव्रता से अग्रसर है।
यही कारण है कि सिर्फ अपने देश ही नहीं विदेशों में भी हिंदी के पठन-पाठन के महत्व को समझा जा रहा है और इसमें हमारे हिंदी फिल्म उद्योग का बड़ा योगदान है जिनके फिल्मों के हिंदी गाने व संगीत की कशिश विदेशियों को हिंदी ज्ञानार्जन की ओर आकर्षित कर रही है।
पत्र-पत्रिकाओं में भी हिंदी में अपने कदम उत्तरोत्तर विकसित किए हैं और इनकी तादाद बढ़ती ही चली गई टीवी सीरियल भी हिंदी के प्रचार-प्रसार की भूमिका में महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर रहे हैं उनकी भूमिका को बिल्कुल अनदेखा नहीं किया जा सकता विशेषकर ग्रामीण वर्ग में जहां क्षेत्रीय भाषाओं के असर के चलते हिंदी कमजोर पड़ जाती थी वहां अब प्रतिदिन के डेली सोप व अन्य मनोरंजक कार्यक्रमों को देखने व समझने के साथ साथ ग्रामीणों की रुचि व समाज दोनों ही हिंदी के प्रति बढ़ गई है और वे हिंदी कार्यक्रम के माध्यम से अपने हिंदी ज्ञान को विस्तार दे रहे हैं यह मीडिया की उसके प्रचार-प्रसार के सहयोग का एक और बड़ा उदाहरण।
हिंदी समाचार पत्रों की संख्या भी दिनोंदिन बढ़ती जा रही है जनसत्ता प्रभात खबर राजस्थान पत्रिका सब इन्हीं प्रयासों के चलते आज हिंदी के सिरमौर बने हुए हैं यह सब मीडिया के प्रचार-प्रसार का ही असर है कि गैर हिंदी  भाषी भी आज हिंदी कार्यक्रमों में बराबर की रुचि ले रहे हैं इसके लिए वे हिंदी सीखने का भी प्रयास कर रहे हैं।
 मीडिया भी आज कारपोरेट के जगत से ऊपर उठकर गरीबों की झोपड़ी तक पहुंच चुका है वह दृश्य मीडिया के माध्यम से वह समाज में फैली हुई उस विकृति को भी सामने ला रहा है जिसका विरोध लाजिमी है।
आज हिंदी की लोकप्रियता उसे व्याकरणिक बंधनों से मुक्त कर आम जनता की जुबान का जामा पहनाने के कारण ही बढ़ी है और अंग्रेजी, देशज शब्द व अन्य कई क्षेत्रीय शब्दों को सहज रूप से अपनाने के कारण आज हिंदी का परिवार बड़ा होता गया है।
मीडिया भी इस बात से अनजान नहीं है कि प्रचार प्रसार का माध्यम जितना सहज सरल होगा उतना ही ग्राहक भी तभी तो इस तरह मीडिया ने समय और जनता की मांग को समझते हुए विभिन्न कार्यक्रमों के माध्यम से समाचार पत्रों के माध्यम से हिंदी भाषा को एक नया आयाम देने व उसके विस्तार में महती भूमिका अदा करने का जो प्रण लिया उसमें वह आगे बढ़ता जा रहा है।
यही कार्य पहले भी हमारे समाज सुधारक गुरु कबीर नानक व अन्य कर चुके थे क्योंकि
 उन्हें भी इस बात का आभास था कि देश में सबसे ज्यादा विस्तृत व अनुकरणीय हिंदी भाषा ही है इसीलिए ज्यादातर उनके उपदेश उनकी रचनाएं हिंदी में ही हुआ करती थी।
पत्र-पत्रिकाओं और प्रेस को समाज से जोड़ने का काम बंगाल में राजा राममोहन राय ने किया क्योंकि तात्कालिक कुप्रथा बाल विवाह सती प्रथा इत्यादि पर कुठाराघात करने का यही सशक्त माध्यम था तो उस समय भी मीडिया ने अपने हिसाब से हिंदी के प्रचार प्रसार में प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष सशक्त भूमिका निभाई।
आज हिंदी भाषा में मीडिया के योगदान विषय पर अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन इस बात का प्रमाण है कि लोग हिंदी के प्रचार प्रसार में उसकी सशक्त भूमिका को समझ रहे हैं
एक ऐसी ही संगोष्ठी में बतौर मुख्य अतिथि के रूप में आर्य ने कहा-, हमें अपनी भाषा पर गर्व होना चाहिए भाषा को लेकर हमारी सोच ही उसके विकास में बाधक है,।
और मैं इस बात से पूरी तरह सहमत हूं कि आजकल आधुनिकता का पर्याय अंग्रेजी को ही मानकर बच्चों की शिक्षा-दीक्षा हेतु अंग्रेजी माध्यम की शालाओं में प्रवेश दिलाने हेतु होड़ लगी रहती है जो उनकी प्रतिष्ठा का विषय भी बनी हुई है।
