हिन्दी भाषा के प्रचार में भारतीय मीडिया की भूमिका*

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radha goyal
मीडिया देश का चौथा स्तम्भ माना जाता है। वह चाहे तो देश के लिए नकारात्मक प्रचार भी कर सकता है और चाहे तो सकारात्मक भूमिका भी निभा सकता है। मीडिया ही है जो सरकार से देश के हित के लिए उचित कानून बनवाने में योगदान दे सकता है।आज विलुप्त होती हिंदी भाषा के प्रचार और प्रसार की बहुत आवश्यकता है।  व्हाट्सएप ग्रुप इसके माध्यम से अपना योगदान दे रहे हैं किंतु वह काफी नहीं है। इसमें सोशल मीडिया व प्रिंट मीडिया को अपनी प्रमुख भूमिका निभानी पड़ेगी। अखबारों के माध्यम से इस बात का प्रचार करना होगा कि *देश में ऐसे हिंदी अनुवादकों की बहुत अधिक आवश्यकता है जिन्हें कम से कम दो भाषाओं का समुचित ज्ञान  हो और जो देश विदेश के साहित्य का हिन्दी भाषा में अनुवाद कर सकें, जिसके लिये उन्हें समुचित पारिश्रमिक दिया जाएगा।*
*यह प्रचार भी होना चाहिए कि… जरूरत है ऐसे गाइड की जो इतिहास की अच्छी जानकारी रखते हों और हिन्दी के साथ-साथ अंग्रेजी व प्रादेशिक भाषाएँ  पढ़ व बोल सकते हों।अहिन्दी भाषी राज्यों में उनके लिये अपार संभावनाएँ हैं।*
इसके लिये रोज दूरदर्शन पर विज्ञापन देना होगा।समाचारपत्र में नौकरी के लिये आवेदन माँगे जायें जिसमें उचित वेतन भत्ते शामिल हों।उचित वेतन भत्ते मिलने पर ही लोग इस काम को करने के लिये इच्छुक होंगे।सभी माता-पिता व बच्चों का एक ही लक्ष्य होता है…पढ़ लिखकर अच्छी नौकरी पाना।अच्छा वेतन मिलेगा तो युवा पीढ़ी अवश्य इस तरफ आकर्षित होंगी।प्रतिभा पलायन भी रूकेगा और हिन्दी का विकास भी होगा।इसके साथ ही यह भी प्रचारित किया जाए कि कार्यालय में जो व्यक्ति हिन्दी में पत्र व्यवहार करेगा,उसे अतिरिक्त प्रोत्साहन राशि दी जाएगी।उससे एक स्वस्थ प्रतियोगिता भी स्थापित होगी।
यह विज्ञापन भी दिया जाए कि *जरूरत है ऐसे अनुवादकों की,जिन्हें एक से अधिक भाषाओं का ज्ञान है। उम्र का कोई बंधन नहीं है।वे घर बैठे भी यह काम कर सकते हैं।अनुवादक को मूल प्रति नहीं, उसकी प्रतिलिपि दी जाएगी।अनुवादक को उसकी मेहनत का उचित मूल्य मिलेगा।चाहें तो विज्ञापन में  प्रति पृष्ठ की राशि भी तय कर दी जाए।*
बहुत से वृद्ध लोगों को भी घर बैठे ही रोजगार और समय बिताने का साधन मिल जाएगा।उसके नाम को भी पहचान मिलेगी।
बहुत से ऐसे लोग हैं जिन्हें हिन्दी के साथ-साथ अन्य भाषाओं का ज्ञान है।जब लोग ये विज्ञापन पढ़ेंगे तो बहुत से लोग हिंदी भाषा को सीखने के लिए लालायित होंगे और बहुत से माता-पिता अपने बच्चों को हिंदी सीखने के लिए प्रेरित भी करेंगे।केवल मीडिया ही यह संदेश दे सकने में सक्षम साबित हो सकता है कि देश में और विदेशों में हिंदी सिखाने वाले अध्यापकों की बहुत जरूरत है।अखबार में सम्पादकीय लिखने वाले इस काम को अंजाम तक पहुँचाने में कामयाब हो सकते हैं।
प्रिन्ट मीडिया सरकार को भी ऐसा कानून पारित करने के लिए बाध्य कर सकता है जिसमें हिंदी ऐच्छिक विषय नहीं, अपितु अनिवार्य विषय हो। त्रिभाषा फार्मूला लागू है, लेकिन अंग्रेजी अनिवार्य विषय के रूप में है, जबकि हिंदी अनिवार्य विषय के रूप में होनी चाहिए। बाकी दो भाषाएँ  वैकल्पिक होनी चाहिएँ। कोई कितनी भी भाषाएँ सीखे, उस पर कोई पाबंदी नहीं है, लेकिन अपनी ही भाषा न आती हो, यह बड़ा शर्मनाक है। हिन्दी को उसका खोया गौरव दिलाने में मीडिया ही सार्थक और सशक्त भूमिका निभा सकता है।अन्य हिन्दी प्रेमी तो अपने अपने स्तर पर प्रयास कर ही रहे हैं।
*कम से कम बारहवीं कक्षा तक हिन्दी भाषा को अनिवार्य* और बाकी दो भाषाओं को वैकल्पिक किया जाएगा ,तब ही इस समस्या का समाधान संभव है और इसमें मीडिया का योगदान बहुत महत्व रखता है।