हम भारतीय हैं हमें हिंदी ना आने पर शर्म महसूस होनी चाहिए किंतु एक वर्ग ऐसा भी है जो इसे आधुनिकता का प्रतीक मानकर उसका सम्मान करता है भारतेंदु जी की उसी को धता बताते हुए कि, निज भाषा उन्नति आ है,सब उन्नति को मूल,
किंतु शुक्र है भारतीय मीडिया इस बात का अक्षर रक्षा पालन करता हुआ हिंदी के प्रचार-प्रसार व पठन लेखन की ओर लोगों की जागरूकता लाने में पूरी तरह प्रयत्नशील है।
देसी नहीं हिंदी के पांव विदेश में जमा कर उसने यहां प्रमाणित भी कर दिया है कि हिंदी के इतने व्यापक प्रचार-प्रसार में उससे सरल सहज बना कर आम जनता की भाषा के रूप में उभरकर वही एकमात्र दावेदार है प्रचार प्रसार में अपनी भूमिका के सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शनका।
इसका प्रमाण हमें बैंकों व सरकारी कार्यालयों में हिंदी का प्रयोग हिंदी दिवस मनाने उस दिन आयोजित होने वाले विभिन्न निबंध कहानी कविता जैसी प्रतियोगिताओं के रूप में भी देखने को मिलते हैं इन सबके अलावा आजकल व्हाट्सएप और फेसबुक के जरिए विभिन्न संस्थाएं जैसे मातृभाषा का हिंदी साहित्य मंच वर्तमान अंकुर अन्य सामाजिक एनजीओ हैं जो समाज के कल्याण के साथ साथ हिंदी के प्रचार-प्रसार हेतु विभिन्न प्रतियोगिताएं आयोजित करती हैं और युवा रचनाकारों को मंच देकर उनके हिंदी लेखन के उत्साह में वृद्धि करती हैं जिससे वे अपनी भाषा में साहित्य सर्जन कर भाषा की समृद्धि में योगदान की भागीदारी कर सकते हैं।
अंतता यही कहा जा सकता है कि आज के इंटरनेट गूगल के युग में मीडिया ने अपनी राजभाषा हिंदी के प्रति अपनी जिम्मेदारी पूरी इमानदारी से निभाई है और वह इस सम्मान की पूर्णतया हकदार है और उसने पता पत्रकारिता के भविष्य को उज्जवल किया है
वह समाज व देश में व्याप्त बुराइयों पर से पर्दा हटा कर समाज से अलग-थलग व्यक्तियों को भी मुख्यधारा से जोड़ने में सक्षम हुआ है चाहे वह विकलांग वर्गो कुष्ठ रोगी हो या किन्नर प्रजातियां यह सब वर्तमान मीडिया के प्रचार-प्रसार से लाभान्वित है
अंततः यही कहा जा सकता है कि भारतीय मीडिया प्रचार प्रसार में हिंदी भाषा के प्रचार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
#रश्मिलता मिश्रा

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’

29 अप्रैल, 1989 को मध्य प्रदेश के सेंधवा में पिता श्री सुरेश जैन व माता श्रीमती शोभा जैन के घर अर्पण का जन्म हुआ। उनकी एक छोटी बहन नेहल हैं। अर्पण जैन मध्यप्रदेश के धार जिले की तहसील कुक्षी में पले-बढ़े। आरंभिक शिक्षा कुक्षी के वर्धमान जैन हाईस्कूल और शा. बा. उ. मा. विद्यालय कुक्षी में हासिल की, तथा इंदौर में जाकर राजीव गाँधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के अंतर्गत एसएटीएम महाविद्यालय से संगणक विज्ञान (कम्प्यूटर साइंस) में बेचलर ऑफ़ इंजीनियरिंग (बीई-कंप्यूटर साइंस) में स्नातक की पढ़ाई के साथ ही 11 जनवरी, 2010 को ‘सेन्स टेक्नोलॉजीस की शुरुआत की। अर्पण ने फ़ॉरेन ट्रेड में एमबीए किया तथा एम.जे. की पढ़ाई भी की। उसके बाद ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियाँ’ विषय पर अपना शोध कार्य करके पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। उन्होंने सॉफ़्टवेयर के व्यापार के साथ ही ख़बर हलचल वेब मीडिया की स्थापना की। वर्ष 2015 में शिखा जैन जी से उनका विवाह हुआ। वे मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं और हिन्दी ग्राम के संस्थापक भी हैं। डॉ. अर्पण जैन ने 11 लाख से अधिक लोगों के हस्ताक्षर हिन्दी में परिवर्तित करवाए, जिसके कारण वर्ल्ड बुक ऑफ़ रिकॉर्डस, लन्दन द्वारा विश्व कीर्तिमान प्रदान किया गया।