#राधा गोयल

परिचय-

नाम:-     राधा गोयल 
पति का नाम:- श्याम सुंदर गोयल
निवास स्थान:-नई दिल्ली-110018
शिक्षा- स्नातक

संक्षिप्त परिचय: —
          हमारे परिवार में लड़कियों को ज्यादा पढ़ाना ठीक नहीं समझा जाता था। आठवीं कक्षा तक सरकारी स्कूल में पढ़ाई की। आगे पढ़ने के लिए लगातार एक महीने तक खुशामद करने के पश्चात पत्राचार माध्यम द्वारा पंजाब विश्वविद्यालय से मैट्रिक की परीक्षा दी व प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण हुई। फिर पढ़ाई की बंदिश; किंतु पढ़ने की ललक के कारण मैंने भी हठ पकड़ ली और पत्राचार माध्यम द्वारा ही पंजाब यूनिवर्सिटी से सन 1964 में हायर सेकेंडरी की परीक्षा दी तथा पूरी दिल्ली में टॉपर रही।आगे पढ़ने की बिल्कुल भी इजाजत नहीं मिली।
       लेखन के प्रति बचपन से ही रुचि थी, लेकिन मेरा यह शौक किसी को भी पसंद नहीं था। 1970 में सात बहन भाइयों के मध्यम वर्गीय परिवार में विवाह हुआ।ससुर का देहांत 1965 में हो चुका था।पति परिवार में सबसे बड़े हैं।परिवार की जिम्मेदारियों ने कभी मेरे शौक की तरफ मुझे झाँकने का अवसर ही नहीं दिया।अब सभी जिम्मेदारियाँ पूरी करके अपने शौक को पुनर्जीवित किया है।पति आधुनिक विचारों के हैं। उनकी इच्छा थी कि मैं आगे पढ़ूँ अतः 1986 में पत्राचार माध्यम से बी.ए किया तथा पूरी यूनिवर्सिटी में द्वितीय स्थान प्राप्त किया।
      समाज कल्याण के कामों के प्रति बहुत जुनून है और गम्भीर बीमारी होने के बावजूद मेरा जुनून मुझे जीवित रखता है।

प्रकाशित कृतियाँ:-

1-काव्य मंजरी(एकल काव्य संग्रह)
2-पाती प्रीत भरी भाग-1(एकल पुस्तक)
3-एक एकल काव्य संकलन *निनाद* व दूसरा  *आक्रोश*  प्रकाशनाधीन है।
4-कई सांझा संकलनों में रचनाएँ प्रकाशित हो चुकी हैं। 
-सम्मान 
कभी गिने नहीं।पाठकों को मेरा लिखा हुआ पसन्द आए,यही सबसे बड़ा सम्मान है।

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भारत में मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ माना जाता है, सरकार से सम्बंधित सारी योजना को जन- जन तक पहुँचाने में तथा जनता की आवाज को सरकार तक पहुचाने में मीडिया का अद्वितीय योगदान है,और इतना ही नहीं गाँव की हर छोटी-बड़ी घटना को समाचार पत्र के माध्यम से […]

संस्थापक एवं सम्पादक

डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’

29 अप्रैल, 1989 को मध्य प्रदेश के सेंधवा में पिता श्री सुरेश जैन व माता श्रीमती शोभा जैन के घर अर्पण का जन्म हुआ। उनकी एक छोटी बहन नेहल हैं। अर्पण जैन मध्यप्रदेश के धार जिले की तहसील कुक्षी में पले-बढ़े। आरंभिक शिक्षा कुक्षी के वर्धमान जैन हाईस्कूल और शा. बा. उ. मा. विद्यालय कुक्षी में हासिल की, तथा इंदौर में जाकर राजीव गाँधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के अंतर्गत एसएटीएम महाविद्यालय से संगणक विज्ञान (कम्प्यूटर साइंस) में बेचलर ऑफ़ इंजीनियरिंग (बीई-कंप्यूटर साइंस) में स्नातक की पढ़ाई के साथ ही 11 जनवरी, 2010 को ‘सेन्स टेक्नोलॉजीस की शुरुआत की। अर्पण ने फ़ॉरेन ट्रेड में एमबीए किया तथा एम.जे. की पढ़ाई भी की। उसके बाद ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियाँ’ विषय पर अपना शोध कार्य करके पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। उन्होंने सॉफ़्टवेयर के व्यापार के साथ ही ख़बर हलचल वेब मीडिया की स्थापना की। वर्ष 2015 में शिखा जैन जी से उनका विवाह हुआ। वे मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं और हिन्दी ग्राम के संस्थापक भी हैं। डॉ. अर्पण जैन ने 11 लाख से अधिक लोगों के हस्ताक्षर हिन्दी में परिवर्तित करवाए, जिसके कारण वर्ल्ड बुक ऑफ़ रिकॉर्डस, लन्दन द्वारा विश्व कीर्तिमान प्रदान किया गया।